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शनिवार, 31 दिसंबर 2016

गीत

एक रचना
*
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
देश दिनों से खड़ा हुआ है,
जो जैसा है अड़ा हुआ है,
किसे फ़िक्र जनहित का पेड़ा-
बसा रहा है, सड़ा हुआ है।
चचा-भतीजा ताल ठोंकते,
पिता-पुत्र ज्यों श्वान भौंकते,
कोई काट न ले तुझको भी-
इसीलिए
कहता हूँ-
रुक जा।
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
वादे जुमले बन जाते हैं,
घपले सारे धुल जाते हैं,
लोकतंत्र के मूल्य स्वार्थ की-
दीमक खाती, घुन जाते हैं।
मौनी बाबा बोल रहे हैं
पप्पू जहँ-तहँ डोल रहे हैं
गाल बजाते जब-तब लालू
मत टकराना
बच जा झुक जा।
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
एक आदमी एक न पाता,
दूजा लाख-करोड़ जुटाता,
मार रही मरते को दुनिया-
पिटता रोये, नहीं सुहाता।
हुई देर, अंधेर यहाँ है,
रही अनसुनी टेर यहाँ है,
शुद्ध दलाली, न्याय कहाँ है?
जलने से
पहले मत
बुझ जा।
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*****

abhiyanta kavi sammelan

स्वागत नववर्ष २०१७ 
प्रसंग- ''काव्य में अभियांत्रिकी'' 
अभियंताओं का, अभियंताओं द्वारा, अभियंताओं के लिए काव्य सृजन एवं प्रस्तुतीकरण 
दिनांक १-१-२०१७, संध्या ७ बजे, इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स (इंडिया) जबलपुर लोकल सेंटर जबलपुर 
***
आमंत्रित कवि- सर्व अभियंता १. विवेकरंजन श्रीवास्तव 'विनम्र', २. आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', ३. संजय वर्मा, ४. रामराज फौजदार 'फौजी', ५. अमरेन्द्र नारायण , ६. देवेन्द्र गोंटिया 'देवराज', ७. सुरेन्द्र सिंह पंवार, ८. गोपालकृष्ण चौरसिया 'मधुर', ९. सुधीर पाण्डेय, १०. दुर्गेश ब्योहार, ११. राकेश राठौड़, १२. गजेन्द्र कर्ण।
मुख्य अतिथि 
अभियंता डी. सी. जैन 
चेयरमैन ज्ञानगंगा ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूशंस, जबलपुर
अभियंता एस. के. गुप्ता 
मुख्य अभियंता रेलवे (से.नि.), जबलपुर
अभियंता प्रमोद तिवारी 
व्हाइस चेयरमैन तक्षशिला इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलोजी जबलपुर 
***
अभियन्ता वीरेंद्र कुमार साहू, चेयरमैन 
अभियंता तरुण कुमार आनंद, ऑनरेरी सेक्रटरी 
इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स (इंडिया) जबलपुर लोकल सेंटर जबलपुर
***
टीप- अन्य अभियंता रचनाकार/कलाकार अपना विवरण और संपर्क ९४२५१ ८३२४४ पर आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' को बताएं या salil.sanjiv@gmail.com पर भेजें। 

navgeet

नवगीत
समय वृक्ष है
*
समय वृक्ष है
सूखा पत्ता एक झरेगा
आँखें मूँदे.
नव पल्लव तब
एक उगेगा
आँखे खोले.
*
कहो अशुभ या
शुभ बोलो
कुछ फर्क नहीं है.
चिरजीवी होने का
कोई अर्क नहीं है.
कितने हुए?
होएँगे कितने?
कौन बताये?
किसका कितना वजन?
तराजू कोई न तोले.
ठोस दिख रहे
लेकिन हैं
भीतर से पोले.
नव पल्लव
किस तरह उगेगा
आँखें खोले?
*
वाम-अवाम
न एक साथ
मिल रह सकते हैं.
काम-अकाम
न एक साथ
खिल-दह सकते हैं.
पूरब-पश्चिम
उत्तर-दक्षिण
ऊपर-नीचे
कर परिक्रमा
नव संकल्प
अमिय नित घोले.
श्रेष्ठ वही जो
श्रम-सीकर की
जय-जय बोले.
बिन प्रयास
किस तरह कर्मफल
आँखें खोले?
*
जाग,
छेड़ दे, राग नया
चुप से क्या हासिल?
आग
न बुझने देना
तू मत होना गाफिल.
आते-जाते रहें
साल-दर-साल
नए कुछ.
कौन जानता
समय-चक्र
दे हिम या शोले ?
नोट बंद हों या जारी
नव आशा बो ले.
उसे दिखेगी उषा
जाग जो
आँखें खोले
***

navgeet

नवगीत:
संजीव
.
बहुत-बहुत आभार तुम्हारा
ओ जाते मेहमान!
.
पल-पल तुमने
साथ निभाया
कभी रुलाया
कभी हँसाया
फिसल गिरे, आ तुरत उठाया
पीठ ठोंक
उत्साह बढ़ाया
दूर किया हँस कष्ट हमारा
मुरझाते मेहमान
.
भूल न तुमको
पायेंगे हम
गीत तुम्हारे
गायेंगे हम
सच्ची बोलो कभी तुम्हें भी
याद तनिक क्या
आयेंगे हम?
याद मधुर बन, बनो सहारा
मुस्काते मेहमान
.
तुम समिधा हो
काल यज्ञ की
तुम ही थाती
हो भविष्य की
तुमसे लेकर सतत प्रेरणा
मन:स्थिति गढ़
हम हविष्य की
'सलिल' करेंगे नहीं किनारा
मनभाते मेहमान
.

३१.१२.२०१४ 

janm din

कार्यशाला 
*
लिखें मुक्तक 
विषय जन्म दिन 
मात्रा / वर्ण / छंद बंधन नहीं 
*
उदाहरण-
मुक्तक
धरागमन की वर्षग्रन्थि पर अभिनन्दन लो
सतत परिश्रम अक्षत, नव प्रयास चन्दन लो
सलिल-सुमन अभिषेक करे, हो सफल साधना
सत-शिव-सुन्दर सार्थकता हित शत वन्दन लो
हाइकु
(५-७-५)
जन्म दिवस
खुशियाँ ही खुशियाँ
अनगिनत
*
ताँका
(५-७-५-७-७)
जी भर जियो
ख़ुशी का घूँट पियो
खूब मुस्काओ
लक्ष्य निकट पाओ
ख़ुशी के गीत गाओ
*
जनक छंद
(१३-१३-१३)
राम लला प्रगटे सखी
मोद मगन माता हुई
शुभाशीष दें मुनि कई
*
चौपाई
(१६-१६)
जन्म दिवस का पर्व मनाना, मत मिष्ठान्न अकेले खाना
मात-पिता प्रभु का वंदनकर, शुभ आशीष सभी से पाना
बंधु-बांधवों के सँग मिलकर, किसी क्षुधित की भूख मिटाना
 जो असहाय दिखे तू उसकी, ओर मदद का हाथ बढ़ाना
*
आल्हा
(१६-१५)
जन्म दिवस पर दीप जलाओ, ज्योति बुझाना छोडो यार
केक न काटो बना गुलगुले, करो स्नेहियों का सत्कार
शीश ईश को प्रथम नवाना, सुमति-धर्म माँगो वरदान
श्रम से मुँह न चुराना किंचित, जीवन हो तब ही रसखान
आलस से नित टकराना है, देना उसे पटककर मात
अन्धकार में दीप जलना, यगा रात से 'सलिल' प्रभात
***

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

alha

एक रचना
*
मचा महाभारत भारत में, जन-गण देखें ताली पीट 
दहशत में हैं सारे नेता, कैसे बचे पुरानी सीट?  
हुई नोटबंदी, पैरों के नीचे, रही न हाय जमीन 
कौन बचाए इस मोदी से?, नींद निठुर ने ली है छीन 
पल भर चैन न लेता है खुद, दुनिया भर में करता धूम 
कहे 'भाइयों-बहनों' जब भी, तभी सफलता लेता चूम 
कहाँ गए वे मौनी बाबा?, घपलों-घोटालों का राज 
मनमानी कर जोड़ी दौलत, घूस बटोरी तजकर लाज 
हाय-हाय हैं कैसे दुर्दिन?, छापा पड़ता सुबहो-शाम 
चाल न कोई काम आ रही, जब्त हुआ सब धन बेदाम 
जनधन खातों में डाला था, रूपया- पीट रहे अब माथ 
स्वर्ण ख़रीदा जाँच हो रही, बैठ रहा दिल खाली हाथ 
पत्थर फेंक करेगा दंगा, कौन बिना धन? पिट रइ गोट 
नकली नोट न रहे काम के, रोज पड़े चोटों पर चोट   
ताले तोड़ आयकरवाले, खाते-बही कर रहे जब्त 
कर चोरी की पोल खोलते, रिश्वत लेंय न कैसी खब्त?
बेनामी संपत्ति बची थी, उस पर ली है नजर जमाय 
हाय! राम जी-भोले बाबा, हनुमत  कहूँ न राह दिखाय 
छोटे नोट दबाये हमीं ने, जनता को है बेहद कष्ट  
चूं न कर रहा फिर भी कोई, समय हो रहा चाहे नष्ट 
लगे कतारों में हैं फिर भी, कहते नीति यही है ठीक 
शायर सिंह सपूत वही जो, तजे पुरानी गढ़ नव लीक 
पटा लिया कुछ अख़बारों को, चैनल भरमाते हैं खूब 
दोष न माने फिर भी जनता, लुटिया रही पाप की डूब  
चचा-भतीजे आपस में भिड़, मोदी को करते मजबूत 
बंद बोलती माया की भी, ममता को है कष्ट अकूत 
पाला बदल नितिश ने मारा, दाँव न लालू जाने काट 
बोल थके है राहुल भैया, खड़ी हुई मैया की खाट 
जो मैनेजर ललचाये थे, उन पर भी गिरती है गाज 
फारुख अब्दुल्ला बौराया, कमुनिस्टों का बिगड़ा काज  
भूमि-भवन के भाव गिर रहे, धरे हाथ पर हाथ सुनार 
सेठ अफसरों नेताओं के ठाठ, न बाकी- फँसे दलाल  
रो-रो सूख रहे हैं आँसू, पिचक गए हैं फूले गाल 
जनता जय-जयकार कर रही, मोदी लिखे नाता इतिहास 
मन मसोस दिन-रात रो रहे, घूसखोर सब पाकर त्रास 
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गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

chhand bahar ka mool hai

कार्यशाला-
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छंद बहर का मूल है- २.
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*
उर्दू की १९ बहरें २ समूहों में वर्गीकृत की गयी हैं।
१. मुफरद बहरें-
इनमें एक ही अरकान या लय-खण्ड की पुनरावृत्ति होती है।
इनके ७ प्रकार (बहरे-हज़ज सालिम, बहरे-ऱज़ज सालिम, बहरे-रमल सालिम, बहरे-कामिल, बहरे-वाफिर, बहरे-मुतक़ारिब तथा बहरे-मुतदारिक) हैं।
२. मुरक्कब बहरें-
इनमें एकाधिक अरकान या लय-खण्ड मिश्रित होते हैं।
इनके १२ प्रकार (बहरे-मनसिरह, बहरे-मुक्तज़िब, बहरे-मुज़ारे, बहरे-मुजतस, बहरे-तवील, बहरे-मदीद, बहरे-बसीत, बहरे-सरीअ, बहरे-ख़फ़ीफ़, बहरे-जदीद, बहरे-क़रीब तथा बहरे-मुशाकिल) हैं।
*
ख. बहरे-मनसिरह
बहरे-मनसिरह मुसम्मन मतवी मक़सूफ़-
शायरों ने इस बहर का प्रयोग बहुत कम किया है। इसके अरकान 'मुफ़तइलुन फ़ाइलुन मुफ़तइलुन फ़ाइलुन' (मात्राभार ११११२ २१२ ११११२ २१२) हैं।
यह १६ वर्णीय अथाष्टिजातीय छंद है जिसमें ८-८ पर यति तथा पदांत में रगण (२१२) का विधान है।
यह २२ मात्रिक महारौद्र जातीय छंद है जिसमें ११-११ मात्राओं पर यति तथा पदांत में २१२ है।
उदाहरण-
१.
जब-जब जो जोड़ते, तब-तब वो छोड़ते
कर-कर के साथ हैं, पग-पग को मोड़ते
कर कुछ तू साधना, कर कुछ आराधना
जुड़-जुड़ जाता वही, जिस-जिस को तोड़ते
२.
निकट हमें देखना, सजन सुखी लेखना
सजग रहो हो कहीं, सलवट की रेख ना

उर्दू व्याकरण के अनुसार गुरु के स्थान पर २ लघु या दो लघु के स्थान पर गुरु मात्रा का प्रयोग करने पर छंद का वार्णिक प्रकार बदल जाता है जबकि मात्रिक प्रकार तभी बदलता है जब यह सुविधा पदांत में ली गयी हो। हिंदी पिंगल-नियम यह छूट नहीं देते। उर्दू का एक उदाहरण देखें-
१.
यार को क़ा/सिद मिरे/जाके अगर/देखना
मेरी तरफ/से भी तू/ एक नज़र/देखना
(सन्दर्भ ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल')
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बुधवार, 28 दिसंबर 2016

samiksha

​​
पुस्तक चर्चा-
''राजस्थानी साहित्य में रामभक्ति-काव्य'' मननीय शोधकृति 
चर्चाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
[पुस्तक विवरण- 'राजस्थानी साहित्य में रामभक्ति-काव्य, शोध ग्रन्थ, डॉ. गुलाब कुँवर भंडारी, प्रथम संस्करण २०१०, आकार २२से.मी.x १४ से.मी., पृष्ठ ३८०, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, मूल्य ७५०/-, त्रिभुवन प्रकाशन, गुलाब वाटिका, पावटा बी मार्ग, जोधपुर।] 
*
हिंदी साहित्य में भक्ति काल कभी न रुकनेवाली भाव धारा है। ब्रम्ह को निर्गुण और सगुण दोनों रूपों में आराधा गया है। सगुण भक्ति में राम और कृष्ण दो रूपों को अपार लोकप्रियता मिली है। वीर भूमि राजस्थान में श्रीनाथद्वारा और मीरां बाई श्री कृष्ण भक्ति के केंद्र रहे हैं। रामावतार से सम्बंधित कोई स्थान या व्यक्ति राजस्थान में न होने के बाद भी विषम परिस्थितियों से जूझते हुए एक अल्प शिक्षित गृहणी द्वारा स्वयं को उच्च शिक्षित कर स्तरीय शोध कार्य करना असाधारण पौरुष है।  राम पर शोध करना हो तो उत्तर प्रदेश अथवा राम से सम्बंधित अन्य क्षेत्रों के राम साहित्य पर कार्य करना सुगम होता किन्तु राजस्थानी साहित्य में राम-भक्ति काव्य की खोज, अध्ययन और उसका मूल्यांकन करना वस्तुत: दुष्कर और श्रम साध्य कार्य है।  ग्रन्थ लेखिका श्रीमती गुलाब कुँवर भंडारी (१४.१०.१९३६-७.१९९१) ने पूर्ण समर्पण भाव से इस शोध ग्रंथ का लेखन किया है। 

राजस्थान जुझारू तेवरों के लिए प्रसिद्ध रहा है। जान हथेली पर लेकर रणभूमि में पराक्रम कथाएँ लिखने वाले वीरों के साथ जोश बढ़ानेवाले कवि भी होते थे जो कलम और तलवार समान दक्षता से चला पाते थे। भावावेग राजस्थानियों की रग-रग में समय होता है। भक्ति का प्रबल आवेग राजस्थान के जन-मन की विशेषता है। वीरता के साथ-साथ सौंदर्यप्रियता और समर्पण के साथ-साथ बलिदान को जीते राजस्थानी कवियों ने एक और शत्रुओं को ललकारा तो दूसरी ओर ईशाराधना भी प्राण-प्राण से की। 

शोधकर्त्री ने राजस्थानी साहित्य में राम-काव्य को अपभ्रंश-काल से खोजा और परखा है।  अहिंसा को सर्वाधिक महत्व देनेवाला जैन साहित्य भी सशस्त्र संघर्ष हेतु ख्यात राम-महिमा के गायन से दूर नहीं रह सका है। ग्रन्थ में  रामभक्ति का विकास और राजस्थान में प्रसार, सगुण राम-भक्ति संबन्धी प्रबन्ध काव्य, सगुण राम-भक्ति सम्बन्धी मुक्तक काव्य, निर्गुण राम-भक्ति संबंधी कविता तथा राजस्थानी राम-भक्त कवि एवं उनका काव्य शीर्षक पाँच अध्यायों में यथोचित विस्तार के साथ 'राम' शब्द की व्युत्पत्ति-अर्थ, राम के स्वरुप का विकास, रामभक्ति शाखा का विकास-प्रसार, सगुण राम संबन्धी प्रबन्ध व मुक्तक काव्यों का विवेचन, निर्गुण राम संबंधी काव्य ग्रंथों का अनुशीलन तथा राम-भक्त जैन कवियों के साहित्य का विश्लेषण किया गया है।  

उल्लेख्य है कि मूल्यांकित अनेक कृतियाँ हस्तलिखित हैं जिनकी खोज करना, उन्हें पाना और पढ़ना असाधारण श्रम और लगन की माँग करता है। गुलाब कुँवर जी ने नव मान्यताएँ भी सफलतापूर्वक स्थापित की हैं। राम-भक्ति प्रधान प्रबंध काव्यों में कुशललाभ, हरराज, माधोदास दधवाड़िया, रुपनाथ मोहता, मंछाराम की कृतियों का विवेचन किया गया है। राम-भक्ति मुक्तक काव्य के अध्ययन में ४९ कवि सम्मिलित हैं। सर्वज्ञात है कि मीरांबाई समर्पित कृष्णभक्त थीं किंतु लखिमा ने मीरां-साहित्य से राम-भक्ति विषयक अंश उद्धृत कर उन्हें सफलतापूर्वक राम-भक्त सिद्ध किया है।  स्थापित मान्यता के विरुद्ध किसी शोध की स्थापना कर पाना सहज नहीं होता। यह अलग बात है कि राम और कृष्ण दोनों विष्णु के अवतार होने के कारण अभिन्न और एक हैं। 

निर्गुण राम-भक्ति काव्य के अन्तर्गत दादू सम्प्रदाय के १२, निरंजनी संप्रदाय के १४, चरणदासी संप्रदाय की ३, रामस्नेही संप्रदाय १९, अन्य ८ तथा १२ जैन कवियों कवियों के साहित्य का गवेषणा पूर्ण विश्लेषण इस शोधग्रंथ को पाठ ही नहीं मननीय और संग्रहणीय भी बनाता है। ग्रंथांत में ४ परिशिष्टों में हस्तलिखित ग्रंथ-विवरण, रामभक्ति लोकगीत, रामभक्त कवियों का संक्षिप्त विवरण तथा सहायक साहित्य का उल्लेख इस शोध ग्रन्थ को सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में भी उपयोगी बनाता है।  
श्रीमती गुलाब कुँवरि जी की भाषा शुद्ध, सरस तथा सहज ग्राह्य है। उनका शब्द-भंडार समृद्ध है। वे न तो अनावश्यक शब्दों का प्रयोग करती हैं, न सम्यक शब्द-प्रयोग करने से चूकती हैं। कवियों तथा कृतियों का विश्लेषण करते समय वे पूरी तरह तटस्थ और निरपेक्ष रह सकी हैं। राजस्थान और राम भक्ति विषयक रूचि रखनेवाले पाठकों और विद्वानों के लिए यह कृति अत्यंत महत्वपूर्ण है। ग्रन्थ का मुद्रण शुद्ध, सुरुचिपूर्ण तथा आवरण आकर्षक है। इस सर्वोपयोगी कृति का प्रकाशन करने हेतु लेखिका के पुत्र श्री त्रिभुवन राज भंडारी तथा पुत्रवधु श्रीमती सरिता भंडारी साधुवाद के पात्र हैं। 

*** 

chhand bahar ka mool hai-1

कार्यशाला-
छंद बहर का मूल है- १.
*
उर्दू की १९ बहरें २ समूहों में वर्गीकृत की गयी हैं।
१. मुफरद बहरें-
इनमें एक ही अरकान या लय-खण्ड की पुनरावृत्ति होती है।
इनके ७ प्रकार (बहरे-हज़ज सालिम, बहरे-ऱज़ज सालिम, बहरे-रमल सालिम, बहरे-कामिल, बहरे-वाफिर, बहरे-मुतक़ारिब तथा बहरे-मुतदारिक) हैं।
२. मुरक्कब बहरें-
इनमें एकाधिक अरकान या लय-खण्ड मिश्रित होते हैं।
इनके १२ प्रकार (बहरे-मनसिरह, बहरे-मुक्तज़िब, बहरे-मुज़ारे, बहरे-मुजतस, बहरे-तवील, बहरे-मदीद, बहरे-बसीत, बहरे-सरीअ, बहरे-ख़फ़ीफ़, बहरे-जदीद, बहरे-क़रीब तथा बहरे-मुशाकिल) हैं।
*
क. बहरे-मनसिरह
बहरे-मनसिरह मुसम्मन मतबी मौक़ूफ़-
इस बहर में बहुत कम लिखा गया है। इसके अरकान 'मुफ़तइलुन फ़ायलात मुफ़तइलुन फ़ायलात' (मात्राभार ११११२ २१२१  ११११२ २१२१) हैं।
यह १८ वर्णीय अथधृति जातीय शारद छंद है जिसमें ९-९ पर यति तथा पदांत में जगण (१२१) का विधान है।
यह २४ मात्रिक अवतारी जातीय छंद है जिसमें १२-१२ मात्राओं पर यति तथा पदांत में १२१ है।
उदाहरण-
१.
थक मत, बोझा न मान, कदम उठा बार-बार
उपवन में शूल फूल, भ्रमर कली पे निसार
पगतल है भू-बिछान, सर पर है आसमान
'सलिल' नहीं भूल भूल, दिन-दिन होगा सुधार
२.
जब-जब तूने कहा- 'सच', तब झूठा बयान
सच बन आया समक्ष, विफल हुआ न्याय-दान
उर्दू व्याकरण के अनुसार गुरु के स्थान पर २ लघु या दो लघु के स्थान पर गुरु मात्रा का प्रयोग करने पर छंद का वार्णिक प्रकार बदल जाता है जबकि मात्रिक प्रकार तभी बदलता है जब यह सुविधा पदांत में ली गयी हो। हिंदी पिंगल-नियम यह छूट नहीं देते।
३.
अरकान 'मुफ्तइलुन फ़ायलात मुफ्तइलुन फ़ायलात' (मात्राभार २११२ २१२१  २११२ २१२१)
क्यों करते हो प्रहार?, झेल सकोगे न वार
जोड़ नहीं, छीन भी न, बाँट कभी दे पुकार
कायम हो शांति-सौख्य, भूल सकें भेद-भाव
शांत सभी हों मनुष्य, किस्मत लेंगे सुधार
४.
दिल में हम अप/ने नियाज़/रखते हैं सो/तरह राज़
सूझे है इस/को ये भेद/जिसकी न हो/चश्मे-कोर
प्रथम पंक्ति में ए, ओ, अ की मात्रा-पतन दृष्टव्य।
(सन्दर्भ ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल')
=============
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

samiksha

पुस्तक चर्चा-
एक बहर पर एक ग़ज़ल - अभिनव सार्थक प्रयास
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
पुस्तक परिचय- एक बहर पर एक ग़ज़ल, ब्रम्हजीत गौतम, ISBN ९७८-८१-९२५६१३-७-०, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, पृष्ठ १४४/-, मूल्य २००/-, शलभ प्रकाशन १९९ गंगा लेन, सेक्टर ५, वैशाली, गाजियाबाद २०१०१०, रचनाकार संपर्क- युक्कौ २०६ पैरामाउंट सिम्फनी, क्रोसिंग रिपब्लिक, गाज़ियाबाद २०१०१६, चलभाष- ९७६०००७८३८। 
*
'नाद' ही सृष्टि का मूल है। नाद की निरंतरता उसका वैशिष्ट्य है।  नाद के आरोह और अवरोह लघु-गुरु के पर्याय हैं। नाद के साथ विविध ध्वनियाँ मिलकर अक्षर को और विविध अक्षर मिलकर शब्द को जन्म देते हैं। लघु-गुरु अक्षरों के विविध संयोग ही गण या रुक्न हैं जिनके अनेक संयोग लयों के रूप में सामने आते हैं। सरस लयों को काव्य शास्त्र छंद या बहर के रूप में वर्णित करता है।  हिंदी पिंगल में छंद के मुख्य २ प्रकार मात्रिक (९२,२७,७६३) तथा वार्णिक (१३,४२,१७,६२६) हैं।१ यह संख्या गणितीय आधार पर गिनी गयी है।  सामान्यत: २०-२५ प्रकार के छंद ही अधिक प्रयोग किये जाते हैं।  उर्दू में बहरों के मुख्य २ प्रकार मुफरद या शुद्ध (७) तथा मुरक्कब या मिश्रित (१२) हैं।२ गजल छंद चेतना में ६० औज़ानों का ज़िक्र है।३ गजल ज्ञान में ६७  बहरों के उदाहरण हैं।४ ग़ज़ल सृजन के अनुसार डॉ. कुंदन अरावली द्वारा सं १९९१ में प्रकाशित उनकी पुस्तक इहितिसाबुल-अरूज़ में १३२ नई बहरें संकलित हैं।५ अरूज़े-खलील-मुक्तफ़ी में सालिम (पूर्णाक्षरी) बहरें १५ तथा ज़िहाफ (अपूर्णाक्षरी रुक्न) ६२ बताये गए हैं।६ गज़ल और गज़ल की तकनीक में ७ सालिम, २४  मुरक्कब बहरों के नमूने दिए गए हैं। ७. विवेच्य कृति में ६५ बहरों पर एक-एक ग़ज़ल कहीं गयी है तथा उससे सादृश्य रखने वाले हिंदी छंदों का उल्लेख किया गया है।  

गौतम जी की यह पुस्तक अन्यों से भिन्न तथा अधिक उपयोगी इसलिए है कि यह नवोदित गजलकारों को ग़ज़ल के इतिहास और भूगोल में न उलझाकर सीधे-सीधे ग़ज़ल से मिलवाती है। बहरों का क्रम सरल से कठिन या रखा गया है। डॉ. गौतम हिंदी प्राध्यापक होने के नाते सीखनेवालों के मनोविज्ञान और सिखानेवालों कि मनोवृत्ति से बखूबी परिचित हैं। उन्होंने अपने पांडित्य प्रदर्शन के लिए विषय को जटिल नहीं बनाया अपितु सीखनेवालों के स्तर का ध्यान रखते हुए सरलता को अपनाया है। छंदशास्त्र के पंडित डॉ. गौतम ने हर बहर के साथ उसकी मात्राएँ तथा मूल हिंदी छंद का संकेत किया है। सामान्यत: गजलकार अपनी मनपसंद या सुविधाजनक बहर में ग़ज़ल कहते हैं किंतु गौतम जी ने सर्व बहर समभाव का नया पंथ अपनाकर अपनी सिद्ध हस्तता का प्रमाण दिया है। 

प्रस्तुत गजलों की ख़ासियत छंद विधान, लयात्मकता, सामयिकता, सारगर्भितता, मर्मस्पर्शिता, सहजता तथा सरलता के सप्त मानकों पर खरा होना है। इन गजलों में बिम्ब, प्रतीक, रूपक और अलंकारों का सम्यक तालमेल दृष्टव्य है। ग़ज़ल का कथ्य प्रेयसी से वार्तालाप होने की पुरातन मान्यता के कारण ग़ालिब ने उसे तंग गली और कोल्हू का बैल जैसे विशेषण दिए थे। हिंदी ग़ज़ल ने ग़ज़ल को सामायिक परिस्थितियों और परिवेश से जोड़ते हुए नए तेवर दिए हैं जिन्हें आरंभिक हिचक के बाद उर्दू ग़ज़ल ने भी अंगीकार किया है। डॉ. गौतम ने इन ६५ ग़ज़लों में विविध भावों, रसों और विषयों का सम्यक समन्वय किया है। 

नीतिपरकता दोहों में सहज किन्तु ग़ज़ल में कम ही देखने मिलती है। गौतम जी 'सदा सत्य बोलो सखे / द्विधा मुक्त हो लो सखे', 'यों न चल आदमी / कुछ संभल आदमी' आदि ग़ज़लों में नीति की बात इस खुबसूरती से करते हैं कि वह नीरस उपदेश न प्रतीत हो। 'हर तरफ सवाल है / हर तरफ उबाल है', 'हवा क्यों एटमी है / फिज़ा क्यों मातमी है', 'आइये गजल कहें आज के समाज की / प्रश्न कुछ भविष्य के, कुछ व्यथाएँ आज की' जैसी गज़लें सम-सामयिक प्रश्नों से आँखें चार करती हैं। ईश्वर को पुकारने का भक्तिकालीन स्वर 'मेरी नैया भंवर में घिरी है / आस तेरी ही अब आखिरी है' में दृष्टव्य है।  पर्यावरण पर अपने बात कहते हुए गौतम जी मनुष्य को पेड़ से सीख लेने की सीख देते हैं- 'दूसरों के काम आना पेड़ से सीखें / उम्र-भर खुशियाँ लुटाना पेड़ से सीखें'।  गौतम जी कि ग़ज़ल मुश्किलों से घबराती नहीं वह दर्द से घबराती नहीं उसका स्वागत करती है- 'दर्द ने जब कभी रुलाया है / हौसला और भी बढ़ाया है / क्या करेंगी सियाह रातें ये / नूर हमने खुदा से पाया है'।  

प्यार जीवन की सुन्दरतम भावना है। गौतम जी ने कई ग़ज़लों में प्रकारांतर से प्यार की बात की है। 'गुस्सा तुम्हारा / है हमको प्यारा / आँखें न फेरो / हमसे खुदारा',  'तेरे-मेरे दिल की बातें, तू जाने मैं जानूँ / कैसे कटते दिन और रातें, तू जानें मैं जानूँ', 'उनको देखा जबसे / गाफिल हैं हम तबसे / यह आँखों की चितवन / करती है करतब से, 'इशारों पर इशारे हो रहे हैं / अदा पैगाम सारे हो रहे हैं' आदि में प्यार के विविध रंग छाये हैं। 'कितनी पावन धरती है यह अपने देश महान की / जननी है जो ऋषि-मुनियों की और स्वयं भगवान की', 'आओ सब मिलकर करें कुछ ऐसी तदबीर / जिससे हिंदी बन सके जन-जन की तकदीर' जैसी रचनाओं में राष्ट्रीयता का स्वर मुखर हुआ है। 

सारत: यह पुस्तक एक बड़े अभाव को मिटाकर एक बड़ी आवश्यकता कि पूर्ति करती है। नवगजलकार खुश नसीब हैं कि उन्हें मार्गदर्शन हेतु 'गागर में सागर' सदृश यह पुस्तक उपलब्ध है। गौतम जी इस सार्थक सृजन हेतु साधुवाद के पात्र हैं। उनकी अगली कृति कि बेकरारी से प्रतीक्षा करेंगे गजल प्रेमी।   
                                                                            ***                                                                                  सन्दर्भ- १. छंद प्रभाकर- जगन्नाथ प्रसाद 'भानु', २. गजल रदीफ़ काफिया और व्याकरण- डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल', ३. गजल छंद चेतना- महावीर प्रसाद 'मुकेश', ४. ग़ज़ल ज्ञान- रामदेव लाल 'विभोर', ५. गजल सृजन- आर. पी. शर्मा 'महर्षि', ६. अरूज़े-खलील-मुक्तफ़ी- ज़ाकिर उस्मानी रावेरी, ७. गज़ल और गज़ल की तकनीक- राम प्रसाद शर्मा 'महर्षि'.  
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संपर्क- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१ ८३२४४। 
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सोमवार, 26 दिसंबर 2016

navgeet

एक रचना: 
*
तुमने बुलाया 
और 
हम चले आये रे 
*
लीक छोड़ तीनों चलें
शायर सिंह सपूत
लीक-लीक तीनों चलें
कायर स्यार कपूत
बहुत लड़े, आओ बने
आज शांति के दूत
दिल से लगाया
और
अंतर भुलाये रे
तुमने बुलाया
और
हम चले आये रे
*
राह दोस्ती की चलें
चलो शत्रुता भूल
हाथ मिलायें आज फिर
दें न भेद को तूल
मिल बिखराएँ फूल कुछ
दूर करें कुछ शूल
जग चकराया
और
हम मुस्काये रे
तुमने बुलाया
और
हम चले आये रे
*
जिन लोगों के वक्ष पर
सर्प रहे हैं लोट
उनकी नजरों में रही
सदा-सदा से खोट
अब मैं-तुम हम बन करें
आतंकों पर चोट
समय न बोले
मौके
हमने गँवाये रे!तुमने बुलाया
और
हम चले आये रे
*

navgeet

जनगीत : 
हाँ बेटा 
संजीव 

चंबल में 
डाकू होते थे
हाँ बेटा!
.
लूट किसी को
मार किसी को
वे सोते थे?
हाँ बेटा!
.
लुटा किसी पर
बाँट किसी को
यश पाते थे?
हाँ बेटा!
.
अख़बारों के
कागज़ उनसे
रंग जाते थे?
हाँ बेटा!
.
पुलिस और
अफसर भी उनसे
भय खाते थे?
हाँ बेटा!
.
केस चले तो
विटनेस डरकर
भग जाते थे?
हाँ बेटा!
.
बिके वकील
झूठ को ही सच
बतलाते थे?
हाँ बेटा!
.
सब कानून
दस्युओं को ही
बचवाते थे?
हाँ बेटा!
.
चमचे 'डाकू की
जय' के नारे
गाते थे?
हाँ बेटा!
.
डाकू फिल्मों में
हीरो भी
बन जाते थे?
हाँ बेटा!
.
भूले-भटके
सजा मिले तो
घट जाती थी?
हाँ बेटा!
.
मरे-पिटे जो
कहीं नहीं
राहत पाते थे?
हाँ बेटा!
.
अँधा न्याय
प्रशासन बहरा
मुस्काते थे?
हाँ बेटा!
.
मानवता के
निबल पक्षधर
भय खाते थे?
हाँ बेटा!
.
तब से अब तक
वहीं खड़े हम
बढ़े न आगे?
हाँ बेटा!
.

आज की रचना

दो कवि एक कुंडली 
नर-नारी 
*
नारी-वसुधा का रहा, सदा एक व्यवहार 
ऊपर परतें बर्फ कि, भीतर हैं अंगार -संध्या सिंह 
भीतर हैं अंगार, सिंगार न केवल देखें
जीवन को उपहार, मूल्य समुचित अवलेखें
पूरक नर-नारी एक-दूजे के हों आभारी
नर सम, बेहतर नहीं, नहीं कमतर है नारी - संजीव
*
एक त्रिपदी
वायदे पर जो ऐतबार किया
कहा जुमला उन्होंने मुस्काकर
रह गए हैं ठगे से हम यारों
*
मुक्तक
आप अच्छी है तो कथा अच्छी
बात सच्ची है तो कथा सच्ची
कुछ तो बोलेगी दिल की बात कभी
कुछ न बोले तो है कथा बच्ची
*
खुश हुए वो, जहे-नसीब
चाँद को चाँदनी ने ज्यों घेरा
चाहकर भूल न पाए जिसको
हाय रे! आज उसने फिर टेरा
*
सदा कीचड़ में कमल खिलता है
नहीं कीचड़ में सन-फिसलता है
जिन्दगी कोठरी है काजल की
नहीं चेहरे पे कोई मलता है
***
छंद न रचता है मनुज, छंद उतरता आप
शब्द-ब्रम्ह खुद मनस में, पल में जाता व्याप
हो सचेत-संजीव मन, गह ले भाव तरंग
तत्क्षण वरना छंद भी नहीं छोड़ता छाप
*
दोहे
उसने कम्प्यूटर कहा, मुझे किया बेजान
यंत्र बताकर छीन ली मुझसे मेरी जान
 *
गुमी चेतना, रह गया होकर तू निर्जीव
मिले प्रेरणा किस तरह?, अब तुझको संजीव?
***

samiksha

​​
पुस्तक चर्चा-
'गज़ल रदीफ़,-काफ़िया और व्याकरण' अपनी मिसाल आप 
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
पुस्तक विवरण- गज़ल रदीफ़,-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल', विधा- छंद शास्त्र, प्रथम संस्करण २०१५, आकार २२ से.मी. X १४.५ से.मी., आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९५, मूल्य १९५/-, निरुपमा प्रकाशन ५०६/१३ शास्त्री नगर, मेरठ, ०१२१ २७०९५११, ९८३७२९२१४८, रचनाकार संपर्क- डी ११५ सूर्या पैलेस, दिल्ली मार्ग, मेरठ, ९४१००९३९४३। 
*
हिंदी-उर्दू जगत के सुपरिचित हस्ताक्षर डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल' हरदिल अज़ीज़ शायर हैं। वे उस्ताद शायर होने के साथ-साथ, अरूज़ के माहिर भी हैं। आज के वक्त में ज़िन्दगी जिस कशमकश में गुज़र रही है, वैसा पहले कभी नहीं था। कल से कल को जोड़े रखने कि जितनी जरूरत आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी। लार्ड मैकाले द्वारा थोपी गयी और अब तक ढोई जा रही शिक्षा प्रणाली कि बदौलत ऐसी नस्ल तैयार हो गयी है जिसे अपनी सभ्यता और संस्कृति पिछड़ापन तथा विदेशी विचारधारा प्रगतिशीलता प्रतीत होती है। इस परिदृश्य को बदलने और अपनी जड़ों के प्रति आस्था और विश्वास पैदा करने में साहित्य की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। ऐसे रचनाकार जो सृजन को शौक नहीं धर्म मानकर सार्थक और स्वस्थ्य रचनाकर्म को पूजा की तरह निभाते हैं उनमें डॉ. बेदिल का भी शुमार है। 

असरदार लेखन के लिए उत्तम विचारों के साथ-साथ कहने कि कला भी जरूरी है। साहित्य की विविध विधाओं के मानक नियमों की जानकारी हो तो तदनुसार कही गयी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है। गजल काव्य की सर्वाधिक लोकप्रिय वि धाओं में से एक है। बेदिल जी, ने यह सर्वोपयोगी किताब बरसों के अनुभव और महारत हासिल करने के बाद लिखी है। यह  एक शोधग्रंथ से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। शोधग्रंथ विषय के जानकारों के लिए होता है जबकि यह किताब ग़ज़ल को जाननेवालों और न जाननेवालों दोनों के लिए सामान रूप से उपयोगी है। उर्दू की काव्य विधाएँ, ग़ज़ल का सफर, रदीफ़-काफ़िया और शायरी के दोष, अरूज़(बहरें), बहरों की किस्में, मुफरद बहरें, मुरक़्क़ब बहरें तथा ग़ज़ल में मात्रा गिराने के नियम शीर्षक अष्टाध्यायी कृति नवोदित ग़ज़लकारों को कदम-दर-कदम आगे बढ़ने में सहायक है।  

एक बात साफ़ तौर पर समझी जानी चाहिए कि हिंदी और उर्दू हिंदुस्तानी जबान के दो रूप हैं जिनका व्याकरण और छंदशास्त्र कही-कही समान और कहीं-कहीं असमान है। कुछ काव्य विधाएँ  दोनों भाषा रूपों में प्रचलित हैं जिनमें ग़ज़ल सर्वाधिक लोकप्रिय और महत्वपूर्ण है। उर्दू ग़ज़ल रुक्न और बहारों पर आधारित होती हैं जबकि हिंदी ग़ज़ल गणों के पदभार तथा वर्णों की संख्या पर। हिंदी के कुछ वर्ण उर्दू में नहीं हैं तो उर्दू के कुछ वर्ण हिंदी में नहीं है। हिंदी का 'ण' उर्दू में नहीं है तो उर्दू के 'हे' और 'हम्ज़ा' के स्थान पर हिंदी में केवल 'ह' है। इस कारण हिंदी में निर्दोष दिखने वाला तुकांत-पदांत उर्दूभाषी को गलत तथा उर्दू में मुकम्मल दिखनेवाला पदांत-तुकांत हिन्दीभाषी को दोषपूर्ण प्रतीत हो सकता है। यही स्थिति पदभार या वज़न के सिलसिले में भी हो सकती है। मेरा आशय यह नहीं है कि हमेशा ही ऐसा होता है किन्तु ऐसा हो सकता है इसलिए एक भाषारूप के नियमों का आधार लेकर अन्य भाषारूप में लिखी गयी रचना को खारिज करना ठीक नहीं है। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि विधा के मूल नियमों की अनदेखी हो। यह कृति गज़ल के आधारभूत तत्वों की जानकारी देने के साथ-साथ बहरों कि किस्मों, उनके उदाहरणों और नामकरण के सम्बन्ध में सकल जानकारी देती है। हिंदी-उर्दू में मात्रा न गिराने और गिराने को लेकर भी भिन्न स्थिति है। इस किताब का वैशिष्ट्य मात्रा गिराने के नियमों की सटीक जानकारी देना है। हिंदी-उर्दू की साझा शब्दावली बहुत समृद्ध और संपन्न है।   

उर्दू ग़ज़ल लिखनेवालों के लिए तो यह किताब जरूरी है ही, हिंदी ग़ज़ल के रचनाकारों को इसे अवश्य पढ़ना, समझना और बरतना चाहिए इससे वे ऐसी गज़लें लिख सकेंगे जो दोनों भाषाओँ के व्याकरण-पिंगाल की कसौटी पर खरी उतरें। लब्बोलुबाब यह कि बिदिक जी ने यह किताब पूरी फराखदिली से लिखी है जिसमें नौसिखियों के लिए ही नहीं उस्तादों के लिए भी बहुत कुछ है। इया किताब का अगला संस्करण अगर अंग्रेजी ग़ज़ल, बांला ग़ज़ल, जर्मन ग़ज़ल, जापानी ग़ज़ल आदि में अपने जाने वालों नियमों की भी जानकारी जोड़ ले तो इसकी उपादेयता और स्वीकृति तो बढ़ेगी ही, गजलकारों को उन भाषाओँ को सिखने और उनकी ग़ज़लों को समझने की प्रेरणा भी मिलेगी।

डॉ. बेदिल इस पाकीज़ा काम के लिए हिंदी-उर्दू प्रेमियों की ओर से बधाई और प्रशंसा के पात्र हैं। गुज़ारिश यह कि रुबाई के २४ औज़ानों को लेकर एक और किताब देकर कठिन कही जानेवाली इस विधा को सरल रूप से समझाकर रुबाई-लेखन को प्रोत्साहित करेंगे। 
***
समीक्षक संपर्क- २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१ ८३२४४ 
*****  

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

navgeet

एक रचना -
हिंदी भाषी 
*
हिंदी भाषी ही 
हिंदी की 
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
हिंदी जिनको
रास न आती
दीगर भाषा बोल न पाते।
*
हिंदी बोल, समझ, लिख, पढ़ते
सीढ़ी-दर सीढ़ी है चढ़ते
हिंदी माटी,हिंदी पानी
श्रम करके मूरत हैं गढ़ते
मैया के माथे
पर बिंदी
मदर, मम्मी की क्यों चिपकाते?
हिंदी भाषी ही
हिंदी की
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
*
जो बोलें वह सुनें - समझते
जो समझें वह लिखकर पढ़ते
शब्द-शब्द में अर्थ समाहित
शुद्ध-सही उच्चारण करते
माँ को ठुकरा
मौसी को क्यों
उसकी जगह आप बिठलाते?
हिंदी भाषी ही
हिंदी की
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
*
मनुज-काठ में पंचस्थल हैं
जो ध्वनि के निर्गमस्थल हैं
तदनुसार ही वर्ण विभाजित
शब्द नर्मदा नद कलकल है
दोष हमारा
यदि उच्चारण
सीख शुद्ध हम नहीं सिखाते
हिंदी भाषी ही
हिंदी की
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
*
अंग्रेजी के मोह में फँसे
भ्रम-दलदल में पैर हैं धँसे
भरम पाले यह जगभाषा है
जाग पायें तो मोह मत ग्रसे
निज भाषा का
ध्वज मिल जग में
हम सब काश कभी फहराते
***

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

navgeet

नवगीत:
संजीव
.
कुण्डी खटकी
उठ खोल द्वार
है नया साल
कर द्वारचार
.
छोडो खटिया
कोशिश बिटिया
थोड़ा तो खुद को
लो सँवार
.
श्रम साला
करता अगवानी
मुस्का चहरे पर
ला निखार
.
पग द्वय बाबुल
मंज़िल मैया
देते आशिष
पल-पल हजार
.

navgeet

नवगीत:
संजीव
*
नये बरस की
भोर सुनहरी
.
हरी पत्तियों पर
कलियों पर
तुहिन बूँद हो
ठहरी-ठहरी
ओस-कुहासे की
चादर को चीर
रवि किरण
हँसे घनेरी
खिड़की पर
चहके गौरैया
गाये प्रभाती
हँसे गिलहरी
*
लोकतंत्र में
लोभतंत्र की
सरकारें हैं
बहरी-बहरी
क्रोधित जनता ने
प्रतिनिधि पर
आँख करोड़ों
पुनः तरेरी
हटा भरोसा
टूटी निष्ठा
देख मलिनता
लहरी-लहरी
.
नए सृजन की
परिवर्तन की
विजय पताका
फहरी-फहरी
किसी नवोढ़ा ने
साजन की
आहट सुन
मुस्कान बिखेरी
गोरे करतल पर
मेंहदी की
सुर्ख सजावट
गहरी-गहरी
***

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

दोहांजलि

आचार्य श्याम लाल उपाध्याय के प्रति दोहांजलि
*
दोहाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
निर्मल निश्छल नर्मदा, वाक् अबाध प्रवाह
पाई शारद की कृपा, अग्रज! अगम-अथाह
*
शब्द-शब्द सार्थक कहें, संशय हरें तुरंत
छाया दें वट-वृक्ष सम, नहीं कृपा का अंत
*
आभा-किरण अनंत की, हरे सकल अज्ञान
शारद-सुत प्रतिभा अमित, कैसे सकूँ बखान?
*
तुम विराट के पग कमल, प्रक्षालित कर धन्य
'सलिल' कर रहा शत नमन, करिये कृपा अनन्य
*
'नियति निसर्ग' पढ़े-बढ़े, पाठक करे प्रणाम
धन्य भाग्य साहित्य पा, सार्थक ललित ललाम
*
बाल ह्रदय की सरलता, युवकोचित उत्साह
प्रौढ़ों सा गाम्भीर्य मिल, पाता जग से वाह
*
नियति भेद-निक्षेपते, आपद-विपद तमाम
वैदिक चिंतन सनातन, बाँटें नित्य अकाम
*
गद्य-पद्य के हिमालय, शब्द-पुरुष संजीव
ममता की मूरत मृदुल, वंदन करुणासींव!
*
श्याम-लाल का विलय या, लाल श्याम का मेल?
विद्यासागर! बताओ, करो न हमसे खेल
*
विद्यावारिधि! प्रणत युग, चाह रहा आशीष
करो कृपा अज्ञान हर, बाँटो ज्ञान मनीष
*
गद्य माल है गले में, तिलक समीक्षा भाल
पद्य विराजित ह्रदय में, दूजी कहाँ मिसाल?
*
राष्ट्र चिंतना ही रही, आजीवन तव ध्येय
धूप-छाँव दो पक्ष हों, पूरक और विधेय
*
देश सुखी-सानंद हो, दुश्मन हों संत्रस्त
श्रमी युवा निर्माण नव, करें न हों भयग्रस्त
*
धर्म कर्म का मर्म है, देश-प्रेम ही मात्र
सबल निबल-रक्षक बने, तभी न्याय का पात्र
*
दोहा-दोहा दे रहा, सार्थक-शुभ संदेश
'सलिल' ग्रहण कर तर सके, पाकर दिशा विशेष
*
गति-यति, मात्रा-भार है, सही-संतुलित खूब
पाठक पढ़कर गह सकें, अर्थ पाठ में डूब
*
दोहा-दोहा दुह रहा, गौ भाषा कर प्रीत
ग्रहण करे सन्देश जो, बना सके नव रीत
*
आस्था के अंकुर उगा, बना दिए वट-वृक्ष
सौरभ के स्वर मनोहर, सृजनकार है दक्ष
*
कविता-कानन में उगे, हाइकु संग्रह मौन
कम में कहते हैं अधिक, ज्यों होजान में नौन
*
बहे काव्य मन्दाकिनी, 'सलिल' नित्य अवगाह
गद्य सेतु से हो सके, भू दर्शन की चाह
*
'लोकनाथ' के 'कुञ्ज' में, 'ज्योतिष राय' सुपंथ
निरख 'पर्ण श्री' रच रहे, नित्य सार्थक ग्रंथ
*

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

mukatak

मुक्तक-
हर दिन नया जन्म होता है, हर दिन आँख मूँदते हैं हम
साथ समय के जब तक चलते तब तक ही मंजिल वरते हम
सुख-दुःख धूप-छाँव सहयात्री, जब जो पाओ वह स्वीकारें-
साथ न कुछ आता-जाता है, जो छूते उसका हो क्यों गम??
***

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

doha

दोहा दुनिया
*
जोड़-जोड़ जो धन मरे, आज रहे खुद फेंक
ठठा हँस रहे पडोसी, हाथ रहे हैं सेंक
*
चपल-चंचला लक्ष्मी, सगी न होती मान
रही कैद में कब-कहीं, जोड़ मरे नादान
*
शक्ति-शारदा-रमा के, श्याम-श्वेत दो रूप
श्याम नाश करता 'सलिल', श्वेत बनाता भूप
*
निजी जरूरत से अधिक, धन के ईश न आप
न्यासीवत रक्षा करें, कीर्ति सके जग व्याप
*
शासक हो तो जंक सा, स्वार्थ-लोभ से दूर
जनगण-हित साधे सदा, बजा स्नेह-संतूर
*
माया-ममता-मोह ही, घातक-मारक पाश
नियम मुलायम कर रहे, अनुशासन का नाश
*
नर नरेन्द्र हो कर सके, दूर कपट-छल-भ्रांति
राज सिंह जब-जब करे, वन में हो सुख-शांति
*
प्रभु धरती पर उतरकर, करते जन-कल्याण
उमा सृष्टि-सुषमा बढ़ा, करें श्वास-संप्राण
*
प्रणव-नाद जब गूँजता, तब मन में हो हर्ष
राहुल को तज बुद्ध का, हो पाता उत्कर्ष
*
ज्योतिर्मय आदित्य हो, वसुंधरा के साथ
जनगण तब ही नवाता, दिनकर कहकर माथ
*
कमलनाथ हों कमल से, रहकर दूर अनाथ
अजय विजय कब पा सके, झुकी ध्वजा नत माथ
*
रमा-रमण, शिव-राज की, कीर्ति कहे इतिहास
किसी अधर पर हास हो, कोई रहे उदास
***
 


muktika

मुक्तिका
*
मैं समय हूँ, सत्य बोलूँगा.
जो छिपा है राज खोलूँगा.
*
अनतुले अब तक रहे हैं जो
बिना हिचके उन्हें तोलूँगा.
*
कालिया है नाग काला धन
नाच फन पर नहीं डोलूँगा.
*
रूपए नकली हैं गरल उसको
मिटा, अमृत आज घोलूँगा
*
कमीशनखोरी न बच पाए
मिटाकर मैं हाथ धो लूँगा
*
क्यों अकेली रहे सच्चाई?
सत्य के मैं साथ हो लूँगा
*
ध्वजा भारत की उठाये मैं
हिन्द की जय 'सलिल' बोलूँगा


***

geet

सामयिक रचना
खाट खड़ी है
*
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
हल्ला-गुल्ला,शोर-शराबा
है बिन पेंदी के लोटों का.
*
नकली नोट छपे थे जितने
पल भर में बेकार हो गए.
आम आदमी को डँसने से
पहले विषधर क्षार हो गए.
ऐसी हवा चली है यारो!
उतर गया है मुँह खोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.

नाग कालिया काले धन का
बिन मरे बेमौत मर गया.
जल, बहा, फेंका घबराकर
जान-धन खाता कहीं भर गया.
करचोरो! हर दिन होना है
वार धर-पकड़ के सोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
बिना परिश्रम जोड़ लिया धन   
रिश्वत और कमीशन खाकर
सेठों के हित साधे मिलकर
निज चुनाव हित चंदे पाकर
अब हर राज उजागर होगा
नेता-अफसर की ओटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
१३-१२-२०१६ 

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

chhand - bahar

कार्यशाला
छंद बहर दोउ एक हैं
२ (रगण लघु मगण) = २ (राजभा लघु मातारा) = २ (२१२ १ २२२)= १४ वर्ण / २४ मात्रा, पदांत २२२    
सूत्र- २ x रलम
चौदह वर्णीय शर्करी जातीय छंद / चौबीस  मात्रीय अवतारी जातीय छंद
बहर- फाइलुं मुफाईलुं फाइलुं मुफाईलुं = २१२ १२२२
*
मुक्तक
मौन क्यों धरा?, तोड़ो, सेतु बात का जोड़ो
मंजिलें नहीं सीधी, राह को सदा मोड़ो
बात-बात में रूठे, बात-बात में माने
रूपसी लुभाती है, हाथ थाम ना छोड़ो
*
रूप की अदा प्यारी, रूपसी लगे न्यारी
होश होश खो बैठा, जोश तप्त चिंगारी
मौन ही रहा मानी, मूक हो रही बानी
रात नींद की बैरी, वाक् धार दोधारी
*
बात ठीक बोलूँगा, राज मैं न खोलूँगा
काम-काज क्या बोलो, व्यर्थ मैं न डोलूँगा
बात कायदे की हो, ना कि फायदे की हो
बाध्यता न मानूँ  मैं, बोल-बोल तोलूँगा
*
साम्य-
अ. २(गुरु जगण मगण) = २ (गुरु जभान मातारा) = २ (२ १२१ २२२) = १४ वर्ण/ २४ मात्रा, पदांत २२२,
सूत्र- २ x गजम,

आ. २(रगण यगण गुरु) २ (राजभा यमाता गुरु) = २ (२१२ १२२ २ )= १४ वर्ण/ २४मात्रा, पदांत २२२,
सूत्र- २ x रयग   

goshthi

समाचार:
लघुकथा जीवन का दर्पण- प्रदीप शशांक
*
जबलपुर, ११-१२-२०१६. स्थानीय भँवरताल उद्यान में विश्व वाणी हिंदी संस्थान जबलपुर तथा अभियान जबलपुर के तत्वावधान में नवलेखन संगोष्ठी के अंतर्गत मुख्य वक्ता वरिष्ठ लघुकथाकार श्री प्रदीप शशांक ने 'लघुकथा के उद्भव और विकास' विषय पर सारगर्भित वक्तव्य में लघु कथा को जीवन का दर्पण निरूपित किया. पुरातन बोध कथाओं, दृष्टांत कथाओं, जातक कथाओं आदि को आधुनिक लघुकथा का मूल निरूपित करते हुए वक्ता ने लघुकथा के मानकों, शिल्प, तत्वों तथा तकनीक कि जानकारी दी. आरम्भ में लघुकथा को स्वतंत्र विधा स्वीकार न किये जाने, चुटकुला कहे जाने और पूरक कहे जाने का उल्लेख करते हुए 'फिलर' से 'पिलर' के रूप में लघुकथा के विकास पर संतोष करते हुए शशांक जी ने यह अवसर उपलब्ध करने के लिए अपने ४ दशक पुराने सहरचनाकार साथ और इस अनुष्ठान के संयोजक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' के अवदान को महत्वपूर्ण बताते हुए नवांकुर पल्लवित करने के इस प्रयास को महत्वपूर्ण माना.
श्रीमती मंजरी शर्मा कि अध्यक्षता में संपन्न कार्यक्रम में आचार्य संजीव 'सलिल' ने लघुकथा के विविध आयामों तथा तकनीक से संबंधित प्रश्नोत्तर के माध्यम से नव लघुकथाकारों की शंकाओं का समाधान करते हुए मार्गदर्शन किया. उन्होंने लघुकथा, कहानी और निबंध में अंतर, लघुकथा के अपरिहार्य तत्व, तत्वों के लक्षण तथा शैली और शिल्प आदि पर प्रकाश डाला.

डॉ. मीना तिवारी, श्रीमती मिथलेश बड़गैयां, श्रीमती मधु जैन, श्री बसंत शर्मा, श्री पवन जैन, श्री कामता तिवारी, संजीव 'सलिल', प्रदीप शशांक आदि ने काला धन, सद्भाव विषयों पर तथा अन्य लघुकथाओं वाचन किया. गोष्ठी का वैशिष्ट्य भोपाल से श्रीमती कांता रॉय तथा कानपूर से श्रीमती प्रेरणा गुप्ता द्वारा वाट्स एप के माध्यम से भेजी गयी लघुकथाओं का वाचन रहा. प्रेरणा जी की लघुकथा में हिंदी के देशज रूप मिर्जापुरी का रसास्वादन कर श्रोता आनंदित हुए. श्री सलिल ने समन्वय प्रकाशन अभियान द्वारा शीघ्र प्रकाश्य सामूहिक लघुकथा संकलन प्रकाशन योजना की जानकारी दी.
आभार प्रदर्शन मिथलेश जी ने किया.

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

muktika, mukatak, taanka

तांका
(५-७-५-७-७ वर्ण) 
*
सूरज बाँका 
झुरमुट से झाँका 
उषा ने आँका
लख रूप सलोना
लिख दिया है तांका
***

*
खोज जारी है 
कौन-कहाँ से आया? 
किसने भेजा? 
किस कारण भेजा?
कुछ नहीं बताया 
*
मुक्तिका 
*
कौन अपना, कहाँ पराया है?
ठेंगा सबने हमें बताया है 
*
वक्त पर याद किया शिद्दत से
बाद में झट हमें भुलाया है
*
पाक दामन रहा दिखाता जो
पंक में वह मिला नहाया है
*
जोड़ लीं दौलतें ज़माने ने
अंत में साथ कुछ न पाया है
*
प्राण जिसमें रहे संजीव वही
श्वास ने सच यही सिखाया है
***
मुक्तक
शब्दों का जादू हिंदी में अमित सृजन कर देखो ना
छन्दों की महिमा अनंत है इसको भी तुम लेखो ना
ढ़ो सिख लिख आत्मानंदित होकर सबको सुख बाँटो
मानव जीवन कि सार्थकता यही 'सलिल' अवरेखो ना
***

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

कार्यशाला
छंद बहर दोउ एक है - ९
रगण यगण गुरु = २१२ १२२ २
सात वार्णिक उष्णिक जातीय, बारह मात्रिक आदित्य जातीय छंद
बहर- फाइलुं मुफाईलुं
*
मुक्तक
मेघ ने लुभाया है
मोर नाच-गाया है
जो सगा नहीं भाया
वह गया भुलाया है
*
मौन मौन होता है
शोर शोर बोटा है
साफ़-साफ़ बोले जो
जार-जार रोता है
*
राजनीति धंधा है
शीशहीन कंधा है
न्याय कौन कैसे दे?
क्यों प्रतीक अँधा है
*
सूर्य के उजाले हैं
सेठ के शिवाले हैं
काव्य के सभी प्रेमी
आदमी निराले हैं
*
आपने बिसरा है
या किया इशारा है?
होंठ तो नहीं बोला
नैन ने पुकारा है
*
कौन-कौन आएगा?
देश-राग गायेगा
शीश जो कटाएगा
कीर्ति खूब पायेगा
*
नवगीत
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
वायवी हुए रिश्ते
कागज़ी हुए नाते
गैर बैर पाले जो
वो रहे सदा भाते
संसदीय तूफां की
है नहीं रही रेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
लोकतंत्र पूछेगा
तंत्र क्यों दरिंदा है?
जिंदगी रही जीती
क्यों मरी न जिंदा है?
आनुशासिकी कीला
क्यों यहाँ नहीं मेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
क्यारियाँ कभी सींचें
बागबान ही भूले
फूल को किया रुस्वा
शूल को मिले झूले
मौसमी किए वादे
फायदा नहीं सदा पेखा
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
***
मेखा = ठोंका, पेखा = देखा

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

mukatak

मुक्तक 
माँ 
माँ की महिमा जग से न्यारी, ममता की फुलवारी 
संतति-रक्षा हेतु बने पल भर में ही दोधारी 
माता से नाता अक्षय जो पाले सुत बडभागी-
ईश्वर ने अवतारित हो माँ की आरती उतारी 
नारी 
नर से दो-दो मात्रा भारी, हुई हमेशा नारी 
अबला कभी न इसे समझना, नारी नहीं बिचारी
माँ, बहिना, भाभी, सजनी, सासु, साली, सरहज भी 
सखी न हो तो समझ जिंदगी तेरी सूखी क्यारी 
*
पत्नि 
पति की किस्मत लिखनेवाली पत्नि नहीं है हीन 
भिक्षुक हो बारात लिए दर गए आप हो दीन 
करी कृपा आ गयी अकेली हुई स्वामिनी आज 
कद्र न की तो किस्मत लेगी तुझसे सब सुख छीन 
*
दीप प्रज्वलन 
शुभ कार्यों के पहले घर का अँगना लेना लीप  
चौक पूर, हो विनत जलाना, नन्हा माटी-दीप   
तम निशिचर का अंत करेगा अंतिम दम तक मौन 
आत्म-दीप प्रज्वलित बन मोती, जीवन सीप 
*
परोपकार 
अपना हित साधन ही माना है सबने अधिकार 
परहित हेतु बनें समिधा, कब हुआ हमें स्वीकार?
स्वार्थी क्यों सुर-असुर सरीखा मानव होता आज?
नर सभ्यता सिखाती मित्रों, करना पर उपकार 
*
एकता 
तिनका-तिनका जोड़ बनाते चिड़वा-चिड़िया नीड़ 
बिना एकता मानव होता बिन अनुशासन भीड़ 
रहे-एकता अनुशासन तो सेना सज जाती है-   
देकर निज बलिदान हरे वह, जनगण कि नित पीड़
*
असली गहना 
असली गहना सत्य न भूलो 
धारण कर झट नभ को छू लो 
सत्य न संग तो सुख न मिलेगा  
भोग भोग कर व्यर्थ न फूलो 
***

vimarsh

विमर्श:
नाद छंद का मूल है

सृष्टि का मूल ही नाद है. योगी इसे अनहद नाद कहते हैं इसमें डूबकर परमात्म की प्रतीति होती है ऐसा पढ़ा-सुना है. यह नाद ही सबका मूल है.यह नाद निराकार है, इसका चित्र नहीं बन सकता़, इसे चित्रगुप्त कहा गया है. नाद ब्रम्ह की नियमित आवृत्ति ताल ब्रम्ह को जन्म देती है. नाद और ताल जनित तरंगें अनंत काल तक मिल-बिछुड़ कर भारहीन कण और फिर कई कल्पों में भारयुक्त कण को जन्म देती हैं. ऐसा ही एक कण 'बोसॉन' चर्चित हो चुका है. इन कणों के अनंत संयोगों से विविध पदार्थ और फिर जीवों का विकास होता है. नाद-ताल दोनों अक्षर ब्रम्ह है. ये निराकार जब साकार (लिपि) होते हैं तो शब्द ब्रम्ह प्रगट होता है. चित्रगुप्त के 3 रूप जन्मदाता, पालक और विनाशक तथा उनकी आदि शक्तियों (ब्रम्हा-महा शारदा, विष्णु-महालक्ष्मी, शिव-महाकाली) के माध्यम से सृष्टि-क्रम बढ़ता है. विष्णु के विविध अवतार विविध जीवों के क्रमिक विकास के परिचायक हैं. जैन तथा बौद्ध जातक कथाएँ स्पष्ट: is कहती हैं कि परब्रम्ह विविध जीवों के रूप में आता है. ध्वनि के विविध संयोजनों से लघु-दीर्घ वर्ण और वर्णों के सम्मिलन से शब्द बनते हैं. शब्दों का समुच्चय भाषा को जन्म देता है. भाषा भावों कि वाहक होती है. संवेदनाएँ और अनुभूतियाँ भाषाश्रित होकर एक से अनेक तक पहुँचती हैं. ध्वनि के लघु-गुरु उच्चारण विविध संयोजनों से विविध लयों का विकास करते हैं. इन लयों से राग बनते हैं. शब्द-संयोजन छंद को जन्म देते हैं. लय राग और छंद दोनों के मूल में होती है. लय की अभिव्यक्ति नाद से कंठ, ताल से वाद्य, शब्द से छंद , रेखाओं से चित्र तथा मुद्राओं से नृत्य करता है.सलिल-प्रवाह की कलकल, पक्षियों का कलरव भी लय की ही अभिव्यक्ति है. लय में विविध रस अन्तर्निहित होते हैं. रसों की प्रतीति भाव-अनुभाव करते हैं. लेखन, गायन तथा नर्तन तीनों ही रसहीन होकर निष्प्राण हो जाते हैं. आलाप ही नहीं विलाप में भी लय होती है. आर्तनाद में भी नाद तो निहित है न? नाद तो प्रलाप में भी होता है, भले ही वह निरर्थक प्रतीत हो. मंत्र, श्लोक और ऋचाएँ भी विविध स पड़ा हैलयों के संयोजन हैं. लय का जानकार उन्हें पढ़े तो रस-गंगा प्रवाहित होती है, मुझ जैसा नासमझ पढ़े तो नीरसता कि प्रतीति होती है. अभ्यास और साधना ही साधक को लय में लीन होने कि पात्रता और सामर्थ्य प्रदान करते हैं.

यह मेरी समझ और सोच है. हो सकता है मैं गलत हूँ. ऐसी स्थिति में जो सही हैं उनसे मार्गदर्शन अपेक्षित है.
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