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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

ग़ज़ल

एक बुंदेली लोक कथा 
बैठे तो उठै नईं, परै तो टरै नईं 
१०१. भौत दिना भए, अपने जा बुन्देलखण्ड मा चन्देलन की तूती बोलत हती।  
१०२. चन्देलन के राज में परजा सुख-चैन की बाँसुरी बजात रही। 
१०३. सुनों है के सेर और बकरिया एकई घाट पै पानी पियर रए।
१०४. राजा की मरजी कें बिना न चिरीया चीकत थी, ना बाज पर फरफरात तो।
१०५. सो ऊ राजा के एक बिटिया हती। 
१०६. भौतऊ खूबसूरत, मनो पूनम कैसो चन्दा।
१०७.    

एक रचना
*
वतन परस्तों से शिकवा किसी को थोड़ी है
गैर मुल्कों की हिमायत ही लत निगोड़ी है
*
भाईचारे के बीच मजहबी दखल क्यों हो?
मनमुटावों का हल, नाहक तलाक थोड़ी है
*
साथ दहशत का न दोगे, अमन बचाओगे
आज तक पाली है, उम्मीद नहीं छोड़ी है
*
गैर मुल्कों की वफादारी निभानेवालों
तुम्हारे बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है
*
है दुश्मनों से तुम्हें आज भी जो हमदर्दी
तो ये भी जान लो, तुमने ही आस तोड़ी है
*
खुदा न माफ़ करेगा, मिलेगी दोजख ही
वतनपरस्ती अगर शेष नहीं थोड़ी है
*
जो है गैरों का सगा उसकी वफा बेमानी
हाथ के पत्थरों में आसमान थोड़ी है
*




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