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रविवार, 16 अप्रैल 2017

chhatisgarhi doha


छत्तीसगढ़ी  दोहा:-- 
हमर देस के गाँव मा, सुन्हा सुरुज विहान. 
अरघ देहे बद अंजुरी, रीती रोय किसान.. 
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जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत. 
जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिया-कुंदरा मीत.. 
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महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात. 
दाई! पैयाँ परत हौं. मूंडा पर धर हात.. 
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जाँघर तोड़त सेठ बर, चिथरा झूलत भेस. 
मुटियारी माथा पटक, चेलिक रथे बिदेस.. 
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बाँग देही कुकराकस, जिनगी बन के छंद. 
कुररी कस रोही 'सलिल', मावस दूबर चंद..
१६-४-२०१० 
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