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सोमवार, 18 अगस्त 2014

jankashtami par: sanjiv

जन्माष्टमी पर:
संजीव 
*
हो चुका अवतार, अब हम याद करते हैं मगर 
अनुकरण करते नहीं, क्यों यह विरोधाभास है?
*
कल्पना इतनी मिला दी, सत्य ही दिखता नहीं 
पंडितों ने धर्म का, हर दिन किया उपहास है 
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गढ़ दिया राधा-चरित, शत मूर्तियाँ कर दीं खड़ी 
हिल गयी जड़ सत्य की, क्या तनिक भी अहसास है?
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शत विभाजन मिटा, ताकतवर बनाया देश को  
कृष्ण ने पर भक्त तोड़ें,  रो रहा इतिहास है 
*
रूढ़ियों से जूझ गढ़ दें कुछ प्रथाएँ स्वस्थ्य हम 
देश हो मजबूत, कहते कृष्ण- 'हर जन खास है' 
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भ्रष्ट शासक आज  भी हैं, करें उनका अंत मिल
सत्य जीतेगा न जन को हो सका आभास है 
*
फ़र्ज़ पहले बाद में हक़, फल न अपना साध्य हो 
चित्र जिसका गुप्त उसका देह यह आवास है.
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facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

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