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शनिवार, 16 अगस्त 2014

muktak shringar ke: sanjiv

चित्र पर कविता 

 

नयन में शत सपने सुकुमार 
अधर का गीत करे श्रृंगार 
दंत शोभित ज्यों मुक्तामाल 
केश नागिन नर्तित बलिहार 

भौंह ज्यों  प्रत्यंचा ली तान 
दृष्टि पत्थर में फूंके जान
नासिका ऊँची रहे सदैव 
भाल का किंचित घटे न मान 

सुराही कंठ बोल अनमोल 
कर्ण में मिसरी सी दे घोल 
कपोलों पर गुलाब खिल लाल
रहे नपनों-सपनों को तोल  

2 टिप्‍पणियां:

santosh kumar ksantosh_45@yahoo.co.in ने कहा…

santosh kumar ksantosh_45@yahoo.co.in [ekavita]

आ० सलिल जी
सुन्दर, बेहतरीन श्रंगार की रचना। बधाई।
सन्तोष कुमार सिंह

achal verma achalkumar44@yahoo.com ने कहा…

achal verma achalkumar44@yahoo.com [ekavita]

अति सुन्दर यह काव्य सामने ला देता छवि एक
जो लेता सबका ही मन मोह दिखा कर नैनों को नेक |....अचल