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रविवार, 28 फ़रवरी 2010

होली गीत: स्व. शांति देवी वर्मा

होली गीत:

स्व. शांति देवी वर्मा

होली खेलें सिया की सखियाँ
होली खेलें सिया की सखियाँ,
                       जनकपुर में छायो उल्लास....
रजत कलश में रंग घुले हैं, मलें अबीर सहास.
           होली खेलें सिया की सखियाँ...
रंगें चीर रघुनाथ लला का, करें हास-परिहास.
            होली खेलें सिया की सखियाँ...
एक कहे: 'पकडो, मुंह रंग दो, निकरे जी की हुलास.'
           होली खेलें सिया की सखियाँ...
दूजी कहे: 'कोऊ रंग चढ़े ना, श्याम रंग है खास.'
          होली खेलें सिया की सखियाँ...
सिया कहें: ' रंग अटल प्रीत का, कोऊ न अइयो पास.'
                  होली खेलें सिया की सखियाँ...
 सियाजी, श्यामल हैं प्रभु, कमल-भ्रमर आभास.
                   होली खेलें सिया की सखियाँ...
'शान्ति' निरख छवि, बलि-बलि जाए, अमिट दरस की प्यास.
                      होली खेलें सिया की सखियाँ...
***********
होली खेलें चारों भाई
होली खेलें चारों भाई, अवधपुरी के महलों में...
अंगना में कई हौज बनवाये, भांति-भांति के रंग घुलाये.
पिचकारी भर धूम मचाएं, अवधपुरी के महलों में...
राम-लखन पिचकारी चलायें, भारत-शत्रुघ्न अबीर लगायें.
लखें दशरथ होएं निहाल, अवधपुरी के महलों में...
सिया-श्रुतकीर्ति रंग में नहाई, उर्मिला-मांडवी चीन्ही न जाई.
हुए लाल-गुलाबी बाल, अवधपुरी के महलों में...
कौशल्या कैकेई सुमित्रा, तीनों माता लेंय बलेंयाँ.
पुरजन गायें मंगल फाग, अवधपुरी के महलों में...
मंत्री सुमंत्र भेंटते होली, नृप दशरथ से करें ठिठोली.
बूढे भी लगते जवान, अवधपुरी के महलों में...
दास लाये गुझिया-ठंडाई, हिल-मिल सबने मौज मनाई.
ढोल बजे फागें भी गाईं,अवधपुरी के महलों में...
दस दिश में सुख-आनंद छाया, हर मन फागुन में बौराया.
'शान्ति' संग त्यौहार मनाया, अवधपुरी के महलों में...
***********
साभार : संजीव 'सलिल', दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

नवगीत: फेंक अबीरा, गाओ कबीरा, भुज भर भेंटो... संजीव 'सलिल'

नवगीत: 
 भुज भर भेंटो...  
संजीव 'सलिल'
*
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...
*
भूलो भी तहजीब
विवश हो मुस्काने की.
देख पराया दर्द,
छिपा मुँह हर्षाने की.
घिसे-पिटे
जुमलों का
माया-जाल समेटो.
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...
*
फुला फेंफड़ा
अट्टहास से
गगन गुंजा दो.
बैर-परायेपन की
बंजर धरा कँपा दो.
निजता का
हर ताना-बाना
तोड़-लपेटो.
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...
*
बैठ चौंतरे पर
गाओ कजरी दे ताली.
कई पडोसन भौजी हो,
कोई हो साली.
फूहड़ दूरदर्शनी रिश्ते
'सलिल' न फेंटो.
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...

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इंटरव्यू/संस्मरण:



अल्का सक्सेना टेलीविजन इंडस्ट्री की जानी - मानी हस्ती  है. टेलीविजन की सबसे लोकप्रिय महिला एंकरों में से एक हैं. लेकिन एंकर से ज्यादा उनकी पहचान एक बेहतरीन पत्रकार की है. इसकी गवाही मीडिया खबर.कॉम द्वारा किया गया पिछले साल का सर्वे है. मार्च, 2009 में मीडिया खबर.कॉम ने न्यूज़ चैनलों में काम करने वाली महिलाओं पर केंद्रित एक सर्वे  किया था. सर्वश्रेष्ठ महिला एंकर और सबसे ग्लैमरस एंकर के अलावा कुल 12 सवाल सर्वे में पूछे गए. ऑनलाइन हुए सर्वे में सबसे ज्यादा लोगों ने सर्वश्रेष्ठ महिला एंकर के रूप में अल्का सक्सेना को वोट किया.

अल्का सक्सेना आजतक न्यूज चैनल के शुरुआती दौर के पत्रकारों में से रही हैं. दर्शकों के बीच उनकी अपनी एक अलग पहचान है.  लाइव इंटरव्यू औऱ पैनल डिस्कशन में इनको महारत हासिल है. चुनाव से जुड़े कार्यक्रम हों या फिर राष्ट्रीय, अंतरर्राष्ट्रीय मसलों पर आधारित सामूहिक वार्ता, सबमें इनका प्रस्तुतीकरण शानदार रहता है. स्क्रीन पर प्रस्तुति और भाषाई प्रयोग के मामले में भी उनका अंदाज़ सबसे जुदा है जो उन्हें बाकी एंकरों से अलग करता है.

प्रभावशाली लेखन और रिपोर्टिंग के लिए उन्हें समय-समय पर देश के स्थापित संस्थानों द्वारा पुरस्कार और प्रोत्साहन मिलता रहा जिसमें इन्सटीट्यूट ऑफ जर्नलिज्म की ओर से यंग जर्नलिस्ट अवार्ड( 1997) भी शामिल है.

पत्रकारिता के अपने 24 साल के करियर में अल्का सक्सेना ने 9 साल प्रिंट माध्यम को दिया है और 14 साल से टेलीविजन के लिए अपनी सेवाएं देतीं आ रही हैं. इन्होंने 1998 में  टेलीविजन पर पहली बार होनेवाले लाइव चुनावी शो-आपका फैसला,आजतक की 72 घंटे तक लगातार एंकरिंग की. खोजी पत्रकारिता और बेहतरीन स्टोरी के आधार पर इन्होंने करियर के शुरुआती दौर से ही पत्रकारिता को एक उंचाई तक लेने जाने की सफल कोशिश की औऱ समय-समय पर इसे लेकर एक मानक तैयार करती रहीं.

1995 से लेकर 2001 तक वो आजतक की कोर टीम में रहीं औऱ इस दौरान कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम बनाए,लांच किए. आजतक के लिए काम करते हुए इन छह सालों में कार्यक्रम बनाने और लांच करने के साथ-साथ उन्होंने इसके लिए एकरिंग भी की. चैनल की प्रोग्रामिंग हेड के तौर पर काम करते हुए उन्होंने उन कार्यक्रमों की तरह ज्यादा ध्यान दिया जिसका सीधा सरोकार दर्शकों की अभिरुचि से था.

अल्का सक्सेना ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत 1985 में रविवार, जो कि आनंद बाजार पत्रिका समूह की महत्वपूर्ण हिन्दी पत्रिका रही है,से की. 1989 में वो बतौर विशेष संवाददाता( स्पेशल कॉरसपॉडेंट) उन्होंने संडे ऑव्जर्वर ज्वायन किया और  आतंकवाद से जूझ रहे पंजाब औऱ जम्मू-कश्मीर के मामलों को गहरायी से समझने की कोशिश की. इस मामले को लेकर की गयी रिपोर्टिंग, उनकी पत्रकारिता की समझ और स्पष्ट दृष्टिकोण को उजागर करता है. ये वही समय रहा जब अल्का सक्सेना सरीखे पत्रकारों ने तेजी से बदलनेवाले देश और समाज की नब्ज को जानने-समझने के लिए टेलीविजन की भूमिका को पहचाना और उस हिसाब से रणनीति तय की.

करियर के लिहाज से ये उनके लिए सही समय रहा जबकि खाड़ी युद्ध चल रहे थे जब उन्होंने प्रिंट मीडिया को छोड़कर टेलीविजन की दुनिया में अपना कदम रखा. आजतक की एक छोटी किन्तु मजबूत और कोर टीम के साथ उन्होंने जो काम शुरु किया,वो ये बताने के लिए पर्याप्त है कि सामाजिक बदलाव में पत्रकारिता औऱ मीडिया की क्या भूमिका हो सकती है. 

2001 में वो आजतक को छोड़कर जी न्यूज से जुड़ीं. जी न्यूज में प्रोग्रामिंग हेड के तौर पर काम करते हुए उन्होंने उन कार्यक्रमों और मुद्दे की तरफ विशेष ध्यान दिया जिसका सीधा सरोकार दर्शकों की जरुरतों और अभिरुचि से रहे हों. उनके इस प्रयास के लिए टेली एवार्ड ने उन्हें प्रोग्रामिंग हेड ऑफ दि इयर(2003) से सम्मानित किया. जी न्यूज देश का पहला ऐसा चैनल है जिसे कि खोजी पत्रकारिता के संदर्भ में इंटरनेशनल न्यूयार्क फेस्टिबल की ओर से सम्मान हासिल है जिसमें की दुनिया के पच्चास देशों ने शिरकत किया. जी न्यूज को जिस कार्यक्रम के लिए सम्मान मिला उसका निर्देशन और एंकरिंग अल्का सक्सेना ने ही किया.

वर्तमान में अल्का सक्सेना ज़ी न्यूज़ की कंसल्टिंग एडीटर होने के साथ-साथ चैनल की प्राइम टाइम की एंकर भी हैं. ज़ी न्यूज़ के सामयिक मुद्दों पर आधारित चर्चित शो - जरा सोचिए की एंकरिंग भी करती हैं. उनसे उनके पत्रकारिता के सफरनामे पर मीडिया खबर.कॉम के सम्पादक पुष्कर पुष्प ने खास बातचीत की. पेश है बातचीत के आधार पर तैयार किये गए उनके पत्रकारिता के सफरनामें के मुख्य अंश : 

पत्रकारिता की शुरुआत : 
 
मेरा पत्रकरिता के पेशे में आना  कुछ हद तक इतेफाक था. क्योंकि मुझे पहला मौका अनजाने में मिला. मैं जब स्कूल/कालेज में पढ़ती थी तब पॉकेट मनी के लिए आल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के लिए बच्चों पर आधारित कुछ प्रोग्राम करती थी. उन दिनों मैं 12 वीं क्लास में थी. इन कार्यक्रमों से पॉकेट मनी ठीक हो जाती थी. मेरे भाई उन दिनों थियेटर और ऐसी चीजों में सक्रिय थे. इसलिए मुझे पता रहता था कि कहाँ जाना है और किससे बात करनी है.  इस वजह से मुझे जल्दी-जल्दी काम मिलने लगा. लेकिन ये सब करने के बावजूद यह मेरा प्रोफेशन बन जायेगा , ऐसा कभी सोंचा नहीं था. वैसे भी मैंने साईंस से ग्रेजुएशन किया है. मेरे परिवार में भी उस वक़्त पत्रकारिता से सम्बन्ध रखने वाला कोई नहीं था.

मैं जब पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही थी उस वक़्त मैं रविवार के लिए कॉलम लिखती थी. इसके अलावा उन दिनों जितने भी नेशनल डेली और वीकली होते थे उन सबमें लिखती थी. हिंदुस्तान, जनसत्ता, नवभारत, धर्म युग,  साप्ताहिक हिन्दुस्तान, वामा, दिनमान सबमें मेरे लेख छपते थे. सबके लिए मैं फ्री लान्सिंग कर रही थी.

पहले तो यह पॉकेट मनी से शुरू हुआ. लेकिन उसके बाद कुछ विचार भी आने लगे कि इसपर लिखना चाहिए और उसी पर लिखती थी. संयोग से मेरे ज्यादातर लेख छप जाते थे. लेकिन तब भी मुझे नहीं पता था कि यह मेरा करियर बनेगा. उसके बाद इधर मेरा पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा हुआ और उधर रविवार में वैकेंसी निकली. उसमें कई लोगों को अप्लाई करने के लिए कहा गया. मैंने भी अप्लाई किया. लेकन अंतिम रूप से तीन लोगों का सेलेक्शन हुआ था.  उन तीन में से एक मैं भी थी. हमलोगों को ट्रेनिंग के लिए कोलकाता भेजा गया था. फिर हमलोग कोलकात्ता गए. आनंद बाज़ार पत्रिका उन दिनों बहुत अधिक प्रतिष्ठित पत्रिका हुआ करती थी. एस.पी.सिंह, उदयन शर्मा, एम.जे.अकबर सब वही से निकले हैं. मेरे लिए गर्व की बात है कि मुझे पहला मौका ही ऐसे संस्थान में मिला जो बहुत बड़ा और प्रतिष्ठित था. उसके बाद फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 

रविवार में मेरे चयन के पीछे की कहानी :

 
रविवार में नौकरी मिलने के बहुत बाद में मेरा चयन कैसे हुआ. इस बारे में मुझे पता चला. दरअसल पत्रकारिता के प्रति मेरी प्रतिबद्धता को देखकर मुझे लिया गया. मामला उस वक़्त का है जब मैं फ्रीलान्सिंग किया करती थी. उस वक़्त नजफगढ़ प्लांट में गैस रिसी थी . 4 दिसंबर 1985 की घटना है. भोपाल गैस कांड के ठीक एक साल बाद घटना घटी थी . मैं अपना कॉलम सबमिट करने के लिए रविवार के ऑफिस में आई थी. चूँकि मैं उन दिनों पढ़ भी रही थी तो अपना कॉलम सबमिट करती थी और चली जाती थी. उस समय पीटीआई बिल्डिंग में रविवार का ऑफिस हुआ करता था. मैं जब वहां से अपना कॉलम देकर वापस आ रही थी. तो गैलरी से इधर दो-तीन पीटीआई वाले लोगों को तेजी से उधर- इधर, आते - आते देखा. वहां पर मुझे सुदीप चटर्जी भी दिखे जो उन दिनों पीटीआई के सीनियर जर्नलिस्ट हुआ करते थे. उनसे मैं परिचित थी.  मैंने उनसे पूछा की सुदीप दा कहां जा रहे हैं.  तब उन्होंने गैस रिसने वाली बात बताई. तब मैंने उनसे आग्रह किया कि मुझे भी अपने साथ वे ले चलें. उन्होंने मुझे अपने साथ ले लिया. वहां पहुंचकर मैं काफी अंदर तक घुस गयी. उन दिनों किसी एंगल से मैं जर्नलिस्ट नहीं लगती थी. दो चोटी और कालेज वाली बैग लटकाए किसी ने मुझे जर्नलिस्ट नहीं समझा. इसलिए आसानी से मैं उस जगह तक पहुँच गयी जहाँ पर गैस रिस रहा था. गैस की वजह से मुझे थोड़ी तकलीफ भी हो रही थी. खांसी भी हो रही थी. खैर वहां पर जब मै पहुंची तब मैंने कुछ लोगों को बात करते हुए सुना कि बाहर आकर कैसे मीडिया को प्लान करना है. मैंने जल्दी- जल्दी कुछ चीजें नोट कर ली. उसके बाद मैं पीटीआई बिल्डिंग में वापिस आ गयी. मैंने उस पूरे वाक्ये के बारे में लिखा और लिखने के बाद उदयन शर्मा से बात की और उसे छपने के लिए भेज दिया. उन दिनों टेलीग्राफ के माध्यम से ख़बरें भेजी जाती थी. संयोग से वो छप भी गया. रविवार में जब मेरा चयन हो गया और दो -तीन महीने बीत गए तब मुझे पता चला कि मेरे चयन के पीछे उस घटना की बहुत बड़ी भूमिका रही. सभी लोगों को लगा कि यह तो हमारी स्टाफर भी नहीं है. कॉलम सबमिट करके वह वापिस जा सकती थी. इस घटना से उसका कोई लेना-देना नहीं था. उसके बावजूद उसने घटना में अभिरुचि दिखाकर उसकी रिपोर्ट तैयार की. इसका मतलब कही  -न - कहीं उसमें जर्नलिज्म वाली स्पार्क है. इस तरह से मेरे पत्रकरिता के सफरनामे की शुरुआत हुई. 
पुरस्कार के वो 50रुपये और अखबार में मेरा नाम :
 
मैं जब स्कूल में थी तब डिबेट कम्पीटीशन में भाग लिया करती थी. उस वक़्त सातवीं क्लास में थी. तब डिबेट कम्पीटीशन के जूनियर विंग में मुझे पहला पुरुस्कार मिला. मुझे अब भी याद है वह पुरस्का मुझे फतेहचन्द्र शर्मा  अराधक ने दिया, जो उन दिनों नवभारत टाईम्स में हुआ करते थे . हालाँकि दुबारा उनसे मेरी मुलाकात कभी नहीं हुई लेकिन पुरस्कार देते वक़्त उन्होंने जो बात कही वह मुझे अभीतक याद है. उन्होंने मुझे गोद में लेते हुए कहा कि यदि मेरा वश चलता तो जूनियर और सीनियर विंग दोनों में इस बच्ची को मैं पहला पुरस्कार देता. और उन्होंने 50 रुपये जेब से निकालकर मुझे दिया. उस वक़्त उस 50 रुपये का बहुत महत्त्व था. लेकिन उससे भी बड़ी बात हुई कि अगले दिन पुरस्कार समारोह की एक छोटी सी खबर अखबार में छप कर आ गयी जिसे मेरे पापा ने पढ़कर सुनाया. मुझे बड़ी हैरानी हुई और मैंने पूछा कि जबलपुर वाली मामी जी ने भी यह खबर पढ़ ली होगी. नवभारत टाइम्स उनके वहां भी आता होगा. और तब तो बुआ जी ने भी पढ़ लिया होगा. मेरी माँ ने कहा हाँ सबने देख लिया होगा. मेरे लिए यह बिलकुल  हैरान और चमत्कृत करने वाली घटना थी.  मुझे लगा वह कितना महत्वपूर्ण आदमी था जिसने लिख दिया और उसे मेरे सब रिश्तेदार पढ़ पा रहे हैं. इस घटना का मुझपर कहीं-न-कहीं असर पड़ा. 
बेटे की देखभाल लिए नौकरी छोडनी पड़ी :
 
मैं 1985 से 1991 तक प्रिंट में ही रही. उसके बाद मैंने फ्रीलांस किया. 1991 में मैंने जब नौकरी छोड़ी उस वक़्त मैं संडे आब्जर्बर में बतौर विशेष संवाददाता थी.  मैंने जब पत्रकारिता की रेगुलर जॉब को छोड़ा तो मुझे खुद भी बड़ी हैरानी हुई. दूसरे लोगों को हैरानी हुई क्योंकि उनको लगता था कि मैं अपने करियर के प्रति बड़ी सजग हूँ. मुझे भी खुद भी ऐसा लगता था. पत्रकारिता को लेकर एक पैशन हुआ करता था. सिर्फ जर्नलिज्म के बारे में सोंचती थी. मैंने शादी भी एक पत्रकार से की थी. 1991 में बेटा हो गया. उसके होने के बाद जब मैंने दूबारा ज्वाइन किया तो मैं एक हफ्ते भी काम नहीं कर पाई. मैंने पाया कि मैं बिलकुल बदल गयी हूँ. मैं अपने बेटे को छोड़कर नहीं जा पा रही थी. ऑफिस पहुंचकर मन करता था वापस लौट जाऊं और ऐसा हुआ. उस एक हफ्ते के दौरान मैं कई दिन ऑफिस आई और दो घंटे में घर वापस लौट गयी. तब मुझे लगा कि मैं न्याय नहीं कर पाऊँगी और मैंने नौकरी छोड़ दिया . तब मुझे ये नहीं पता था कि मैं वापस कैसे आउंगी.  सब लोगों ने मुझे समझया कि बड़ी गलती कर रही हो. तुम्हारा करियर इतना अच्छा जा रहा है. क्यों अचानक जा रही हो ? मैंने उस वक़्त यही कहा कि मैं कोशिश भी कर रही हूँ लेकिन मैं अपने आप को नहीं रोक पा रही हूँ. मैं उसके बिना नहीं रह पा रही हूँ. उसको मैं क्रेच में नहीं छोड़ सकती. इस तरह से मैंने नौकरी छोड़ दी. लेकिन फ्रीलान्सिंग करती रही. 
टेलीविजन इंडस्ट्री में काम करने का मौका :
 
भारत में उस समय कोई न्यूज़ चैनल नहीं था. उस वक़्त कोई यह नहीं सोंचता था कि टेलीविजन पत्रकारिता भी कोई चीज होगी. हिंदुस्तान में न्यूज़ चैनल होंगे. दूरदर्शन में चित्रहार और रेडियो में बिनाका गीत माला जैसे लोकप्रिय प्रोग्राम थे. दूरदर्शन पर भी न्यूज़ के दो या तीन बुलेटिन हुआ करते थे. और वो भी लोग स्पोट पर नहीं जाते थे. बस ऐसे ही पढ़ दिया करते थे. उस वक़्त मैं फ्रीलासिंग  कर रही थी . पार्ट टाइम ही काम कर सकती थी.  बच्चे के साथ रहना चाहती थी. तभी मुझे कई ऐसे ऑफर आये जिसमें डाक्यूमेंट्री के लिए स्क्रिप्ट लिखने के लिए कहा गया. तब मैंने वो काम भी शुरू किया. डाक्यूमेंट्री को लेकर मुझे दिलचस्पी थी और डाक्यूमेंट्री कैसे बनती है वह जानने की उत्सुकता थी. इसी उत्सुकतावश मैं कई बार  स्क्रिप्ट लेकर डाक्यूमेंट्री शूट हो रही जगह पर भी पहुँच जाती थी. इससे मुझे कई तकनीकी जानकारी मिली. मसलन फोकस कैसे करते हैं, कलर बार क्या होता है , पैन का मतलब क्या होता है. उस वक़्त कोई कोर्स नहीं होता था. उसके बाद मेरी दिलचस्पी और अधिक बढती चली गयी. लेकिन तब भी टेलीविजन में आने के बारे में कभी नहीं सोंचा. क्यूंकि ऐसा बिलकुल अंदाज़ा ही नहीं था कि भारत में टेलीविजन की कोई इंडस्ट्री भी होगी. उसी समय आईटीवी, न्यूज़ और करेंट अफेयर्स पर आधारित कोई प्रोग्राम दूरदर्शन के लिए बना रहा था. उसमें मुझे 13 एपिसोड के लिए काम करने का कांट्रेक्ट मिला. यह 1994 की बात है. उसके बाद मेरे पास न्यूज़ ट्रैक (टीवी टुडे) की तरफ ऑफर आया. मैंने इंटरव्यू दिया और 17 मई 1995 को ज्वाइन कर लिया. लेकिन तब भी ऐसा नहीं था कि प्रतिदिन कोई न्यूज़ पर आधारित कार्यक्रम होगा. उसी समय एक और कार्यक्रम को मंजूरी मिली जिसका नाम आजतक पड़ा. 
न्यूज़ ट्रैक काफी पहले से चल रहा था. खास हिंदी के लिए जो लोग आये थे उनमें अजय चौधरी, मैं , दीपक , मृत्यंजय कुमार झा और नकवी जी आये. बाद में एस.पी.भी आये. उन्होंने जून में ज्वाइन किया था. एस.पी आये तो हिंदी इंडिया टुडे के लिए थे लेकिन फिर अरुण पुरी ने बताया कि बच्चों ने ऐसे-ऐसे किया था और वो क्लियर हो गया है तो पहले आप इसको देख लीजिये. उसका लॉन्च अभी हम टाल देते हैं. लेकिन उसका लॉन्च कभी हुआ ही नहीं और आजतक ही प्रमुख कार्यक्रम बन गया. वैसे एस.पी के आने के पहले से आजतक का ट्रायल रन चल रहा था. उसके बाद और भी लोग जुड़ते चले गए. आजतक में 2001 तक काम किया. फिर जी न्यूज़ में आ गयी. 2005 में मैंने कंसल्टेंट एडिटर के तौर पर जनमत में ज्वाइन किया.  तक़रीबन दो साल बाद फिर जी न्यूज़ वापस आ गयी.
आजतक छोड़ने की वजह :
मैंने जब आजतक छोड़ा तब आजतक नंबर एक चैनल हुआ करता था. लेकिन मेरे छोड़ने की कोई खास वजह नहीं रही. मेरे अलावा भी कई और लोगों ने आजतक को छोड़ा. नकवी जी, संजय पुगलिया और दिबांग ने भी आजतक छोड़ा. काफी बाद में आशुतोष और कई और लोगों ने भी आजतक छोड़ा. मुझे लगता है कि एक ही संस्थान में लम्बे समय तक काम करने के बाद एक स्थिरता आ जाती है. यदि आप लम्बे समय तक रह जाते हैं तो कंपनी भी आपको उतना वैल्यू नहीं देती है. कंपनी की अपेक्षा अधिक बढ़ जाती है. ऐसे में बेहतर यही होता है आगे की तरफ का रुख किया जाए. मैंने भी इसलिए आगे बढ़ना ही ज्यादा उचित समझा और उसका मुझे कोई गिला नहीं है.
टेलीविजन एंकर बनूँगी ऐसा कभी सोंचा भी नहीं था : 
मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं कभी कैमरे पर आ सकती हूँ. जर्नलिज्म में आने के बाद से ही मैं लगातार रिपोर्टिंग ही करती थी. इलेक्ट्रानिक मीडिया में आने के बाद भी रिपोर्टिंग ही कर रही थी. उन दिनों कार्यक्रम तैयार करके दूरदर्शन में भेजा जाता था. लेकिन एक दफे एस.पी की तबियत काफी ख़राब थी. इसी कारण वे बुलेटिन करने के लिए नहीं आ सकते थे. उस वक़्त तक सिर्फ वही एंकरिंग किया करते थे. अब समस्या आ गयी कि आज शाम का बुलेटिन कौन करेगा. प्रोग्राम तो जाना ही है. ऐसी परिस्थिति भी आ सकती है ऐसा तब तक किसी ने सोंचा भी नहीं था. अभी प्रोग्राम निकलते हुए चार महीने ही हुए थे.
अब समस्या खड़ी हो गयी कि क्या किया जाए. तब यही समाधान निकाला गया कि किसी और से बुलेटिन पढ़वा लिया जाए और उसे ही भेज दिया जाये. लेकिन दूरदर्शन ने कहा नहीं पहले हम अप्रूव करेंगे. फिर आप उससे बुलेटिन करवा सकते हैं. तब मधु त्रैहन ने मुझे और दो -तीन लोगों को न्यूज़ पढने के लिए कहा. उस वक़्त बड़ी घबराहट हुई. इस तरह से कभी हमलोगों ने न्यूज़ नहीं पढ़ा था. उन दिनों टेलीप्रोमटर भी नहीं होते थे. इसलिए न्यूज़ पढने में दिक्कत आ रही थी. हालाँकि फील्ड में हमलोग पीटूसी करते थे. लेकिन वो एक अलग बात होती थी. यहाँ मामला अलग था. मुझे बुलेटिन पढने के लिए बैठाया गया तब मैं जरूरत से कुछ ज्यादा ही अपने आप को लेकर सजग थी. मुझे याद है पीसीआर में अरूण पुरी भी मौजूद थे. मुझे न्यूज़ पढने के लिए कहा गया. उस वक़्त लगता था कि गला सूख रहा है.  ऐसा जब कई बार हुआ. तब सब लोगों ने आपस में विचार करके मुझसे कहा कि अच्छा चलो पहले प्रैक्टिस करो. ऐसा तीन - चार बार करवाया गया. बाद में उसी को दूरदर्शन के पास भेज दिया गया. मेरे अलावा दो-तीन लोगों के टेप भेजे गए थे. अंतिम रूप से मेरा और मृत्यंजय का चयन हुआ. फिर हमलोगों को बारी-बारी से मौका मिलने लग गया. तब यह निश्चित कर दिया गया कि शनिवार को एस.पी बुलेटिन नहीं किया करेंगे. एक शनिवार  मैं करुँगी और दूसरे शनिवार मृत्यंजय. ऐसे शुरू हुई एंकरिंग. उसके बाद आजतक के जितने भी प्रोग्राम उस वक़्त लॉन्च हुए उसको मैंने एंकर किया. सुबह आजतक को मैंने एंकर किया. आजतक के पहले बहस वाले प्रोग्राम को न मैंने एंकर किया बल्कि उसको प्रोड्यूस भी किया. पहला लाइव इलेक्शन में भी मैंने एंकरिंग की. हालाँकि दूसरे में दिबांग और आशुतोष भी आ गए थे.  इस तरह एंकरिंग की शुरुआत भी अचानक ही बिना सोंचे-समझे हो गयी. 
टेलीविजन इंडस्ट्री में बदलाव :
 
टेलीवजन इंडस्ट्री में तकनीकी रूप से काफी बदलाव हुआ है. तकनीक के मामले में काफी विकास हुआ है. लेकिन उस गति से ह्यूमन रिसर्च की वैल्यू नहीं बढ़ी.  हालाँकि कई बार लगता है कि अब उसकी जरूरत भी नहीं रह गयी है. मुझे अब भी बखूबी याद है कि जब हमने पहला इलेक्शन कवर किया था. उसके पहले एक महीने तक सीपीसी (सेन्ट्रल प्रोड्क्शन सेंटर) गए जहाँ इलेक्शन से सम्बंधित रोजाना बाकायदा हमारी क्लास होती थी.  मेरा अलावा, प्रभु चावला, वीर सांघवी,  करण थापर, संजय पुगलिया, मृत्युंजय झा, योगेन्द्र यादव, प्रो.आनंद कुमार, तवलीन कोई दस-ग्यारह लोग थे. 
उस वक़्त हम ऑफिस नहीं जाते थे. सीधे सीपीसी जाते थे. एक महीने तक हमारी क्लास हुई थी. वोट पैट्रन, जातीय समीकरण, भौगोलिक परिस्थिति छोटी - छोटी सी बात की जानकारी हमने हासिल की थी. हमने बाकायदा नोट्स बनाये थे. 1999 के इलेक्शन में वह नोट्स काम आये. इतना अधिक पढ़ा जिसका कोई हिसाब नहीं. कालेज एक्जाम के तर्ज पर हमने इलेक्शन से संबधित पढाई की. लेकिन अब कोई मूर्ख ही होगा जो इतना पढ़ेगा. अब तो दोपहर तक मामला ही साफ़ हो जाता है. अब पहले की तरह उतनी ज्यादा जानकारी देने का समय ही नहीं मिलता. 1998 में हमने इलेक्शन कवरेज 72 घंटों  का किया था. अब तो मामला सात - आठ घंटे  में पूरी तरह से साफ हो जाता है. अब सबकुछ इतनी तेजी से होता है कि डिस्कशन के लिए उतना समय ही नहीं होता. तकनीक के मामले में इतनी अधिक प्रगति हुई है कि पलक झपकते ही आप स्पोट पर पहुँच जाते है. यह सब अपने आप में अद्भूत है और दर्शकों के लिए मैं बहुत खुश हूँ. लेकिन सच मानिये ऐसी तकनीक की हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी. 
महिला पत्रकारों की स्थिति में सुधार :
 
मैं चुकी पहले से ही पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय थी.  इसलिए आजतक में मैंने स्पेशल कारसपोंडेन्ट के तौर पर ही ज्वाइन किया. मेरे बाद अंजू पंकज आई. अंजू के एक साल बाद नगमा बतौर ट्रेनी जर्नलिस्ट आई. फिर सिक्ता आई. ऐसी ही कई और लड़कियां ट्रेनी और इन्टर्न के तौर पर आजतक से जुडी. लेकिन उस वक़्त महिला पत्रकारों कि संख्या बहुत कम थी. उस परिप्रेक्ष्य में आज इंडस्ट्री में महिला पत्रकारों की संख्या देखकर प्रसन्नता होती है. बहुत बदलाव आया है और स्थित बेहतर हुई है. महिलाओं को भी महत्त्वपूर्ण काम दिए जा रहे हैं. लेकिन अभी भी सुधार की काफी गुंजाईश है. 
महिला पत्रकारों के लिए घर और ऑफिस के बीच सामंजस्य बैठाने की चुनौती :
 
मेरा मानना है कि एक महिला जो कामकाज के लिए बाहर निकली है वह पहले से ही इतनी जुझारू होती है कि सबकुछ मैनेज कर लेती है. 10 से 5बजे तक की नौकरी करने के बावजूद महिला घर में आते ही रसोई घर में घुस जाती है. सब्जी काटने लग जाती है. क्या कोई पुरुष ऐसा कर सकता है. महिलाओं के ऊपर डे-टू-डे की जिम्मदारी होती. लेकिन महिलाओं में ऐसी आंतरिक शक्ति होती है कि वह सबकुछ संभाल लेती है  . फिर महिलाओं को शुरू से ऐसा परिवेश भी दिया जाता है जिससे उनके अंदर ये सब करने की मानसिक प्रतिबद्धता आ जाती है. मुझे ही देखिये. इतने सालों से नौकरी कर रही हूँ और घर - परिवार भी देख रही हूँ और ईश्वर की दया से सब ठीक है. हमसब खुश हैं. हाँ यह जरूर है कि पुरुषों की तुलना में  महिलाओं के सामने चुनौतियाँ ज्यादा होती है. 
सबसे चुनौतीपूर्ण एंकरिंग :
 
एंकरिंग और रिपोर्टिंग के दौरान कई ऐसी घटनाएँ घटी है जो मुझे अबतक याद है. उस विषय पर एंकरिंग करना या रिपोर्टिंग करना बेहद चुनौतीपूर्ण था. लेकिन बहुत पीछे न जाते हुए  मैं ज़ी न्यूज़ में रहते हुए गुड़िया वाले मामले का जिक्र करना चाहूंगी. उसकी छोटी सी कहानी थी कि गुड़िया नाम की एक लड़की की शादी एक फौजी से होती है जो बाद में फौज के द्वारा लापता घोषित कर दिया जाता है.  सात साल तक जब उसकी कोई खबर नहीं मिलती है तो मान लिया जाता है की वह नहीं रहा. लेकिन बाद में वह वापस सही-सलामत आ जाता है. इस बीच वह पकिस्तान के जेल में था जहाँ  से बाद में छूट कर भारत वापस आ गया. लेकिन इस बीच में गुड़िया की शादी  फौजी के चचेरे भाई से हो जाती है . और वह गर्भवती भी हो जाती है. अब उसको लेकर जो हंगामा हुआ और उसके बाद ज़ी में जैसा प्रोग्राम हुआ उसमें  मुझे एंकर की अपनी भूमिका निभानी पड़ी. वह कार्यक्रम  दो  दिन चला. वह इतना कठिन प्रोग्राम था कि उसको याद करके अब भी रोंगटे खड़े हो जाते है. क्योंकि यह पूरा एरिया कई संस्थानों ने घेर लिया था मुस्लिम धर्म से जुड़ा मामला था. पूरा मामला बेहद पेंचीदा था.  चुकी गुड़िया की दूसरी शादी हुई तो यह मानकर कि उसका पहला पति दुनिया में नहीं उससे अलग होने की कोई प्रक्रिया नहीं हुई. उस हिसाब से यह दूसरी शादी को कोई मान्यता नहीं. उस हिसाब से गुड़िया के पेट में पल रहा बच्चा का क्या होगा ? पूरा मामला बिलकुल उलझा हुआ था. उसको करने की प्रक्रिया  में हमपर कई इल्जाम भी लगे .

व्यक्तिगत रूप से कार्यक्रम को पेश करना मेरे लिए बड़ी चुनौती थी. मुझे लग रहा था कि मेरे मुंह से एक गलत लब्ज बहुत बड़ा हंगामा खड़ा हो सकता था. चैनल का नाम ख़राब होता और मेरे करियर पर असर पड़ता सो अलग.   पूरा कार्यक्रम जब हो गया तब मैंने कहा कि पता नहीं
मैंने  ये कैसे किया.? मुझे खुद इसका पता नहीं था. मुझे लगता है कि ऊपर की कोई शक्ति थी जिसने मुझसे सब ठीक करवाया. लेकिन मुझे याद है वो समय बेहद तनावपूर्ण था. एक ही मामले में शादी , बच्चा, फौज, धर्म कई विषय एक साथ थे. ऊपर से मैं हिन्दू धर्म से थी और वहां कुरान की आयतें पढ़ी जा रही थी. ऐसे में मेरे मुंह से निकला एक गलत लफ्ज़  कितना बड़ा हंगामा खड़ा कर सकता था, उसके बारे में अंदाज़ा लगाकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. इसलिए उस कार्यक्रम की सफलता का श्रेय मैं खुद लेती भी नहीं. मुझे लगता है कि कोई ऐसी अनजान ताकत थी जो यह देख रही थी कि मैं बड़े सच्चे मन से ये सब  कर रही हूँ इसलिए इसे सफलता मिलनी चाहिए.

मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण थी गुड़िया की चाहत. गुड़िया क्या चाहती है ? किसके साथ रहना चाहती है ? वह बच्चे के साथ ज्यादा खुश किसके साथ रह पाएगी. इसलिए उसे बचाने के लिए मैंने अपने ऊपर कई इल्जाम लिए. उसे इन सब से बचाया.

बहस जब ख़त्म  हुई तो बाहर चैनल में भी सबके चेहरे लाल थे. सब यही देख रहे थे कि न जाने क्या होने वाला है. यहाँ तक कि लक्ष्मी जी जो डायरेक्टर हैं वो भी बैचेन थे. उस कार्यक्रम के बाद मेरे पास ढेरों  मैसेज आये. खुद प्रणव रॉय ने लक्ष्मी जी के पास मैसेज भेजा जिसे उन्होंने मुझे फॉरवर्ड किया. कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद भी एक - दो दिन मुझे सहज होने में लगे. इसे मैं कभी भूल नहीं सकती.

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हैप्पी होली

लगाते हो जो मुझे हरा रंग
मुझे लगता है
बेहतर होता
कि, तुमने लगाये होते
कुछ हरे पौधे
और जलाये न होते
बड़े पेड़ होली में।
देखकर तुम्हारे हाथों में रंग लाल
मुझे खून का आभास होता है
और खून की होली तो
कातिल ही खेलते हैं मेरे यार
केसरी रंग भी डाल गया है
कोई मुझ पर
इसे देख सोचता हूँ मैं
कि किस धागे से सिलूँ
अपना तिरंगा
कि कोई उसकी
हरी और केसरी पट्टियाँ उधाड़कर
अलग अलग झँडियाँ बना न सके
उछालकर कीचड़,
कर सकते हो गंदे कपड़े मेरे
पर तब भी मेरी कलम
इंद्रधनुषी रंगों से रचेगी
विश्व आकाश पर सतरंगी सपने
नीले पीले ये सुर्ख से सुर्ख रंग, ये अबीर
सब छूट जाते हैं, झट से
सो रंगना ही है मुझे, तो
उस रंग से रंगो
जो छुटाये से बढ़े
कहाँ छिपा रखी है
नेह की पिचकारी और प्यार का रंग?
डालना ही है तो डालो
कुछ छींटे ही सही
पर प्यार के प्यार से
इस बार होली में।

-विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

नवगीत: रंगों का नव पर्व बसंती ---संजीव सलिल

नवगीत:

रंगों का नव पर्व बसंती

--संजीव सलिल
*
रंगों का नव पर्व बसंती
सतरंगा आया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

आशा पंछी को खोजे से
ठौर नहीं मिलती.
महानगर में शिव-पूजन को
बौर नहीं मिलती.
चकित अपर्णा देख, अपर्णा
है भू की काया.
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

कागा-कोयल का अंतर अब
जाने कैसे कौन?
चित्र किताबों में देखें,
बोली अनुमानें मौन.
भजन भुला कर डिस्को-गाना
मंदिर में गाया.
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

है अबीर से उन्हें एलर्जी,
रंगों से है बैर
गले न लगते, हग करते हैं
मना जान की खैर
जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर
'सलिल' मुस्कुराया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

बाल कल्याण संस्थान खटीमा द्वारा आयोजित इण्डो नेपाल बाल साहित्तकार सम्मेलन , दिनांक २० , २१ फरवरी २०१० को संपन्न हुआ .


मां पूर्णागिरि की छांव में , नेपाल की सरहद के पास ,हिमालय की तराई .. खटीमा , उत्तराखण्ड ...खटीमा फाइबर्स की रिसाइकल्ड पेपर फैक्ट्री का मनमोहक परिवेश ... आयोजको का प्रेमिल आत्मीय व्यवहार ...बाल कल्याण संस्थान खटीमा द्वारा आयोजित इण्डो नेपाल बाल साहित्तकार सम्मेलन , दिनांक २० , २१ फरवरी २०१० को संपन्न हुआ .



कानपुर में एक बच्चे ने स्कूल में अपने साथी को गोली मार दी ... बच्चो को हम क्या संस्कार दे पा रहे हैं ? क्या दिये जाने चाहिये ? बाल साहित्य की क्या भूमिका है , क्या चुनौतियां है ? इन सब विषयो पर गहन संवाद हुआ . दो देशो , १४ राज्यो के ६० से अधिक साहित्यकार जुटें और काव्य गोष्ठी न हो , ऐसा भला कैसे संभव है ... रात्रि में २ बजे तक कविता पाठ हुआ .. जो दूसरे दिन के कार्यक्रमों में भी जारी रहा ..




९४ वर्षीय बाल कल्याण संस्थान खटीमा के अध्यक्ष आनन्द प्रकाश रस्तोगी की सतत सक्रियता , साहित्य प्रेम , व आवाभगत से हम सब प्रभावित रहे .. ईश्वर उन्हें चिरायु , स्वस्थ रखे . अन्त में आगत रचनाकारो को सम्मानित भी किया गया ..उत्तराखण्ड के मुख्य सूचना आयुक्त डा आर एस टोलिया जी ने कार्यक्रम का मुख्य आतिथ्य स्वीकार किया
रचनाकारो ने परस्पर किताबो, पत्रिकाओ , रचनाओ ,विचारो का आदान प्रदान किया

कुमायनी होली .. का आगाज ..स्थानीय डा. जोशी के निवास पर ..हम रचनाकारो के साथ ..

गीत : सबको हक है जीने का --संजीव 'सलिल'

गीत :

संजीव 'सलिल'

सबको हक है जीने का,
चुल्लू-चुल्लू पीने का.....
*
जिसने पाई श्वास यहाँ,
उसने पाई प्यास यहाँ.
चाह रचा ले रास यहाँ.
हर दिन हो मधुमास यहाँ.
आह न हो, हो हास यहाँ.
आम नहीं हो खास यहाँ.

जो चाहा वह पा जाना
है सौभाग्य नगीने का.....
*
कोई अधूरी आस न हो,
स्वप्न काल का ग्रास न हो.
मनुआ कभी उदास न हो,
जीवन में कुछ त्रास न हो.
विपदा का आभास न हो.
असफल भला प्रयास न हो.

तट के पार उतरना तो
है अधिकार सफीने का.....
*
तम है सघन, उजास बने.
लक्ष्य कदम का ग्रास बने.
ईश्वर का आवास बने.
गुल की मदिर सुवास बने.
राई, फाग हुलास बने.
खास न खासमखास बने.

ज्यों की त्यों चादर रख दें
फन सीखें हम सीने का.....
******

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

भाषा,लिपि और व्याकरण :

भाषा,लिपि और व्याकरण

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैअपने विचार ,भावनाओं एवं अनुभुतियों को वह भाषा के माध्यम से ही व्यक्त करता हैमनुष्य कभी शब्दों ,कभी सिर हिलाने या संकेत द्वारा वह संप्रेषण का कार्य करता हैकिंतु भाषा उसे ही कहते है ,जो बोली और सुनी जाती हो,और बोलने का तात्पर्य गूंगे मनुष्यों या पशु -पक्षियों का नही ,बल्कि बोल सकने वाले मनुष्यों से अर्थ लिया जाता हैइस प्रकार -

"भाषा वह साधन है, जिसके माध्यम से हम सोचते है तथा अपने विचारों को व्यक्त करते है। "

मनुष्य ,अपने भावों तथा विचारों को दो प्रकार ,से प्रकट करता है-
१.बोलकर (मौखिक )
२. लिखकर (लिखित)
.मौखिक भाषा :- मौखिक भाषा में मनुष्य अपने विचारों या मनोभावों को बोलकर प्रकट करते हैमौखिक भाषा का प्रयोग तभी होता है,जब श्रोता सामने होइस माध्यम का प्रयोग फ़िल्म,नाटक,संवाद एवं भाषण आदि में अधिक होता है

.लिखित भाषा:-भाषा के लिखित रूप में लिखकर या पढ़कर विचारों एवं मनोभावों का आदान-प्रदान किया जाता हैलिखित रूप भाषा का स्थायी माध्यम होता हैपुस्तकें इसी माध्यम में लिखी जाती है


भाषा और बोली :- भाषा ,जब कोई किसी बड़े भू-भाग में बोली जाने लगती है,तो उसका क्षेत्रीय भाषा विकसित होने लगता हैइसी क्षेत्रीय रूप को बोली कहते हैकोई भी बोली विकसित होकर साहित्य की भाषा बन जाती हैजब कोई भाषा परिनिष्ठित होकर साहित्यिक भाषा के पद पर आसीन होती है,तो उसके साथ ही लोकभाषा या विभाषा की उपस्थिति अनिवार्य होती हैकालांतर में ,यही लोकभाषा परिनिष्ठित एवं उन्नत होकर साहित्यिक भाषा का रूप ग्रहण कर लेती हैआज जो हिन्दी हम बोलते है या लिखते है ,वह खड़ी बोली है, इसके पूर्व अवधी,ब्रज ,मैथिली आदि बोलियाँ भी साहित्यिक भाषा के पद पर आसीन हो चुकी है। (हिन्दी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में यहाँ देखें। )


हिन्दी तथा अन्य भाषाएँ :- संसार में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैजैसे -अंग्रेजी,रुसी,जापानी,चीनी,अरबी,हिन्दी ,उर्दू आदिहमारे भारत में भी अनेक भाषाएँ बोली जाती हैजैसे -बंगला,गुजराती,मराठी,उड़िया ,तमिल,तेलगु आदिहिन्दी भारत में सबसे अधिक बोली और समझी जाती हैहिन्दी भाषा को संविधान में राजभाषा का दर्जा दिया गया है


लिपि:- लिपि का शाब्दिक अर्थ होता है -लिखित या चित्रित करना ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है,वही लिपि कहलाती है प्रत्येक भाषा की अपनी -अलग लिपि होती हैहिन्दी की लिपि देवनागरी हैहिन्दी के अलावा -संस्कृत ,मराठी,कोंकणी,नेपाली आदि भाषाएँ भी देवनागरी में लिखी जाती है


व्याकरण :- व्याकरण वह विधा है,जिसके द्वारा किसी भाषा का शुद्ध बोलना या लिखना जाना जाता हैव्याकरण भाषा की व्यवस्था को बनाये रखने का काम करते हैव्याकरण भाषा के शुद्ध एवं अशुद्ध प्रयोगों पर ध्यान देता हैइस प्रकार ,हम कह सकते है कि प्रत्येक भाषा के अपने नियम होते है,उस भाषा का व्याकरण भाषा को शुद्ध लिखना बोलना सिखाता हैव्याकरण के तीन मुख्य विभाग होते है :-

१.वर्ण -विचार :- इसमे वर्णों के उच्चारण ,रूप ,आकार,भेद,आदि के सम्बन्ध में अध्ययन होता है।
२.शब्द -विचार :- इसमे शब्दों के भेद ,रूप,प्रयोगों तथा उत्पत्ति का अध्ययन किया जाता है।
३.वाक्य -विचार:- इसमे वाक्य निर्माण ,उनके प्रकार,उनके भेद,गठन,प्रयोग, विग्रह आदि पर विचार किया जाता है।
 
                                                                                                           aabhaar : hindi kunj 
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सामाजिक प्रश्न: एक चिंतन ---आचार्य संजीव 'सलिल'

'गोत्र' तथा 'अल्ल' 


'गोत्र' तथा 'अल्ल' के अर्थ तथा महत्व संबंधी प्रश्न राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद् का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के नाते मुझसे पूछे जाते हैं.

स्कन्दपुराण में वर्णित श्री चित्रगुप्त प्रसंग के अनुसार उनके बारह पुत्रों
को बारह ऋषियों के पास विविध विषयों की शिक्षा हेतु भेजा गया था. इन से ही कायस्थों की बारह उपजातियों का श्री गणेश हुआ. ऋषियों के नाम ही उनके शिष्यों के गोत्र हुए. इसी कारण विभिन्न जातियों में एक ही गोत्र मिलता है चूंकि ऋषि के पास विविध जाती के शिष्य अध्ययन करते थे. आज कल जिस तरह मॉडल स्कूल में पढ़े विद्यार्थी 'मोडेलियन' रोबेर्त्सों कोलेज में पढ़े विद्यार्थी 'रोबर्टसोनियन' आदि कहलाते हैं, वैसे ही ऋषियों के शिष्यों के गोत्र गुरु के नाम पर हुए. आश्रमों में शुचिता बनाये रखने के लिए सभी शिष्य आपस में गुरु भाई तथा गुरु बहिनें मानी जाती थीं. शिष्य गुरु के आत्मज (संततिवत) मान्य थे. अतः, उनमें आपस में विवाह वर्जित होना उचित ही था.

एक 'गोत्र' के अंतर्गत कई 'अल्ल' होती हैं. 'अल्ल' कूट शब्द (कोड) या पहचान चिन्ह है जो कुल के किसी प्रतापी पुरुष, मूल स्थान, आजीविका, विशेष योग्यता, मानद उपाधि या अन्य से सम्बंधित होता है. एक 'अल्ल' में विवाह सम्बन्ध सामान्यतया वर्जित मन जाता है किन्तु आजकल अधिकांश लोग अपने 'अल्ल' की जानकारी नहीं रखते. 


हमारा गोत्र 'कश्यप' है जो अधिकांश कायस्थों का है तथा उनमें आपस में विवाह सम्बन्ध होते हैं. हमारी अल्ल 'उमरे' है. मुझे इस अल्ल का अब तक केवल एक अन्य व्यक्ति मिला है. मेरे फूफा जी की अल्ल 'बैरकपुर के भले' है. उनके पूर्वज बैरकपुर से नागपुर जा बसे थे .
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शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

पठनीय रचना: शब्द मेरे हैं -प्रतिभा सक्सेना

शब्द मेरे हैं
अर्थ मैंने ही दिये ये शब्द मेरे हैं !
व्यक्ति औ अभिव्यक्ति को एकात्म करते जो ,
यों कि मेरे आत्म का प्रतिरूप धरते हों !
स्वरित मेरे स्वत्व के
मुखरित बसेरे हैं !
शब्द मेरे हैं !
*
स्वयं वाणी का कलामय तंत्र अभिमंत्रित,
लग रहा ये प्राण ही शब्दित हुये मुखरित,
सृष्टि के संवेदनों की चित्र-लिपि धारे
सहज ही सौंदर्य के वरदान से मंडित !
शाम है विश्राममय
मुखरित सबेरे हैं !
शब्द मेरे हैं !
*
बाँसुरी ,उर-तंत्र में झंकार भरती जो ,
अतीन्द्रिय अनुभूति बन गुंजार करती जो
निराकार प्रकार को साकार करते जो
मनोमय हर कोश के
सकुशल चितेरे हैं !
शब्द मेरे हैं !
*
व्याप्ति है 'मैं' की जहाँ तक विश्व- दर्पण में ,
प्राप्ति है जितनी कि निजता के समर्पण में
भूमिका धारे वहन की अर्थ-तत्वों के,
अंजली भर -भर दिशाओं ने बिखेरे हैं !
*
पूर्णता पाकर अहेतुक प्रेम से लहरिल
मनःवीणा ने अमल स्वर ये बिखेरे हैं !
ध्वनि समुच्चय ही न
इनके अर्थ गहरे हैं !
शब्द मेरे हैं !
                                        साभार: ईकविता
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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

दोहे चुनाव सुधार के : --संजीव 'सलिल'

दोहे चुनाव सुधार के :

संजीव 'सलिल'

बिन प्रचार के हों अगर, नूतन आम चुनाव.
भ्रष्टाचार मिटे 'सलिल', तनिक न हो दुर्भाव.

दल का दलदल ख़त्म हो, कोई न करे प्रचार.
सब प्रतिनिधि मिलकर गढ़ें, राष्ट्रीय सरकार.

मतदाता चाहे जिसे, लिखकर उसका नाम.
मतपेटी में डाल दे, प्रतिनिधि हो निष्काम..

भाषा भूषा प्रान्त औ' मजहब की तकरार.
बाँट रही है देश को, जनता है बेज़ार..

समय सम्पदा श्रम बचे, प्रतिनिधि होंगे श्रेष्ठ.
लोग उसी को चुनेंगे, जो सद्गुण में ज्येष्ठ..

संसद में सरकार संग, रहें समर्थक पक्ष.
कहीं विरोधी हो नहीं, दें सब शासन दक्ष..

सुलझा लें असद्भाव से, जब भी हों मतभेद.
'सलिल' सभी कोशिश करें, हो न सके मनभेद..

सब जन प्रतिनिधि हों एक तो, जग पाए सन्देश.
भारत से डरकर रहो, तभी कुशल हो शेष..

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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

असहमति: विदेशी पर्व अवश्य मनाएं

असहमति:

विदेशी पर्व अवश्य मनाएं

मित्रों!

वैलेंटाइन दिवस एक संत की स्मृति में मनाया  जानेवाला विदेशी पर्व है.उस देश के तत्कालीन सत्ताधीशों की रीति-नीति से असंतुष्ट जनगण की कामनाओं को अभिव्यक्त करें और अनुचित आदेश की अवज्ञा करने हेतु संत ने इस पर्व का उपयोग किया. युवाओं के मिलने को खतरा माननेवाली सत्ता का प्रतिकार युवाओं ने खुलेआम मिलकर किया. यह पर्व स्वतंत्र चेतना और निर्भीक अभिव्यक्ति का प्रतीक बन गया. कालांतर में देश की सीमा लांघकर यह वैश्विक पर्व बन गया.

युवाओं के मिलन पर्व को राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक परिवर्तन का अवसर न रहने देकर इसे दैहिक प्रेम की अभिव्यक्ति का पर्याय बनानेवालों ने संत के विचारों और आदर्शों की हत्या वैसे ही की जैसे गाँधीवादियों ने सत्ताप्रेमी बनकर गाँधी की है. आइये! हम इस पर्व की मूल भावना को जीवित रखें और इसे नव जागरण पर्व के रूप में मनाएँ..

स्वदेशी पर्वों की कमी है क्या जो विदेशी पर्व मनाएँ?

यह प्रश्न है उनका जो भारतीय संस्कृति के पक्षधर होने का दावा करते हैं. 'वसुधैव कुटुम्बकम', 'विश्वैकनीडम', 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' के पक्षधर भारतीय पर्व दीवाली, दशहरा, होली आदि विदेशों में मनाये जाने पर प्रसन्न होते हैं. फिर उन्हें भारत में विदेशी पर्व मनाये जाने पर आपत्ति क्यों है? विदेशी संस्कृति से अपरिचित भारतीय क्या विश्व बन्धुत्व ला सकेंगे?

अपने आचार-विचार और परम्पराओं को टाक पर रखकर फूहड़ता और बेहूदगी करनेवालों से भी मैं असहमत हूँ.

असहमत तो मैं डंडा फटकारने वालों से भी हूँ. होली पर हुडदंग होता है तो क्या होली बंद कर दी जाये?, पटाखों से दुर्घटना होती है तो क्या दीवाली पर प्रतिबन्ध हो?

हम संतुलित, समझदार  और समन्वयवादी हों तो देश-विदेश का कोई भी पर्व मनाएँ सौहार्द ही बढेगा.

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

दोहे की प्राचीन परंपरा: 1 आचार्य संजीव 'सलिल'

दोहे की प्राचीन परंपरा: 1

आचार्य संजीव 'सलिल'

*

भाषा सागर मथ मिला, गीति काव्य रस कोष.

समय शंख दोहा करे, शाश्वतता का घोष..

हिंदी के वर्तमान रूप का उद्भव संस्कृत तथा अपभ्रंश से हुआ. समय प्रवाह के साथ हिंदी ने भारतीय भू भाग के विविध अंचलों में प्रचलित भाषाओँ-बोलिओं के शब्द-भंडार तथा व्याकरण-पिंगल को अंगीकार कर स्वयं को समृद्ध किया. संस्कृत-प्राकृत के पिंगल कोष से दोहा रत्न प्राप्त कर हिंदी ने उसे सजाया, सँवारा, महिमा मंडित किया.

ललित छंद दोहा अमर, छंदों का सिरमौर.

हिंदी माँ का लाडला, इस सा छंद न और..

आरम्भ में 'दूहा' से हिंदी भाषा के पद्य का आशय लिया जाता था तथा प्रत्येक प्रकार के पद्य या छंद काव्य 'दूहा; ही कहलाते थे.१. कालांतर में क्रमशः दोहा का मानक रूप आकारित, परिभाषित तथा रूपायित होता गया.

लगभग दो सहस्त्र वर्ष पूर्व अस्तित्व में आये दोहा छंद को दूहा, दूहरा, दोहरा, दोग्धक, दुवअह, द्विपथा, द्विपथक, द्विपदिक, द्विपदी, दो पदी, दूहड़ा, दोहड़ा, दोहड़, दोहयं, दुबह, दोहआ आदि नामों संबोधित किया गया. आरंभ में इसे वर्णिक किन्तु बाद में मात्रिक छंद माना गया. दोहा अपने अस्तित्व काल के आरंभ से ही लोक जीवन, लोक परंपरा तथा लोक मानस से संपृक्त रहा है. २

दोहा में काव्य क्षमता का समावेश तो रहता ही है, संघर्ष और विचारों का तीखा स्वाद भी रहता है. दोहा छंद शास्त्र की अद्भुत कलात्मक देन है. ३

संस्कृत के द्विपदीय श्लोकों को दोहा-लेखन का मूल माना जा सकता है किन्तु लचीले छंद अनुष्टुप के प्रभाव तथा संस्कृत व्याकरण के अनुसार हलंत व् विसर्ग को उच्चारित करने पर मात्र गणना में न गिनने के कारण इस काल में रची गयी द्विपदियाँ दोहा के वर्तमान मानकों पर खरी नहीं उतरतीं. श्रीमदभगवत की निम्न तथा इसी तरह की अन्य द्विपदियाँ वर्तमान दोहा की पूर्वज कही जा सकती हैं.

नाहं वसामि वैकुंठे, योगिनां हृदये न च.

मद्भक्ता यात्रा गायंति, तत्र तिष्ठामि नारद..


बसूँ न मैं बैकुंठ में, योगी-उर न निवास.

नारद! गएँ भक्त जहँ, वहीं करूँ मैं वास..


नारद रचित 'संगीत मकरंद' में कवि के गुण-धर्म वर्णित करती निम्न पंक्तियाँ दोहा के निकट प्रतीत होती हैं.


शुचिर्दक्षः शान्तः सुजनः, विनतः सूनृततरः.

कलावेदी विद्वानति मृदु पदः काव्य चतुरः..

रसज्ञौ दैवज्ञः सरस हृदयः, सत्कुलभवः.

शुभाकारश्ददं दो गुण गण विवेकी सच कविः..


नम्र निपुण सज्जन विनत, नीतिवान शुचि शांत.

काव्य-चतुर मृदुपद रचे, कहलाये कवि कांत..

जो रसज्ञ-दैवज्ञ है, सरस ह्रदय सुकुलीन.

गुणी-विवेकी कुशल कवि, छवि-यश हो न मलीन..

______________________________

सन्दर्भ: १. बरजोर सिंह 'सरल', हिंदी दोहा सार, २. डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र', भूमिका शब्दों के संवाद- आचार्य भगवत दुबे, ३. आचार्य पूनमचंद तिवारी, समीक्षा दृष्टि.

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

दोहा गीत: धरती ने हरियाली ओढी -संजीव 'सलिल'

दोहा गीत: 
धरती ने हरियाली ओढी 
-संजीव 'सलिल'
*

धरती ने हरियाली ओढी,

मनहर किया सिंगार.,

दिल पर लोटा सांप

हो गया सूरज तप्त अंगार...

*

नेह नर्मदा तीर हुलसकर

बतला रहा पलाश.

आया है ऋतुराज काटने

शीत काल के पाश.



गौरा बौराकर बौरा की

करती है मनुहार.

धरती ने हरियाली ओढी,

मनहर किया सिंगार.

*

निज स्वार्थों के वशीभूत हो

छले न मानव काश.

रूठे नहीं बसंत, न फागुन

छिपता फिरे हताश.



ऊसर-बंजर धरा न हो,

न दूषित मलय-बयार.

धरती ने हरियाली ओढी,

मनहर किया सिंगार....

*

अपनों-सपनों का त्रिभुवन

हम खुद ना सके तराश.

प्रकृति का शोषण कर अपना

खुद ही करते नाश.



जन्म दिवस को बना रहे क्यों

'सलिल' मरण-त्यौहार?

धरती ने हरियाली ओढी,

मनहर किया सिंगार....

***************

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

बासंती दोहा ग़ज़ल --आचार्य संजीव वर्मा ’सलिल’

बासंती दोहा ग़ज़ल


आचार्य संजीव वर्मा ’सलिल’
*

स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार.

किंशुक कुसुम विहंस रहे या दहके अंगार..
*
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार.

पवन खो रहा होश है, लख वनश्री श्रृंगार..
*
महुआ महका देखकर, बहका-चहका प्यार.

मधुशाला में बिन पिए' सर पर नशा सवार..
*
नहीं निशाना चूकती, पञ्च शरों की मार.

पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार..
*
नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार.

देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार..
*
मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार.

ऋतु बसंत में मन करे, मिल में गले, खुमार..
*
ढोलक टिमकी मंजीरा, करें ठुमक इसरार.

तकरारों को भूलकर, नाचो गाओ यार..
*
घर आँगन तन धो लिया, सचमुच रूप निखार.

अपने मन का मेल भी, हँसकर 'सलिल' बुहार..
*
बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार.

सूरत-सीरत रख 'सलिल', निरमल-विमल सँवार..

*******

हास्य रचना: कान बनाम नाक --संजीव 'सलिल'

हास्य रचना:



कान बनाम नाक


संजीव 'सलिल'

*

शिक्षक खींचे छात्र के साधिकार क्यों कान?

कहा नाक ने: 'मानते क्यों अछूत श्रीमान?

क्यों अछूत श्रीमान? नहीं क्यों मुझे खींचते?

क्यों कानों को लाड-क्रोध से आप मींजते?'



शिक्षक बोला: 'छात्र की अगर खींच लूँ नाक.

कौन करेगा साफ़ यदि बह आएगी नाक?

बह आएगी नाक, नाक पर मक्खी बैठे.

ऊँची नाक हुई नीची तो हुए फजीते.


नाक एक तुम. कान दो, बहुमत का है राज.

जिसकी संख्या हो अधिक सजे शीश पर साज.

सजे शीश पर साज, सभी सम्बन्ध भुनाते.

गधा बाप को और गधे को बाप बताते.


नाक कटे तो प्रतिष्ठा का हो जाता अंत.

कान खींचे तो सहिष्णुता बढती बनता संत.

कान खींचे तो ज्ञान पा आँखें भी खुलतीं.

नाक खींचे तो श्वास बंद हो आँखें मुन्दतीं


कान ज्ञान को बाहर से भीतर पहुँचाते.

नाक बंद अन्दर की दम बाहर ले आते.

आँख, गाल न अधर खिंचाई-सुख पा सकते.

कान खिंचाकर पत्नी से लालू नित हँसते..

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

शिव भजन: स्व. शांति देवि वर्मा

शिव भजन



स्व. शांति देवि वर्मा
*
 
शिवजी की आयी बरात





शिवजी की आयी बरात,


चलो सखी देखन चलिए...




भूत प्रेत बेताल जोगिनी'


खप्पर लिए हैं हाथ.


चलो सखी देखन चलिए


शिवजी की आयी बरात....




कानों में बिच्छू के कुंडल सोहें,


कंठ में सर्पों की माला.


चलो सखी देखन चलिए


शिवजी की आयी बरात....




अंग भभूत, कमर बाघम्बर'


नैना हैं लाल विशाल.


चलो सखी देखन चलिए


शिवजी की आयी बरात....




कर में डमरू-त्रिशूल सोहे,


नंदी गण हैं साथ.


शिवजी की आयी बरात,


चलो सखी देखन चलिए...




कर सिंगार भोला दूलह बन के,


नंदी पे भए असवार.


शिवजी की आयी बरात,


चलो सखी देखन चलिए...




दर्शन कर सुख-'शान्ति' मिलेगी,


करो रे जय-जयकार.


शिवजी की आयी बरात,


चलो सखी देखन चलिए...




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गिरिजा कर सोलह सिंगार




गिरिजा कर सोलह सिंगार


चलीं शिव शंकर हृदय लुभांय...




मांग में सेंदुर, भाल पे बिंदी,


नैनन कजरा लगाय.


वेणी गूंथी मोतियन के संग,


चंपा-चमेली महकाय.


गिरिजा कर सोलह सिंगार...




बांह बाजूबंद, हाथ में कंगन,


नौलखा हार सुहाय.


कानन झुमका, नाक नथनिया,


बेसर हीरा भाय.


गिरिजा कर सोलह सिंगार...




कमर करधनी, पाँव पैजनिया,


घुँघरू रतन जडाय.


बिछिया में मणि, मुंदरी मुक्ता,


चलीं ठुमुक बल खांय.


गिरिजा कर सोलह सिंगार...




लंहगा लाल, चुनरिया पीली,


गोटी-जरी लगाय.


ओढे चदरिया पञ्च रंग की ,


शोभा बरनि न जाय.


गिरिजा कर सोलह सिंगार...




गज गामिनी हौले पग धरती,


मन ही मन मुसकाय.


नत नैनों मधुरिम बैनों से


अनकहनी कह जांय.


गिरिजा कर सोलह सिंगार...




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मोहक छटा पार्वती-शिव की




मोहक छटा पार्वती-शिव की


देखन आओ चलें कैलाश....




ऊँचो बर्फीलो कैलाश पर्वत,


बीच बहे गैंग-धार.


मोहक छटा पार्वती-शिव की...




शीश पे गिरिजा के मुकुट सुहावे


भोले के जटा-रुद्राक्ष.


मोहक छटा पार्वती-शिव की...




माथे पे गौरी के सिन्दूर-बिंदिया


शंकर के नेत्र विशाल.


मोहक छटा पार्वती-शिव की......




उमा के कानों में हीरक कुंडल,


त्रिपुरारी के बिच्छू कान


मोहक छटा पार्वती-शिव की.....




कंठ शिवा के मोहक हरवा,


नीलकंठ के नाग.


मोहक छटा पार्वती-शिव की......




हाथ अपर्णा के मुक्ता कंगन,


बैरागी के डमरू हाथ.


मोहक छटा पार्वती-शिव की...




सती वदन केसर-कस्तूरी,


शशिधर भस्मी राख़.


मोहक छटा पार्वती-शिव की.....




महादेवी पहने नौ रंग चूनर,


महादेव सिंह-खाल.


मोहक छटा पार्वती-शिव की......




महामाया चर-अचर रच रहीं,


महारुद्र विकराल.


मोहक छटा पार्वती-शिव की......




दुर्गा भवानी विश्व-मोहिनी,


औढरदानी उमानाथ.


मोहक छटा पार्वती-शिव की...




'शान्ति' शम्भू लख जनम सार्थक,


'सलिल' अजब सिंगार.


मोहक छटा पार्वती-शिव की...


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भोले घर बाजे बधाई




मंगल बेला आयी, भोले घर बाजे बधाई ...




गौर मैया ने लालन जनमे,


गणपति नाम धराई.


भोले घर बाजे बधाई ...




द्वारे बन्दनवार सजे हैं,


कदली खम्ब लगाई.


भोले घर बाजे बधाई ...




हरे-हरे गोबर इन्द्राणी अंगना लीपें,


मोतियन चौक पुराई.


भोले घर बाजे बधाई ...




स्वर्ण कलश ब्रम्हाणी लिए हैं,


चौमुख दिया जलाई.


भोले घर बाजे बधाई ...


लक्ष्मी जी पालना झुलावें,


झूलें गणेश सुखदायी.

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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

स्मृति गीत: हर दिन पिता याद आते हैं... --संजीव 'सलिल'

स्मृति गीत:

हर दिन पिता याद आते हैं...

संजीव 'सलिल'

*

जान रहे हम अब न मिलेंगे.

यादों में आ, गले लगेंगे.

आँख खुलेगी तो उदास हो-

हम अपने ही हाथ मलेंगे.

पर मिथ्या सपने भाते हैं.

हर दिन पिता याद आते हैं...

*

लाड, डांट, झिडकी, समझाइश.

कर न सकूँ इनकी पैमाइश.

ले पहचान गैर-अपनों को-

कर न दर्द की कभी नुमाइश.

अब न गोद में बिठलाते हैं.

हर दिन पिता याद आते हैं...

*

अक्षर-शब्द सिखाये तुमने.

नित घर-घाट दिखाए तुमने.

जब-जब मन कोशिश कर हारा-

फल साफल्य चखाए तुमने.

पग थमते, कर जुड़ जाते हैं

हर दिन पिता याद आते हैं...

*
divyanarmada.blogspot.com

नव गीत: जीवन की / जय बोल --संजीव 'सलिल'

जीवन की

जय बोल,

धरा का दर्द

तनिक सुन...

तपता सूरज

आँख दिखाता,

जगत जल रहा.

पीर सौ गुनी

अधिक हुई है,

नेह गल रहा.

हिम्मत

तनिक न हार-

नए सपने

फिर से बुन...

निशा उषा

संध्या को छलता

सुख का चंदा.

हँसता है पर

काम किसी के

आये न बन्दा...

सब अपने

में लीन,

तुझे प्यारी

अपनी धुन...

महाकाल के

हाथ जिंदगी

यंत्र हुई है.

स्वार्थ-कामना ही

साँसों का

मन्त्र मुई है.

तंत्र लोक पर,

रहे न हावी

कर कुछ

सुन-गुन...
 
* * *

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

सामयिक कविता: हर चेहरे की अलग कहानी, अलग रंग है. --संजीव 'सलिल'

सामयिक कविता:


संजीव 'सलिल'

*
हर चेहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.

अलग तरीका, अलग सलीका, अलग ढंग है...

*

भगवा कमल चढ़ा सत्ता पर जिसको लेकर


गया पाक बस में, आया हो बेबस होकर.

भाषण लच्छेदार सुनाये, सबको भये.

धोती कुरता गमछा धारे सबको भाये.

बरस-बरस उसकी छवि हमने विहँस निहारी.

ताली पीटो, नाम बताओ-    ......................

*
गोरी परदेसिन की महिमा कही न जाए.

सास और पति के पथ पर चल सत्ता पाए.

बिखर गया परिवार मगर क्या खूब सम्हाला?

देवरानी से मन न मिला यह गड़बड़ झाला.

इटली में जन्मी, भारत का ढंग ले लिया.

बहुत दुलारी भारत माँ की नाम? .........

*

यह नेता भैंसों को ब्लैक बोर्ड बनवाता.

कुर्सी पड़े छोड़ना, बीबी को बैठाता.

घर में रबड़ी रखे मगर खाता था चारा.

जनता ने ठुकराया अब तडपे बेचारा.

मोटा-ताज़ा लगे, अँधेरे में वह भालू.

जल्द पहेली बूझो नाम बताओ........?

*

माया की माया न छोड़ती है माया को.

बना रही निज मूर्ति, तको बेढब काया को.

सत्ता प्रेमी, कांसी-चेली, दलित नायिका.

नचा रही है एक इशारे पर विधायिका.

गुर्राना-गरियाना ही इसके मन भाया.

चलो पहेली बूझो, नाम बताओ........

*

छोटी दाढीवाला यह नेता तेजस्वी.

कम बोले करता ज्यादा है श्रमी-मनस्वी.

नष्ट प्रान्त को पुनः बनाया, जन-मन जीता.

मरू-गुर्जर प्रदेश सिंचित कर दिया सुभीता.

गोली को गोली दे, हिंसा की जड़ खोदी.

कर्मवीर नेता है भैया ........................

*

बंगालिन बिल्ली जाने क्या सोच रही है?

भय से हँसिया पार्टी खम्बा नोच रही है.

हाथ लिए तृण-मूल, करारी दी है टक्कर.

दिल्ली-सत्ताधारी काटें इसके चक्कर.

दूर-दूर तक देखो इसका हुआ असर जी.

पहचानो तो कौन? नाम .....................

*

तेजस्वी वाचाल साध्वी पथ भटकी है.

कौन बताये किस मरीचिका में अटकी है?

ढाँचा गिरा अवध में उसने नाम काया.

बनी मुख्य मंत्री, सत्ता सुख अधिक न भाया.

बडबोलापन ले डूबा, अब है गुहारती.

शिव-संगिनी का नाम मिला, है ...............

*

मध्य प्रदेशी जनता के मन को जो भाया.

दोबारा सत्ता पाकर भी ना इतराया.

जिसे लाडली बेटी पर आता दुलार है.

करता नव निर्माण, कर रहा नित सुधार है.

दुपहर भोजन बाँट, बना जन-मन का तारा.

जल्दी नाम बताओ वह ............. हमारा.

*
डर से डरकर बैठना सही न लगती राह.

हिम्मत गजब जवान की, मुँह से निकले वाह.

घूम रहा है प्रान्त-प्रान्त में नाम कमाता.

गाँधी कुल का दीपक, नव पीढी को भाता.

जन मत परिवर्तन करने की लाता आँधी.

बूझो-बूझो नाम बताओ ......................

*

बूढा शेर बैठ मुम्बई में चीख रहा है.

देश बाँटता, हाय! भतीजा दीख रहा है.

पहलवान है नहीं मुलायम अब कठोर है.

धनपति नेता डूब गया है, कटी डोर है.

शुगर किंग मँहगाई अब तक रोक न पाया.

रबर किंग पगड़ी बाँधे, पहचानो भाया.

*

रंग-बिरंगे नेता करते बात चटपटी.

ठगते सबके सब जनता को बात अटपटी.

लोकतन्त्र को लोभतंत्र में बदल हँस रहे.

कभी फांसते हैं औरों को कभी फँस रहे.

ढंग कहो, बेढंग कहो चल रही जंग है.

हर चहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.

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Poetry: Get well soon -sanjiv 'salil'

Get well soon.


de dushnman ko bhoon.


neta karte roz

loktantra ka khoon.


kuchh halat badal

kutar naheen nakhoon.


kha mehnat ke baad

tu roti do joon.


koshish bina 'salil'

milta naheen sukoon.

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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

पाती राज के नाम: संजीव 'सलिल'

 अजर अमर अक्षय अजित, अमित अनादि अनंत.

अनहद नादित ॐ ही, नभ भू दिशा दिगंत.


प्रणवाक्षर ओंकार ही, रचता दृष्ट-अदृष्ट.

चित्र चित्त में गुप्त जो, वही सभी का इष्ट.


चित्र गुप्त साकार हो, तभी बनें आकार.

हर आकार-प्रकार से, हो समृद्ध संसार.


कण-कण में बस वह करे, प्राणों का संचार.

हर काया में व्याप्त वह, उस बिन सृष्टि असार.


स्वामी है वह तिमिर का, वह प्रकाश का नाथ.

शान्ति-शोर दोनों वही, सदा सभी के साथ.


कंकर-कंकर में वही शंकर, तन में आत्म.

काया स्थित अंश का, अंशी वह परमात्म.


वह विदेह ही देह का, करता है निर्माण.

देही बन निष्प्राण में, वही फूंकता प्राण.


वह घट है आकाश में, वह घट का आकाश.

करता वह परमात्म ही, सबमें आत्म-प्रकाश.


वह ही विधि-हरि-हर हुआ, वह अनुराग-विराग.

शारद-लक्ष्मी-शक्ति वह, भुक्ति-मुक्ति, भव त्याग.


वही अनामी-सुनामी, जल-थल-नभ में व्याप्त.

रव-कलरव वह मौन भी, वेद वचन वह आप्त.


उससे सब उपजे, हुए सभी उसी में लीन.

वह है, होकर भी नहीं, वही ‘सलिल’ तट मीन.


वही नर्मदा नेह की, वही मोह का पाश.

वह उत्साह-हुलास है, वह नैराश्य हताश.


वह हम सब में बसा है, किसे कहे तू गैर.

महाराष्ट्र क्यों राष्ट्र की, नहीं चाहता खैर?


कौन पराया तू बता?, और सगा है कौन?

राज हुआ नाराज क्यों ख़ुद से?रह अब मौन.


उत्तर-दक्षिण शीश-पग, पूरब-पश्चिम हाथ.

ह्रदय मध्य में ले बसा, सब हों तेरे साथ.


भारत माता कह रही, सबका बन तू मीत.

तज कुरीत, सबको बना अपना, दिल ले जीत.


सच्चा राजा वह करे जो हर दिल पर राज.

‘सलिल’ तभी चरणों झुकें, उसके सारे ताज.


salil.sanjiv@gmail.com / sanjivsalil.blogspot.com

आज की रचना: संजीव 'सलिल'

सत्ता की जय बोलिए, दुनिया का दस्तूर.

सत्ता पा मदमस्त हो, रहें नशे में चूर..
*

है विनाश की दिशा यह, भूल रहे सब जान.

वंशज हम धृतराष्ट्र के, सके न सच पहचान.
*


जो निज मन को जीत ले, उसे नमन कर मौन.

निज मन से यह पूछिए, छिपा आपमें कौन?.
 *


मुझे तुम न भूलीं, मुझे ज्ञात है यह.

तभी तो उषामय, मधुर प्रात है यह..
*


ये बासंती मौसम, हवा में खुनक सी-

परिंदों की चह-चह सा ज़ज्बात है यह..
*


काल ग्रन्थ की पांडुलिपि, लिखता जाने कौन?

जब-जब पूछा प्रश्न यह, उत्तर पाया मौन..
*


जय प्रकाश की बोलिए, मानस होगा शांत.

'सलिल' मिटाकर तिमिर को, पथ पायें निर्भ्रांत..

*

परिंदा नन्हा है छोटे पर मगर है हौसला.

बना ले तूफ़ान में भी, जोड़ तिनका घोंसला..
*


अश्वारोही रश्मि की, प्रभा निहारो मीत.

जीत तिमिर उजियार दे, जग मनभावन रीत..
*


हम 'मैं' बनकर जी रहे, 'तुम' से होकर दूर.

काश कभी 'हम एक' हों, खुसी मिले भरपूर..
*


अनिल अनल भू नभ सलिल, मिल भरते हैं रंग.

समझ न पाता साम्य तो, होता मानव तंग.
*


एक नहीं दो-दो मात्राएँ, नर से ज्यादा भारी.


आज नहीं चिर काल से, रहती आयी नारी..
*


मैन आप वूमैन वह, किसमें ज्यादा भार?

सत्य जान करिए नमन, करिए पायें प्यार.

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बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

गीतिका आदमी ही भला मेरा गर करेंगे

गीतिका
आदमी ही भला मेरा गर करेंगे.

बदी करने से तारे भी डरेंगे.


बिना मतलब मदद कर दे किसी की

दुआ के फूल तुझ पर तब झरेंगे.


कलम थामे, न जो कहते हकीकत

समय से पहले ही बेबस मरेंगे।


नरमदा नेह की जो नहाते हैं

बिना तारे किसी के खुद तरेंगे।


न रुकते जो 'सलिल' सम सतत बहते

सुनिश्चित मानिये वे जय वरेंगे।


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सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

रायपुर प्रेस क्लब में ब्लोग्गर्स मीट ---अभिषेक प्रसाद 'अवि'

रायपुर प्रेस क्लब में ब्लोगर्स बैठक

--अभिषेक प्रसाद 'अवि'

२४ जनवरी २०१०. पूर्व नियोजित समयानुसार रायपुर प्रेस क्लब में ब्लोगर्स बैठक का आयोजन हुआ. धन्यवाद डॉक्टर महेश सिन्हा जी को जिन्होंने न केवल मुझे उस बैठक में शामिल होने का मौका दिया बल्कि खुद मुझे मेरे घर से लेने आये और वापस घर तक पहुँचाया भी. अभी कुछ ही दिन पहले तक मैं उन्हें जानता तक नहीं था और आज उनसे एक गहरा अनजाना रिश्ता बन गया है.

बैठक का आरम्भ लगभग १५:०० बजे हुआ. यह रायपुर या यों कहें छत्तीसगढ़ की पहली ब्लोग्गर्स बैठक थी. कई बड़े नाम भी मौजूद थे और कई नए चेहरे भी.

गोष्ठी की शुरुआत श्री अनिल पुसदकर जी ने की. शुरुआत हुई ब्लॉग की उपलब्धता, इसके रूप, मजबूती और इसके योग्यता से, योग्यता कि कैसे ब्लॉग पांचवे खम्भे के रूप में उभर कर आ रहा है और समाज की समस्याओं और निवारण का एक अच्छा माध्यम है.... अनिल जी ने छत्तीसगढ़ की खराब होती छवि पर भी सवाल उठाया. ये एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा भी है. हम कमियों को तो बढा-चढ़ा कर लिखते, छापते और सुनाते है पर सच्चाई और वास्तिवकता से कोशूं दूर रहते है. अनिल जी ने एक बहुत ही उम्दा सुझाव दिया कि एक ऐसा कमुनिटी ब्लॉग बनाया जाये जिसमें छतीसगढ़ के सही समस्याएं, उसकी उपलब्धि सही और निष्पक्ष रूप से लोगों तक पहुँचाया जा सकें... मैं उनके इस प्रयास को सार्थक और सही मानता हूँ.
अनिल जी के बाद श्री बी. एस. पाबला जी ने लोगों को संबोधित किया और अपना परिचय और विचार लोगों के सामने रखें. लगभग ३० चिट्ठाकारों का समूह मौजूद था, ये एक छोटी मगर सार्थक शुरुआत थी. एक के बाद एक सभी लोगों को अपने विचार रखने का मौका मिला. श्री ललित शर्मा जी से कई जानकारियाँ मिली. कुल मिलाकर कहूँ तो इस मीट में कई सारी नयी जानकारियाँ और विचार सामने आये.

कोई चिटठा सिर्फ शौक के लिए लिखता है तो कोई इसे धनार्जन का स्रोत भी मानता है. बोलने का मौका मुझे भी मिला पर उत्साह, डर और घबराहट में शायद मैं अपने मन की बात कह ही नहीं पाया. जाने से पहले मैंने सोंचा था ये कहूँगा, वो कहूँगा, ऐसे बोलूँगा, वैसे अपनी बात रखूँगा... पर जब बोलने का मौका आया तो सारे शब्द गायब हो गए.

बैठक के दौरान कहा गया एक सार्थक दृष्टान्त मुझे याद है... "दो सेब के पेड़ आपस में बात कर रहे थे. पहले ने दूसरे से कहा: 'एक दिन ऐसा आएगा जब सिर्फ सेब ही सेब के पेड़ बचेंगे बाकी सब ख़त्म हो जायेंगे'.दूसरे पेड़ ने सवाल किया: 'वो कैसे?'... पहले ने कहा: 'जिस तरह लोग जात और घर को लेकर आपस में लड़ रहे हैं , मर रहे हैं मार रहे हैं , एक दिन सिर्फ हम ही तो बचेंगे, आदमी आदमी को मार रहा है, जानवरों को मार रहा है और जानवर भी दूसरे छोटे जानवरों को मार रहे है... एक दिन सिर्फ हम ही तो बचेंगे...' तो सेब के दूसरे पेड़ ने धीरे से कहा: 'कौन सा सेब का पेड़ बचेगा? लाल वाला या सफ़ेद वाला?"

ये सिर्फ एक दृष्टान्त नहीं था बल्कि बहुत गंभीर सोच और चिंता की बात थी इसमें...

सभी साथियों के बीच एक मात्र महिला चिट्ठाकार थीं श्रीमती तोशी गुप्ता. उन्होंने अपने चिट्ठे के माध्यम से एक सशक्त शुरुआत की थी पर कुछ लोगों की धमकियों ने उन्हें लिखने से डरा दिया. मैं तोशी जी से इतना ही कहूँगा कि तमाशबीनों की दुनिया है यह, बुरा किसी को दीखता नहीं..और बुरा जो दिखाने की कोशिश करो तो और भी कुछ दीखता नहीं...ये दुनिया झूठ और फरेबों से चल रही है आजकल.यहाँ ईमानदारी की कीमत नहीं, सच बिकता नहीं....'

पारस्परिक परिचय और विचार-विमर्श के बाद सभा का अंत मेरी कुछ पंक्तियों से हुआ:

"अपनी जिंदगी से न यूँ मुझे किनारे कीजिये

ग़मों में ही सही अपनी, मुझे अपना सहारा कीजिये

तेरी महक सदा पाता हूँ पास अपने

कोई तो अपनी मौजूदगी का इशारा कीजिये"

होश खोता रहा है आइना भी तुझे देख-देखकर

यूँ तो खुद को न सामने उसके संवारा कीजिये

इन्तेजार में तेरी एक झलक पाने को तो चाँद भी है

इक पल का ही सही, वक़्त कोई अपना हमारा कीजिये

गुनाह की है तुझसे मोहब्बत करने की मैंने
खतादार हूँ तेरे हुस्न की आरजू की है

सजा देने को ही सही, एक बार तो

अपनी जिंदगी में शामिल दोबारा कीजिये

ब्लोग्गर्स मीट के बाद शानदार और यादगार रात्रि भोजन की भी व्यवस्था की गयी थी. खाने के साथ साथ लोगों की बातें और मजाकें खाने में और मसाला डाल रहे थे... रात करीब १० बजे लोगों से विदा ली फिर मिलने के लिए...

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कल की शाम मेरी सबसे ज्यादा यादगार और हसीं शाम थी... एक ही शाम में मैंने उत्साह, गर्व, डर, घबराहट और ख़ुशी सारी भावनाओं का मजा ले लिया. महेश अंकल का साथ, पाबला जी की गर्मजोशी से मिलाया गया हाथ (मेरे हाथों में अभी भी दर्द है), ललित शर्मा जी की मूंछें, अनिल जी का व्यवहार और बाकी बंधुओं का सौहाद्र ... हमेशा याद रहेगा...


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