स्तम्भ menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

शनिवार, 30 अगस्त 2014

shri ganesh awhan : madhukar

श्री गणेश आवाहन :


डॉ. उदयभानु तिवारी 'मधुकर'
आये गजानन द्वार हमारे,मंगल कलश सजाओ जी!! 
बंदनवार बनाओ जी!…  

बुद्धि निधान भक्त चित चन्दन 
विघ्न विनाशन गिरिजानंदन 
द्वार खड़े सब करलो वंदन 
करो वेद ध्वनि से अभिनन्दन 
घी के दीप जलाओ जी! सुमन माल ले आओ जी!!
आये गजानन द्वार हमारे,मंगल कलश सजाओ जी!!

मूषक वाहन अद्भुत भ्राजे   
चतुर्भुजी भगवान विराजे
ऋद्धि-सिद्धि दोउ सँग में राजे
झांझर, शंख बजाओ बाजे
मोदक,फल ले आओ जी! आरति थार सजाओ जी!!
आये गजानन द्वार हमारे,मंगल कलश सजाओ जी!! 

प्रभु! अंधों के नयनप्रदाता 
बाँझन के हैं सुख-सुतदाता   
देव!मनुज के बुद्धि विधाता
इन्हें प्रथम ही पूजा जाता 
एकदन्त गुण गाओजी! आसन पर ले आओ जी!!
आये गजानन द्वार हमारे,मंगल कलश सजाओ जी!! 

जय लम्बोदर भव-दुखहारी 
हम सब हैं प्रभु शरण तुम्हारी 
जय जय जय संतन हितकारी   
सुनिए गणपति विनय हमारी   
आसन पर आजाओ जी!,विमल छटा छिटकाओ जी!!
आये गजानन द्वार हमारे,मंगल कलश सजाओ जी!! 

कर तन,मन,धन तुम्हें समर्पण 
पत्र, पुष्प, फल करके अर्पण  
''मधुकर'' भक्त करें सब अर्चन 
कीजै प्रभु निर्मल अंतर्मन
कृपा दृष्टि बरसाओ जी!,सारे विघ्न मिटाओ जी!!
आये गजानन द्वार हमारे,सब मिल आरति गाओ जी!!  
-------------------------------

lekh: doha salila sanatan: sanjiv

दोहा सलिला सनातन : १ 

संजीव 

*
जन-मन-रंजन, भव-बाधा-भंजन, यश-कीर्ति-मंडन, अशुभ विखंडन तथा सर्व शुभ सृजन में दोहा का कोई सानी नहीं है। विश्व-वांग्मय का सर्वाधिक मारक-तारक-सुधारक छंद दोहा छंद शास्त्र की अद्भुत कलात्मक देन है। संस्कृत वांग्मय के अनुसार 'दोग्धि चित्तमिति दोग्धकम्' अर्थात जो श्रोता/पाठक के चित्त का दोहन करे वह दोग्धक (दोहा) है। दोहा चित्त का ही नहीं वर्ण्य विषय के सार का भी दोहन करने में समर्थ है  दोहा अपने अस्तित्व-काल के प्रारम्भ से ही लोक परम्परा और लोक मानस से संपृक्त रहा है आरम्भ में हर काव्य रचना 'दूहा' (दोहा) कही जाती थी। फिर संस्कृत के द्विपदीय श्लोकों के आधार पर केवल दो पंक्तियों की काव्य रचना 'दोहड़ा' कही गयी। कालांतर में संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश भाषाओं की पूर्वपरता एवं युग्परकता में छंद शास्त्र के साथ-साथ दोहा पला-बढ़ा और अनेक नामों से विभूषित हुआ।

दोग्धक दूहा दूहरा, द्विपदिक दोहअ छंद. 
दोहक दूहा दोहरा, दुवअह दे आनंद.

द्विपथा दोहयं दोहडा, द्विपदी दोहड़ नाम.
दुहे दोपदी दूहडा, दोहा ललित ललाम.

दोहा मुक्तक छंद है :

संस्कृत साहित्य में बिना पूर्ववर्ती या परवर्ती प्रसंग के एक ही छंद में पूर्ण अर्थ व चमत्कार प्रगट करनेवाले अनिबद्ध काव्य को मुक्तक कहा गया है- ' मुक्तक श्लोक एवैकश्चमत्कारः क्षमः सतां'. अभिनव गुप्त के शब्दों में 'मुक्ता मन्यते नालिंकित तस्य संज्ञायां कन. तेन स्वतंत्रया परिसमाप्त निराकांक्षार्थमपि, प्रबंधमध्यवर्ती मुक्तक मिनमुच्यते'।

हिन्दी गीति काव्य के अनुसार मुक्तक पूर्ववर्ती या परवर्ती छंद या प्रसंग के बिना चमत्कार या अर्थ की पूर्ण अभिव्यक्ति करनेवाला छंद है। मुक्तक का प्रयोग प्रबंध काव्य के मध्य में भी किया जा सकता है। रामचरित मानस महाकाव्य में चौपाइयों के बीच-बीच में दोहा का प्रयोग मुक्तक छंद के रूप में सर्व ज्ञात है। मुक्तक काव्य के दो भेद १. पाठ्य (एक भावः या अनुभूति की प्रधानता यथा कबीर के दोहे) तथा गेय (रागात्मकता प्रधान यथा तुलसी के दोहे) हैं। 

इतिहास गढ़ने, मोड़ने, बदलने तथा रचने में सिद्ध दोहा कालिदास (ई. पू. ३००) के विकेमोर्वशीयम के चतुर्थांक में है. 

मइँ जाणिआँ मिअलोअणी, निसअणु कोइ हरेइ.
जावणु णवतलिसामल, धारारुह वरिसेई..

हिन्दी साहित्य के आदिकाल (७००ई. - १४००ई..) में नाथ सम्प्रदाय के ८४ सिद्ध संतों ने विपुल साहित्य का सृजन किया. सिद्धाचार्य सरोजवज्र (स्वयंभू / सरहपा / सरह वि. सं. ६९०) रचित दोहाकोश एवं अन्य ३९ ग्रंथों ने दोहा को प्रतिष्ठित किया।

जहि मन पवन न संचरई, रवि-ससि नांहि पवेस.
तहि वट चित्त विसाम करू, सरहे कहिअ उवेस.

दोहा की यात्रा भाषा के बदलते रूप की यात्रा है. देवसेन के इस दोहे में सतासत की विवेचना है-

जो जिण सासण भाषियउ, सो मई कहियउ सारु.
जो पालइ सइ भाउ करि, सो सरि पावइ पारु. 

८ वीं सदी के उत्तरार्ध में राजस्थानी वीरांगना युद्ध पर गये अपने प्रीतम को दोहा-दूत से संदेश भेजती है कि वह वायदे के अनुसार श्रावण की पहली तीज पर न आया तो प्रिया को जीवित नहीं पायेगा. 

पिउ चित्तोड़ न आविउ, सावण पैली तीज.
जोबै बाट बिरहणी, खिण-खिण अणवे खीज.

संदेसो पिण साहिबा, पाछो फिरिय न देह.
पंछी थाल्या पींजरे, छूटण रो संदेह. 

दोहा उतम काव्य है :

दोहा उत्तम काव्य है, देश-काल पर्याय.
राह दिखाता मनुज को, जब वह हो निरुपाय. 

हिन्दी ही नहीं विश्व की समस्त भाषाओँ के इतिहास में केवल दोहा ही ऐसा छंद है जिसने युद्धों को रोका है, नारी के मान-मर्यादा की रक्षा की है, भटके हुओं को रास्ता दिखाया है, देश की रक्षा की है, पराजित और बंदी राजा को अरि-मर्दन का हौसला दिया है, बीमारियों से बचने की राह सुझाई है और जिंदगी को सही तरीके से जीने का तरीका ही नहीं बताया भगवान के दर्शन भी करानेये यह दोहे की अतिरेकी प्रशंसा नहीं, सच है। कुछ कालजयी दोहों से साक्षात कीजिये।  

दोहा गाथा सनातन, शारद कृपा पुनीत.
साँची साक्षी समय की, जनगण-मन की मीत.

कल का कल से आज ही, कलरव सा संवाद.
कल की कल हिन्दी करे, कलकल दोहा नाद. 
(कल = बीता समय, आगामी समय, शान्ति, यंत्र)


दोहा है इतिहास: 

दसवीं सदी में पवन कवि द्वारा हरिवंश पुराण में कउवों के अंत में प्रयुक्त ​'दत्ता'  छंद दोहा ही है.



जइण रमिय बहुतेण सहु, परिसेसिय बहुगब्बु.
अजकल सिहु णवि जिमिविहितु, जब्बणु रूठ वि सब्बु.

११वीं सदी में कवि देवसेन गण ने 'सुलोचना चरित' की १८ वी संधि(अध्याय) में कडवकों के आरम्भ में 'दोहय' छंद का प्रयोग किया है। यह भी दोहा ही है. 

कोइण कासु विसूहई, करइण केवि हरेइ.
अप्पारोण बिढ़न्तु बद, सयलु वि जीहू लहेइ 

मुनि रामसिंह कृत 'पाहुड दोहा' संभवतः पहला दोहा संग्रह है। एक दोहा देखें-



वृत्थ अहुष्ठः देवली, बाल हणा ही पवेसु.

सन्तु निरंजणु ताहि वस्इ, निम्मलु होइ गवेसु 

दोहा उलटे सोरठा :

सौरठ (सौराष्ट्र गुजरात) की सती सोनल (राणक) को नतमस्तक प्रणाम करता दोहा अपने विषम-सम अर्धांश को आपस में बदलकर सोरठा हो गया
  ​
। कालरी के देवरा राजपूत की अपूर्व सुन्दरी कन्या सोनल अणहिल्ल्पुर पाटण नरेश जयसिंह (संवत ११४२-११९९) की वाग्दत्ता थी। जयसिंह को मालवा पर आक्रमण में उलझा पाकर उसके प्रतिद्वंदी गिरनार नरेश रानवघण खंगार ने पाटण पर हमला कर सोनल का अपहरण कर उससे बलपूर्वक विवाह कर लिया
  ​
। मर्माहत जयसिंह ने बार-बार खंगार पर हमले किये पर उसे हरा नहीं सका। अंततः खंगार के भांजों के विश्वासघात के कारण वह अपने दो लड़कों सहित पकड़ा गया। जयसिंह ने तीनों को मरवा दिया। यह जानकर जयसिंह के प्रलोभनों को ठुकराकर सोनल वधवाण के निकट भोगावा नदी के किनारे सती हो गयी। दोहा गत ९०० वर्षों से सती सोनल की कथा सोरठा बनकर गा रहा है-

वढी तऊं वदवाण, वीसारतां न वीसारईं.
सोनल केरा प्राण, भोगा विहिसऊँ भोग्या.


दोहा घणां पुराणां छंद:

११ वीं सदी के महाकवि कल्लोल की अमर कृति 'ढोला-मारूर दोहा' में 'दोहा घणां पुराणां छंद' कहकर दोहा को सराहा गया है। राजा नल के पुत्र ढोला तथा पूंगलराज की पुत्री मारू की प्रेमकहानी को दोहा ने ही अमर कर दिया।

सोरठियो दूहो भलो, भलि मरिवणि री बात.
जोबन छाई घण भली, तारा छाई रात. 

आजकल आतंकवादी​ कुछ लोगों को बंदी बना लें तो संबंधी हाहाकार मचाने लगते हैं, प्रेस इतना दुष्प्रचार करती है कि सरकार आतंकवादियों को कंधार पहुँचाने पर विवश हो जाती है। एक मंत्री की लड़की बंधक बना ली जाए तो भी​ आतंकवादी छोड़े जाते हैं। संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश तीनों में दोहा कहनेवाले, 'शब्दानुशासन' के रचयिता हेमचन्द्र रचित दोहा बताता है कि ऐसी परिस्थिति में कितना धैर्य रखना चाहिए।



भल्ला हुआ जू मारिआ, बहिणि म्हारा कंतु.
लज्जज्जंतु वयंसि यहु, जह भग्गा घर एन्तु. 

अर्थात: भला हुआ मारा गया, मेरा बहिन सुहाग.

मर जाती मैं लाज से, जो आता घर भाग.


अम्हे थोवा रिउ बहुअ, कायर एंव भणन्ति.
मुद्धि निहालहि गयण फलु, कह जण जाण्ह करंति.

भाय न कायर भगोड़ा, सुख कम दुःख अधिकाय.

देख युद्ध फल क्या कहूँ, कुछ भी कहा न जाय.

दोहा दिल का आइना:

दोहा दिल का आइना, कहता केवल सत्य.
सुख-दुःख चुप रह झेलता, कहता नहीं असत्य. 

दोहा सत्य से आँख मिलाने का साहस रखता है. वह जीवन का सत्य पूरी निर्लिप्तता से कहता है-

पुत्ते जाएँ कवन गुणु, अवगुणु कवणु मुएण
जा बप्पी की भूः णई, चंपी ज्जइ अवरेण.

अर्थात् अवगुण कोई न चाहता, गुण की सबको चाह. 
चम्पकवर्णी कुंवारी, कन्या देती दाह. 

प्रियतम की बेव फाई पर प्रेमिका और दूती का मार्मिक संवाद दोहा ही कह सकता है-

सो न आवै, दुई घरु, कांइ अहोमुहू तुज्झु.
वयणु जे खंढइ तउ सहि ए, सो पिय होइ न मुज्झु

यदि प्रिय घर आता नहीं. दूती क्यों नत मुख.
मुझे न प्रिय जो तोड़कर, वचन तुझे दे दुःख. 

हर प्रियतम बेवफा नहीं होता. सच्चे प्रेमियों के लिए बिछुड़ना की पीड़ा असह्य होती है. जिस विरहणी की अंगुलियाँ पीया के आने के दिन गिन-गिन कर ही घिसी जा रहीं हैं उसका साथ कोई दे न दे दोहा तो देगा ही।

जे महु दिणणा दिअहडा, दइऐ पवसंतेण.
ताण गणनतिए अंगुलिऊँ, जज्जरियाउ नहेण. 

जाते हुए प्रवास पर, प्रिय ने कहे जो दिन.
हुईं अंगुलियाँ जर्जरित, उनको नख से गिन. 

परेशानी प्रिय के जाने मात्र की हो तो उसका निदान हो सकता है पर इन प्रियतमा की शिकायत यह है कि प्रिय गए तो मारे गम के नींद गुम हो गयी और जब आए तो खुशी के कारण नींद गुम हो गयी।

पिय संगमि कउ निद्दणइ, पियहो परक्खहो केंब?
मई बिन्नवि बिन्नासिया, निंद्दन एंव न तेंव. 

प्रिय का संग पा नींद गुम, बिछुडे तो गुम नींद.
हाय! गयी दोनों तरह, ज्यों-त्यों मिली न नींद. 

मिलन-विरह के साथ-साथ दोहा हास-परिहास में भी पीछे नहीं है. सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है अथवा मुल्ला जी दुबले क्यों? - शहर के अंदेशे से जैसी लोकोक्तियों का उद्गम शायद निम्न दोहा है जिसमें अपभ्रंश के दोहाकार सोमप्रभ सूरी की चिंता यह है कि दशानन के दस मुँह थे तो उसकी माता उन सबको दूध कैसे पिलाती होगी?

रावण जायउ जहि दिअहि, दहमुहु एकु सरीरु.
चिंताविय तइयहि जणणि, कवहुं पियावहुं खीरू. 

एक बदन दस वदनमय, रावन जन्मा तात.
दूध पिलाऊँ किस तरह, सोचे चिंतित मात. 

इन्द्रप्रस्थ नरेश पृथ्वीराज चौहान अभूतपूर्व पराक्रम के बाद भी मो॰ गोरी के हाथों पराजित हुए। उनकी आँखें फोड़कर उन्हें कारागार में डाल दिया गया। उनके बालसखा निपुण दोहाकार चंदबरदाई (संवत् १२०५-१२४८) ने अपने मित्र को जिल्लत की जिंदगी से आजाद कराने के लिए दोहा का सहारा लिया। उसने गोरी से सम्राट की शब्द-भेदी बाणकला की प्रशंसा कर परीक्षा हेतु उकसाया। परीक्षण के समय कवि मित्र ने एक दोहा पढ़ा। दिल्लीपति ने दोहा हृदयंगम कर लक्ष्य पर तीर छोड़ दिया जो सुल्तान का कंठ चीर गया। वह कालजयी दोहा है-

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण.
ता ऊपर सुल्तान है, मत चुक्कै चव्हाण.

दोहा सबका साथ निभाता है, भले ही इंसान एक दूसरे का साथ छोड़ दे. बुंदेलखंड के परम प्रतापी शूर-वीर भाइयों आल्हा-ऊदल के पराक्रम की अमर गाथा महाकवि जगनिक रचित 'आल्हा खंड' (संवत १२३०) का श्री गणेश दोहा से ही हुआ है-

श्री गणेश गुरुपद सुमरि, ईस्ट देव मन लाय.
आल्हखंड बरण करत, आल्हा छंद बनाय.

इन दोनों वीरों और युद्ध के मैदान में उन्हें मारनेवाले दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान के प्रिय शस्त्र तलवार के प्रकारों का वर्णन दोहा उनकी मूठ के आधार पर करता है-

पार्ज चौक चुंचुक गता, अमिया टोली फूल.
कंठ कटोरी है सखी, नौ नग गिनती मूठ.

चल पानी पिला: 
हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं, आध्यात्म तथा प्रशासन में निष्णात अमीर खुसरो (संवत् १३१२-१३८२)एक दिन घूमते हुए दूर निकल गये, जोर से प्यास लगी.. गाँव के बाहर कुँए पर औरतों को पानी भरते देख खुसरो साहब ने उनसे पानी पिलाने की दरखास्त की। उनमें से एक ने कहा पानी तभी पिलायेंगी जब खुसरो उनके मन मुताबिक कविता सुनाएँ खुसरो समझ गये कि जिन्हें वे भोली-भली देहातिनें समझ रहे थे वे ज़हीन-समझदार हैं और उन्हें पहचान चुकने पर उनकी झुंझलाहट का आनंद ले रही हैं कोई और उपाय न देख खुसरो ने विषय पूछा तो बिना देर किये चारों ने एक-एक विषय दे दिया खीर... चरखा... कुत्ता... और ढोल... खुसरो की प्यास के मरे जान निकली जा रही थी, इन बेढब विषयों पर कविता करें तो क्या? पर खुसरो भी एक ही थे, अपनी मिसाल आप, सबसे छोटे छंद दोहा का दमन थमा और एक ही दोहे में चारों विषयों को समेटते हुए ताजा-ठंडा पानी पिया और चैन की सांस ली. खुसरो का वह दोहा है: 
खीर पकाई जतन से,चरखा दिया चलाय 
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय 
ला पानी पिला 
खुसरो को पानी तो मिला ही, पहला दुमदार दोहा रचने का श्रेय भी मिला। आजकल हास्य कवि दमदार दोहे सुनकर लोगों को हँसाते हैं.      

कवि को नम्र प्रणाम: 

राजा-महाराजा से अधिक सम्मान साहित्यकार को देना दोहा का संस्कार है. परमल रासो में दोहा ने महाकवि चंद बरदाई को दोहा ने सदर प्रणाम कर उनके योगदान को याद किया- 

भारत किय भुव लोक मंह, गणतीय लक्ष प्रमान.
चाहुवाल जस चंद कवि, कीन्हिय ताहि समान. 

बुन्देलखंड के प्रसिद्ध तीर्थ जटाशंकर में एक शिलालेख पर डिंगल भाषा में १३वी-१४वी सदी में गूजरों-गौदहों तथा काई को पराजित करनेवाले विश्वामित्र गोत्रीय विजयसिंह का प्रशस्ति गायन कर दोहा इतिहास के अज्ञात पृष्ठ को उद्घाटित कर रहा है-

जो चित्तौडहि जुज्झी अउ, जिण दिल्ली दलु जित्त.
सोसुपसंसहि रभहकइ, हरिसराअ तिउ सुत्त. 

खेदिअ गुज्जर गौदहइ, कीय अधी अम्मार. 
विजयसिंह कित संभलहु, पौरुस कह संसार. 

वीरों का प्यारा रहा, कर वीरों से प्यार.
शौर्य-पराक्रम पर हुआ'सलिल', दोहा हुआ निसार. 
क्रमशः 

doha salila. ganesh mahima -sanjiv




दोहा सलिला
गणेश महिमा 
संजीव
*
श्री गणेश मंगल करें, ऋद्धि-सिद्धि हों संग
सत-शिव-सुंदर हो धरा, देख असुर-सुर दंग
*
जनपति, मनपति हो तुम्हीं, शत-शत नम्र प्रणाम
गणपति, गुणपति सर्वप्रिय, कर्मव्रती निष्काम
*
कर्म पूज्य सच सिखाया, बनकर पहरेदार
प्राण लुटाये फ़र्ज़ पर, प्रभु! वंदन शत-बार
*
व्यर्थ न कुछ भी सिखाने, गही मैल से देह
त्याज्य पूत-पावन वही, तनिक नहीं संदेह
*
शीश अहं का काटकर, शिव ने फेंका दूर
मोह शिवा का खिन्न था, देख सत्य भ्रम दूर
*
सबमें आत्मा एक है, नर-पशु या जड़-जीव
शीश गहा गज का पुलक, हुए पूज्य संजीव
*
कोई हीन न उच्च है, सब प्रभु की संतान
गुरु-लघु दंत बता रहे, मानव सभी समान
*
सार गहें थोथा सभी, उड़ा दूर दो फेक
कर्ण विशाल बता रहे, श्रवण करो सच नेक
*
प्रभु!भारी स्थिर सिर-बदन, रहे संतुलित आप
दहले दुश्मन देखकर, जाए भय से काँप
*
तीक्ष्ण दृष्टि सत-असत को, पल में ले पहचान
सूक्ष्म बुद्धि निर्णय करे, सम्यक दयानिधान!
*
क्या अग्राह्य है?, ग्राह्य क्या?, सूँढ सके पहचान
रस-निधि चुन रस-लीन हो, आप देव रस-खान



शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

SHRI GANESH AWAHN: UDYABHANU TIWARI 'MADHUKAR'

श्री गणेश आवाहन :


डॉ. उदयभानु तिवारी 'मधुकर'
आये गजानन द्वार हमारे,मंगल कलश सजाओ जी /
मित्रो! वन्दनवार बनाओ /

बुद्धि निधान भक्त चित चन्दन 
विघ्न  विनाशन गिरिजा नंदन 
द्वार   खड़े  सब   करलो    वंदन 
पुष्प   चढाय  करो अभिनन्दन 
घी   के    दीप    जलाओ,मित्रो !सुमन माल ले आओ  //
आये गजानन -----------//१//

मूसक  वाहन   अद्भुत  भ्राजे   
चतुर्भुजी   भगवान   विराजे
ऋद्धि सिद्धि दोउ सँग में राजे
झांझर , शंख  बजाओ  बाजे
मोदक,फल ले आओ ,मित्रो !आरति थार सजाओ /
आये गजानन -----------//२//

ये  अंधों  के  नयन  प्रदाता 
बाँझन के हैं  प्रभु सुत दाता   
देव ,मनुज के बुद्धि विधाता
इन्हें प्रथम  ही  पूजा जाता 
एक दन्त गुण  गाओ,प्रभु को आसान पर ले आओ /
आये गजानन ------------//३//

जय  लम्बोदर   भव  दुखहारी 
हम सब  हैं प्रभु शरण तुम्हारी 
जय जय जय संतन हितकारी   
सुनिए गणपति विनय हमारी   
आसन पर आजाओ ,गणपति विमल छटा छिटकाओ /
आये गजानन -----------//४//

कर तन,मन,धन तुम्हें समपर्ण
पत्र  , पुष्प , फल  करके अर्पण  
''मधुकर''जन गण करते अर्चन 
 प्रभु   कीजै   निर्मल   अंतर्मन
कृपा दृष्टि बरसाओ ,मित्रो !सब मिल आरति गाओ /
आये गजानन ----------//५//
-------------------------------

nvgeet:: ham kyon nij bhasha bolen? -sanjiv

नवगीत:
संजीव
*
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
*
निज भाषा बोले बच्चा
बच्चा होता है सच्चा
हम सचाई से सचमुच दूर
आँखें रहते भी हैं सूर

फेंक अमिय
नित विष घोलें
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
*
निज भाषा पंछी बोले
संग-साथ हिल-मिल डोले
हम लड़ते हैं भाई से
दुश्मन निज परछाईं के

दिल में
भड़क रहे शोले
हम क्यों
निज भाषा बोलें?

निज भाषा पशु को भाती
प्रकृति न भूले परिपाटी
संचय-सेक्स करे सीमित
खुद को करे नहीं बीमित

बदले नहीं
कभी चोले
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
*
  

muktak salila: sanjiv

मुक्तक सलिला:
संजीव
*
बंधन में हैं मुक्त रह
अलग-अलग संयुक्त रह.
किसको ठगता कौन है?
क्यों चुप रहे प्रयुक्त रह??
*
स्वार्थ-हवस का साथ था
जुड़े हाथ, नत माथ था.
दासी-स्वामिनी यह नहीं-
दास न वह, ना नाथ था.
*
बंधन जिन्हें न भा सका,
जो आज़ाद ख़याल थे.
बंधन टूटा, दुखी क्यों?
उत्तर बने सवाल थे.
*




मंगलवार, 26 अगस्त 2014

vimarsh: chitragupt ji sinhasan par patniyan jameen par kyon?


विमर्श :

भगवन चित्रगुप्त सिंहासन पर तो उनकी दोनों पत्नियां जमीन पर क्यों ?

क्या आपने राम जी को सिंहासन पर शिव जी को सिंहासन पर पारवती जी को जमीन पर, राम जी को सिंहासन पर सीता जी को जमीन पर, कृष्ण जी को सिंहासन पर रुक्मिणी जी को जमीन पर देखा है?

क्या आपके पिता कुसी पर माँ जमीन पर, भाई कुर्सी पर भाभी जमीन पर, बहनोई कुर्सी पर बहिन जमीन पर, आप कुसी पर पत्नी जमीन पर या आपके पति कुर्सी पर आप जमीन पर बैठते हैं?

या चित्रगुप्त जी इतने निर्धन थे कि ३ सिंहासन नहीं क्रय सकते थे?

क्या यह नर-नारी समानता के विरुद्ध नहीं है? 

इस तरह के चित्र की पूजा करनेवाले या अपनी साइट पर लगानेवाले उत्तर दें. क्या आप जाने हैं के अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के हैदराबाद सम्मलेन १९९१ में इस चित्र के दोषों पर व्यापक चर्चा के बाद इसे अपूजनीय घोषित किया जा चुका है?

केवल 'लाइक, न करें। अपने विचाए दें. यदि आपत्ति से सहमत है तो क्या ऐसे चित्रों को  चित्र की पूजा करेंगे? चित्र में क्या बदलाव हो या कैसा चित्र बनाया जाए?


doha salila: sanjiv

दोहा सलिला:
संजीव
*
शशि की स्नेहिल ज्योत्सना, करे प्राण संचार 
सलिल-तरंगें निनादित, हो ज्योतित जलधार
*
पूनम शीतल चाँदनी, ले जग का मन मोह 
नहीं अमावस सह सके, श्यामल हो कर द्रोह 
*
नाज़ उठाने की नहीं, सीमा कोई मीत 
नभ सी अपरम्पार है, मानव मन की प्रीत 
अधिक न कम देना मुझे, सोना हे दातार!
बस उतना ही चाहिए, चले जगत व्यापार
*
करे गगन को सुशोभित, गहन तिमिर के जूझ 
नत रवीन्द्र सम्मुख जगत, थको न श्रम हो बूझ 
*
पायल की झंकार सुन, मन मयूर ले नाच 
समय पुरोहित हँस रहे, प्रणय पत्रिका बाँच 
*
प्रात रवि किरण देख उठ, जग जाएगा भाग 
कीर्ति-माल मुस्कान से, घर हो पुण्य प्रयाग 

सोमवार, 25 अगस्त 2014

navgeet: nastak ki rekhayen -sanjiv

नवगीत:
मस्तक की रेखाएँ …
संजीव 
 
*
मस्तक की रेखाएँ 
कहें कौन बाँचेगा? 
*
आँखें करतीं सवाल 
शत-शत करतीं बवाल। 
समाधान बच्चों से 
रूठे, इतना मलाल। 
शंका को आस्था की 
लाठी से दें हकाल।  
उत्तर न सूझे तो 
बहाने बनायें टाल। 

सियासती मन मुआ
मनमानी ठाँसेगा … 
अधरों पर मुस्काहट 
समाधान की आहट। 
माथे बिंदिया सूरज 
तम हरे लिये चाहत।
काल-कर लिये पोथी
खोजे क्यों मनु सायत? 
कल का कर आज अभी
काम, तभी सुधरे गत।

जाल लिये आलस 
कोशिश पंछी फाँसेगा…
*
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

शनिवार, 23 अगस्त 2014

vimarsh: varmaal ya jaymaal kyon??? -sanjiv

अनावश्यक कुप्रथा: वरमाल या जयमाल???

संजीव 

*

आजकल विवाह के पूर्व वर-वधु बड़ा हार पहनाते हैं। क्यों? इस समय वर के मिटे हुल्लड़ कर उसे उठा लेते हैं ताकि वधु माला न पहना सके। प्रत्युत्तर में वधु पक्ष भी यही प्रक्रिया दोहराता है। 

दुष्परिणाम:

वहाँ उपस्थित सज्जन विवाह के समर्थक होते हैं और विवाह की साक्षी देने पधारते हैं तो वे बाधा क्यों उपस्थित करते हैं? इस कुप्रथा के दुपरिणाम देखने में आये हैं, वर या वधु आपाधापी में गिरकर घायल हुए तो रंग में भंग हो गया और चिकित्सा की व्यवस्था करनी पडी। सारा कार्यक्रम गड़बड़ा गया. इस प्रसंग में वधु को उठाते समय उसकी साज-सज्जा और वस्त्र अस्त-व्यस्त हो जाते हैं. कोई असामाजिक या दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति हो तो उसे छेड़-छाड़ का अवसर मिलता है. यह प्रक्रिया धार्मिक, सामाजिक या विधिक (कानूनी) किसी भी दृष्टि से अनिवार्य नहीं है.

औचित्य:

यदि जयमाल के तत्काल बाद वर-वधु में से किसी एक का निधन हो जाए या या किसी विवाद के कारण विवाह न हो सके तो क्या स्थिति होगी? सप्तपदी, सिंदूर दान या वचनों का आदान-प्रदान न हुआ तो क्या केवल माला को अदला-बदली को विवाह माना जायेगा?हिन्दू विवाह अधिनियम ऐसा नहीं मानता।ऐसी स्थिति में वधु को वर की पत्नी के अधिकार और कर्तव्य (चल-अचल संपत्ति पर अधिकार, अनुकम्पा नियुक्ति या पेंशन, वर का दूसरा विवाह हो तो उसकी संतान के पालन-पोषण का अधिकार) नहीं मिलते।सामाजिक रूप से भी उसे अविवाहित माना जाता है, विवाहित नहीं। धार्मिक दृष्टि से भी वरमाल को विवाह की पूर्ति अन्यथा बाद की प्रक्रियाओं का महत्त्व ही नहीं रहता।  

कारण:

धर्म, समाज तथा विधि तीनों दृष्टियों से अनावश्यक इस प्रक्रिया का प्रचलन क्यों, कब और कैसे हुआ? 
सर्वाधिक लोकप्रिय राम-सीता जयमाल प्रसंग का उल्लेख राम-सीता के जीवनकाल में रचित वाल्मीकि रामायण में नहीं है. रामचरित मानस में तुलसीदास  प्रसंग का मनोहारी चित्रण किया है। तभी श्री राम के ३  भाइयों के विवाह सीता जी की ३ बहनों के साथ संपन्न हुए किन्तु उनकी जयमाल का वर्णन नही है। 

श्री कृष्ण के काल में द्रौपदी स्वयंवर में ब्राम्हण वेषधारी अर्जुन ने मत्स्य वेध किया। जिसके बाद द्रौपदी ने उन्हें जयमाल पहनायी किन्तु वह ५ पांडवों की पत्नी हुईं अर्थात जयमाल न पहननेवाले अर्जुन के ४ भाई भी द्रौपदी के पति हुए। स्पष्ट है कि  जयमाल और विवाह का कोई सम्बन्ध नहीं है। रुक्मिणी का श्रीकृष्ण ने और सुभद्रा का अर्जुन  के पूर्व अपहरण कर लिया था। जायमाला कैसी होती?  

ऐतिहासिक प्रसंगों में पृथ्वीराज चौहा और संयोगिता का प्रसंग उल्लेखनीय है। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद रिश्तेदार होते हुए भी एक दूसरे के शत्रु थे। जयचंद की पुत्री संयोगिता के स्वयंवर के समय पृथ्वीराज द्वारपाल का वेश बनाकर खड़े हो गये। संयोगिता जयमाल लेकर आयी तो आमंत्रित राजाओं को छोड़कर पृथ्वीराज के गले में माल पहना दी और पृथ्वीराज चौहान संयोगिता को लेकर भाग गये। इस प्रसंग से बढ़ी शत्रुता ने जयचंद के हाथों गजनी के मो. गोरी को भारत आक्रमण के लिए प्रेरित कराया, पृथ्वीराज चौहान पराजितकर बंदी बनाये गये, देश गुलाम हुआ 

स्पष्ट है कि जब विवाहेच्छुक राजाओं में से कोई एक अन्य को हराकर अथवा निर्धारित शर्त पूरी कर वधु को जीतता था तभी जयमाल होता था अन्यथा नहीं। 

मनमानी व्याख्या: 

तुलसी ने राम को मर्यादपुषोत्तम  मुग़लों द्वारा  उत्साह जगाने के लिए कई प्रसंगों की रचना की। प्रवचन कारों ने प्रमाणिकता का विचार किये बिना उनकी चमत्कारपूर्ण सरस व्याख्याएँ  चढ़ोत्री बढ़े। वरमाल तब भी विवाह का अनिवार्य अंग नहीं थी। तब भी केवल वधु ही वर को माला पहनाती थी, वर द्वारा वधु को माला नहीं पहनायी जाती थी। यह प्रचलन रामलीलाओं से प्रारम्भ हुआ। वहां भी सीता की वरमाला को स्वीकारने के लिये उनसे लम्बे राम अपना मस्तक शालीनता के साथ नीचे करते हैं। कोई उन्हें   ऊपर नहीं उठाता, न ही वे सर ऊँचा रखकर सीता को उचकाने के लिए विवश करते हैं  

कुप्रथा बंद हो: 

जयमाला वधु द्वारा वर  डाली जाने के कारण वरमाला कही जाने लगी। रामलीलाओं में जान-मन-रंजन के लिये और सीता को जगजननी बताने के लिये उनके गले में राम द्वारा माला पहनवा दी गयी किन्तु यह धार्मिक रीति न थी, न है। आज के प्रसंग में विचार करें तो विवाह अत्यधिक अपव्ययी और दिखावे के आयोजन हो गए हैं। दोनों पक्ष वर्षों की बचत खर्च कर अथवा क़र्ज़ लेकर यह तड़क-भड़क करते हैं।  हार भी कई सौ से कई हजार रुपयों के आते हैं। मंच, उजाला, ध्वनिविस्तारक सैकड़ों  कुसियों और शामियाना तथा सैकड़ों चित्र खींचना, वीडियो बनाना आदि पर बड़ी राशि खर्चकर एक माला पहनाई जाना हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? 

इस कुप्रथा का दूसरा पहलू यह है की लाघग सभी स्थानीयजन तुरंत बाद भोजन कर चले जाते हैं जिससे वे न तो विवाह सम्बन्ध के साक्षी बन पते हैं, न वर-वधु को आशीष दे हैं, न व्धु को मिला स्त्रीधन पाते हैं। उन्हें  के २ कारण विवाह का साक्षी बनना तथा विवाह पश्चात नव दम्पति को आशीष  देना ही होते हैं। जयमाला के तुरंत बाद चलेजाने पर ये उद्देश्य पूर्ण नहीं हो पाते। अतः, विवेकशीलता की मांग है की जयमाला की कुप्रथा का त्याग किया जाए। नारी समानता के पक्षधर वर द्वारा वधु को जीतने के चिन्ह रूप में जयमाला को कैसे स्वीकार सकते हैं? इसी कारण विवाह पश्चात वार वधु से समानता का व्यवहार न कर उसे अपनी अर्धांगिनी नहीं अनुगामिनी और आज्ञानुवर्ती मानता है। यह प्रथा नारी समानता और नारी सम्मान के विपरीत और अपव्यय है। इसे तत्काल बंद किया जाना उचित होगा       
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

divya nadi kshipra:



दिव्य-नदी क्षिप्रा

    अपनी प्राचीनतम, पवित्रता एवं पापनाशकता आदि के कारण प्रसिद्ध उज्जयिनी की प्रमुख नदी शिप्रा सदा स्मरणीय है। यजुर्वेद में 'शिप्रे अवेः पयः' पद के द्वारा इस नदी के स्मरण हुआ है। निरूक्त में 'शिप्रा कस्मात?' यह शिप्रा क्यों कही जाती हैउत्तर दिया गया 'शिवेन पातितं यद रक्तं तत्प्रभवति, तस्मात।' शिवजी द्वारा गिराया गया रक्त प्रभाव दिखला रहा है नदी के रूप में बह रहा है, अतः यह क्षिप्रा है।

क्षिप्र - नर्मदा का सम्मिलन 
    शिप्रा और सिप्रा ये दोनों नाम अग्रिम ग्रन्थों में प्रयुक्त हुए हैं। इनकी व्युत्पत्तियाँ भी क्रमशः इस प्रकार प्रस्तुत हुई है  शिवं प्रापयतीति शिप्रा और सिद्धिं प्राति पूरयतीत सिप्रा कोशकारों ने सिप्रा को अर्थ करधनी भी किया। तदनुसार यह नदी उज्जयिनी के तीन ओर से बहने के कारण करधनीरूप मानकर भी सिप्रा नाम से मण्डित हुई। उन दोनों नामों को साथ इसे क्षिप्रा भी कहा जाता है। यह उसके जल प्रवाह की द्रुतगति से सम्बद्ध प्रतीत होता है। स्कन्दपुराण में शिप्रा नदी का बड़ा माहात्म्य बतलाया है। यथा

नास्ति वत्स महीपृष्ठे शिप्रायाः सदृशी नदी।
यस्यास्तीरे क्षणान्मुक्तिः कच्चिदासेवितेन वै।।

    हे वत्स इस भू-मण्डल पर शिप्रा के समान अन्य नदी नहीं है जिसके तीर पर कुछ समय रहने से तथा स्मरण, स्नानदानादि करने से ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

क्षिप्रा तट पर महाकाल मंदिर 
    शिप्रा का उत्पत्ति के सम्बन्ध में कथा में कहा गया है कि विष्णु की अँगुली को शिव द्वारा काटने पर उसका रक्त गिरकर बहने से यह नदी के रूप में प्रवाहित हुई। इसीलिये 'विष्णु-देहात समुत्पन्ने शिप्रेत्वं पापनाशिनी' इत्यादि पदों से शिप्रा की स्तुति की गयी है। अन्य प्रसड़्ग से शिप्रा को गड़्गा भी कहा गया है। पञचगङ्गाओं में एक गङ्गा शिप्रा भी मान्य हुई है। अवन्तिका को विष्णु का पद कमल भी कहना नितान्त उचित है। कालिकापुराण में शिप्रा की उत्पत्ति मेधातिथि द्वारा अपनी कन्या अरून्धती के विवाह-संस्कार के समय महर्षि वसिष्ठ को कन्यादान का सङ्कल्पार्पण करने के लिये शिप्रासर का जो जल लिया गया था, उसी के गिरने से शिप्रा नदी बह निकली बतलाई है। शिप्रा का अतिपुण्यमय क्षेत्र भी पुराणों में दिखाया गया है

    वर्तमान स्थिति के अनुसार शिप्रा का उद्गम म.प्र. के महू नगर से 11 मील दूर स्थित एक पहाड़ी से हुआ है और यह मालवा में 120 मील की यात्रा करती हुई चम्बल (चर्मण्वती) में मिल जाती है। इसका सङ्गम-स्थल आज सिपावरा  के नाम से जाना जाता है, जो कि सीतामऊ (जिला मन्दसौर) और आलोट के ठीक 10-10 मील के मध्य में है। वहाँ शिप्रा अपने प्रवाह की विपुलता से चम्बल में मिलने की आतुरता और उल्लास को सहज ही प्रकट करती है।

क्षिप्रा तट पर उज्जैन (अवंतिकापुरी) में भूतभावन पतित पावन महाकालेश्वर विराजते हैं। यहीं महर्षि संदीपनी का आश्रम है जहाँ कृष्ण-सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की विक्रमादित्य और उनके नव रत्नों (कालिदास, वराहमिहिर, ) राजा भोज आदि की कर्म स्थली यही है 

    उज्जयिनी शिप्रा के उत्तरवाहिनी होने पर पूर्वीतट पर बसी है। यहीं ओखलेश्वर से मंगलनाथ तक पूर्ववाहिनी है। अतः सिद्धवट और त्रिवेणी में भी स्नान-दानादि करने का माहात्म्य है। क्षिप्रा में सनातन सलिला नर्मदा का जल प्रवाहित होने लगा है: देखें प्रथम चित्र नर्मदा विश्व  की सर्वाधिक प्राचीन सलिला ६ करोड़ से अधिक वर्ष पुरानी है। नर्मदा का एक नाम क्षिप्रा द्रुत वेग से बहानेवाली जलधारा के कारण मिला है