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रविवार, 31 जनवरी 2016

samiksha

कृति चर्चा-
चार दिन फागुन के - नवगीत का बदलता रूप 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'  
[कृति विवरण- चार दिन फागुन के, रामशंकर वर्मा, गीत संग्रह, वर्ष २०१५, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी, सजिल्द, जैकेट सहित, पृष्ठ १५९, मूल्य ३००/-, उत्तरायण प्रकाशन, के ९७ आशियाना, लखनऊ २२६०१२, ९८३९८२५०६२, नवगीतकार संपर्क टी ३/२१ वाल्मी कॉलोनी, उतरेठिया लखनऊ २२६०२९, ९४१५७५४८९२ rsverma8362@gmail.com. ] 
*
धूप-छाँव की तरह सुख-दुःख, मिलन-विरह जीवन-सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं। इस सनातन सत्य से युवा गीतकार रामशंकर वर्मा सुपरिचित हैं। विवेच्य गीत-नवगीत संग्रह छार दिन फागुन के उत्सवधर्मी भारतीय जनमानस से पंक्ति-पंक्ति में साक्षात करता चलता है। ग्राम्य अनुभूतियाँ, प्राकृतिक दृष्यावलियाँ,  ऋतु परिवर्तन और जीवन के ऊँच-नीच को सम्भावेन स्वीकारते  आदमी इन गीतों में रचा-बसा है। गीत को  कल्पना प्रधान और नवगीत को यथार्थ प्रधान माननेवाले वरिष्ठ नवगीत-ग़ज़लकार मधुकर अष्ठाना के अनुसार ''जब वे (वर्मा जी) गीत लिखते हैं तो भाषा दूसरी तो नवगीत में भाषा उससे पृथक दृष्टिगोचर होती है।'' यहाँ सवाल यह उठता है कि गीत नवगीत का भेद कथ्यगत है, शिल्पगत है या भाषागत है? रामशंकर जी नवगीत की उद्भवकालीन मान्यताओं के बंधन को स्वीकार नहीं करते। वे गीत-नवगीत में द्वैत को नकारकर अद्वैत के पथ पर बढ़ते हैं। उनके किस गीत को गीत कहें, किसे नवगीत या एक गीत के किस भाग को गीत कहें किसे नवगीत यह विमर्श निरर्थक है।

गीति रचनाओं में कल्पना और यथार्थ की नीर-क्षीरवत संगुफित अभेद्य उपस्थिति अधिक होती है, केवल कल्पना या केवल यथार्थ की कम। कोई रचनाकार कथ्य को कहने के लिये किसी एक को अवांछनीय मानकर  रचना करता भी नहीं है। रामशंकर जी की ये गीति रचनाएँ निर्गुण-सगुण, शाश्वतता-नश्वरता को लोकरंग में रंगकर साथ-साथ जीते चलते हैं। कुमार रविन्द्र जी ने ठीक हे आकलन किया है कि इन गीतों में व्यक्तिगत रोमांस और सामाजिक सरोकारों तथा चिंताओं से समान जुड़ाव उपस्थित हैं।

रामशंकर जी कल और आज को एक साथ लेकर अपनी बात कहते हैं-
तरु कदम्ब थे जहाँ / उगे हैं कंकरीट के जंगल
रॉकबैंड की धुन पर / गाते भक्त आरती मंगल
जींस-टॉप ने/ चटक घाघरा चोली / कर दी पैदल 
दूध-दही को छोड़ गूजरी / बेचे कोला मिनरल
शाश्वत प्रेम पड़ा बंदीगृह / नए  उच्छृंख्रल

सामयिक विसंगतियाँ उन्हें  प्रेरित करती हैं-
दड़बे में क्यों गुमसुम बैठे / बाहर आओ
बाहर पुरवाई का लहरा / जिया जुड़ाओ
ठेस लगी तो माफ़ कीजिए / रंग महल को दड़बा कहना
यदि तौहीनी / इसके ढाँचे बुनियादों में
दफन आपके स्वर्णिम सपने / इस पर भी यह तुर्रा देखो
मैं अदना सा / करूँ शान में नुक्ताचीनी

रामशंकर जी का वैशिष्ट्य दृश्यों को तीक्ष्ण भंगिमा सहित शब्दित कर सकना है -
रेनकोटों / छतरियों बरसतियों की
देह में निकले हैं पंख / पार्कों चिड़ियाघरों से
हाईवे तक / बज उठे / रोमांस के शत शंख
आधुनिकाएँ व्यस्त / प्रेमालाप में

इसी शहरी बरसात का एक अन्य चित्रण देखें-
खिड़कियों से फ़्लैट की / दिखते बलाहक
हों कि जैसे सुरमई रुमाल
उड़ रहा उस पर / धवल जोड़ा बलॉक
यथा रवि वर्मा / उकेरें छवि कमाल
चंद बूँदें / अफसरों के दस्तखत सी
और इतने में खड़ंजे / झुग्गियाँ जाती हैं दूब

अभिनव बिंब, मौलिक प्रतीक और अनूठी कहन की त्रिवेणी बहाते रामशंकर आधुनिक हिंदी तथा देशज हिंदी में उर्दू-अंग्रेजी शब्दों की छौंक-बघार लगाकर पाठक को आनंदित कर देते हैं। अनुप्राणित, मूर्तिमंत, वसुमति, तृषावंत, विपणकशाला, दुर्दंश, केलि, कुसुमाकर, मन्वन्तर, स्पंदन, संसृति, मृदभांड, अहर्निश जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्द, सगरी, महुअन, रुत, पछुआ, निगोड़ी, गैल, नदिया, मिरदंग, दादुर, घुघुरी देशज-ग्राम्य शब्द, रिश्ते, काश, खुशबू, रफ़्तार, आमद, कसीदे, बेख़ौफ़, बेफ़िक्र, मासूम, सरीखा, नूर, मंज़िल, हुक्म, मशकें आदि उर्दू शब्द तथा फ्रॉक, पिरामिड, सेक्शन, ड्यूटी, फ़ाइल, नोटिंग, फ़्लैट, ट्रेन, रेनी डे, डायरी, ट्यूशन, पिकनिक, एक्सरे, जींस-टॉप आदि अंग्रेजी शब्दों का बेहिचक प्रयोग करते हैं वर्मा जी।  

इस संकलन में शब्द युग्मों क पर्याप्त प्रयोग हुआ है। जैसे- तीर-कमान, क्षत-विक्षत, लस्त-पस्त, राहु-केतु, धीर-वीर, सुख-दुःख, खुसुर-फुसुर, घाघरा-चोली, भूल-चूक, लेनी-देनी, रस-रंग, फाग-राग, टोंका-टाकी, यत्र-तत्र-सर्वत्र आदि। कुछ मुद्रण त्रुटियाँ समय का नदिया, हंसी-ठिठोली, आंच नहीं मद्विम हो, निर्वान है  हिंदी, दसानन, निसाचर, अमाँ-निशा आदि खटकती हैं। फूटते लड्डू, मिट्टी के माधो, बैठा मार कुल्हाड़ी पैरों, अब पछताये क्या होता है? आदि के प्रयोग से सरसता में वृद्धि हुई है। रात खिले जब रजनीगंधा, खुशबू में चाँदनी नहाई, सदा अनंदु रहैं यहै ट्वाला, कुसमय के शिला प्रहार, तन्वंगी दूर्वा, संदली साँसों, काल मदारी मरकत नर्तन जैसी अभिव्यक्तियाँ रामशंकर जी की भाषिक सामर्थ्य और संवेदनशील अभिव्यक्ति क्षमता की परिचायक हैं। इस प्रथम कृति में ही  कृतिकार परिपक्व रचना सामर्थ्य प्रस्तुत कर सका है  कृतियों  उत्सुकता जगाता है।
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- २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१ ८३२४४ 
***   





चन्द माहिया :क़िस्त 28

:1:
सौ बुत में नज़र आया
इक सा लगता है
जब दिल में उतर आया

:2:
जाना है तेरे दर तक
ढूँढ रहा हूँ मैं
इक राह तेरे घर तक

:3:
पंछी ने कब माना
मन्दिर मस्जिद का
होता है अलग दाना

:4:
किस मोड़ पे आज खड़े
क़त्ल हुआ इन्सां
मज़हब मज़ह्ब से लड़े

:5;
इक दो अंगारों से
क्या समझोगे ग़म
दरिया का ,किनारों से

-आनन्द.पाठक-
09413395592

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शनिवार, 30 जनवरी 2016

laghukatha

लघुकथा -
जनसेवा 
*
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पैट्रोल-डीजल की कीमतें घटीं। मंत्रिमंडल की बैठक में वर्तमान और परिवर्तित दर से खपत का वर्ष भर में आनेवाले अंतर का आंकड़ा प्रस्तुत किया गया। बड़ी राशि को देखकर चिंतन हुआ कि जनता को इतनी राहत देने से कोई लाभ नहीं है।  पैट्रोल के दाम घटे तो अन्य वस्तुओं के दाम काम करने की माँग कर विपक्षी दल अपनी लोकप्रियता बढ़ा लेंगे। 

अत:, इस राशि का ९०% भाग नये कराधान कर सरकार के खजाने में डालकर विधायकों का वेतन-भत्ता आदि दोगुना कर दिया जाए, जनता तो नाम मात्र की राहत पाकर भी खुश हो जाएगी। विरोधी दल भी विधान सभा में भत्ते बढ़ाने का विरोध नहीं कर सकेगा। 

ऐसा ही किया गया और नेतागण दत्तचित्त होकर कर रहे हैं जनसेवा।
***

laghukatha

लघुकथा -
अँगूठा
*
शत-प्रतिशत साक्षरता के नीति बनकर शासन ने करोड़ों रुपयों के दूरदर्शन, संगणक, लेखा सामग्री, चटाई, पुस्तकें , श्याम पट आदि खरीदे। हर स्थान से अधिकारी  कर्मचारी सामग्री लेने भोपाल पहुँचे जिन्हें आवागमन हेतु यात्रा भत्ते का भुगतान किया गया। नेताओं ने जगह-जगह अध्ययन केन्द्रों का उद्घाटन किया, संवाददताओं ने दूरदर्शन और अख़बारों पर सरकार और अधिकारियों की प्रशंसा के पुल बाँध दिये। कलेक्टर ने सभी विभागों के शासकीय अधिकारियों / कर्मचारियों को अध्ययन केन्द्रों की गतिविधियों का निरीक्षण कर प्रतिवेदन देने के आदेश दिये। 

हर गाँव में एक-एक बेरोजगार शिक्षित ग्रामीण को अध्ययन केंद्र का प्रभारी बनाकर नाममात्र मानदेय देने का प्रलोभन दिया गया। नेताओं ने अपने चमचों को नियुक्ति दिला कर अहसान से लाद दिया खेतिहर तथा अन्य श्रमिकों के रात में आकर अध्ययन करना था। सवेरे जल्दी उठकर खा-पकाकर दिन भर काम कर लौटने पर फिर राँध-खा कर आनेवालों में पढ़ने की दम ही न बाकी रहती दो-चार दिन में शौकिया आनेवाले भी बंद हो गये प्रभारियों को दम दी गयी कि ८०% हाजिरी और परिणाम न होने पर मानदेय न मिलेगा। मानदेय की लालच में गलत प्रवेश और झूठी हाजिरी दिखा कर खाना पूरी की गयी। अब बारी आयी परीक्षा की

कलेक्टर ने शिक्षाधिकारी से आदेश प्रसारित कराया कि कार्यक्रम का लक्ष्य साक्षरता है, विद्वता नहीं। इसे सफल बनाने के लिये अक्षर पहचानने पर अंक दें, शब्द के सही-गलत होने को महत्व न दें। प्रभारियों ने अपने संबंधियों और मित्रों के उनके भाई-बहिनों सहित परीक्षा में बैठाया की परिणाम न बिगड़े। कमल को कमाल, कलाम और कलम लिखने पर भी पूरे अंक देकर अधिक से अधिक परिणाम घोषित किये गये। अख़बारों ने कार्यक्रम की सफलता की खबरों से कालम रंग दिये। भरी-भरकम रिपोर्ट राजधानी गयी, कलेक्टर मुख्य मंत्री स्वर्ण पदक पाकर प्रौढ़ शिक्षा की आगामी योजनाओं हेतु शासकीय व्यय पर विदेश चले गये। प्रभारी अपने मानदेय के लिये लगाते रहे कलेक्टर कार्यालय के चक्कर और श्रमिक अँगूठा 
***

doha salila

दोहा सलिला
*
दो दुमिया दोहे

*
बागड़ खाती खेत को
नदिया निगले घाट,
मुश्किल में हैं शनिश्चर
मारा धोबी-पाट।
दाँव नारी ने भारी
दिखाती अद्भुत लाघव।।
*
आह भरे दरगाह भी
देख डटीं खातून,
परंपरा के नाम पर
अधिकारों का खून।
अब नहीं होने देंगी
नहीं मिट्टी की  माधव।।
*
ममता ने ममता तजी
पा कुर्सी का संग,
गिरगिट भी बेरंग है
देख बदलते रंग।
जला-पुतवा दे थाना
सगे अपराधी नाना।।
*
केर-बेर के संग सा
दिल्ली का माहौल,
नमो-केजरी जमाते
इक दूजे को धौल।
नहीं हम-तुम बदलेंगे
प्रजा को खूब छलेंगे।।
*
टैक्स लगते नित नये
ये मामा शिवराज,
माहुल, शकुनी, कंस के
बन बैठे सरताज।
जान-जीवन दूभर हुआ
आप उड़ाते हैं पुआ।।
*
टेस्ट जीत लो यार तुम
ट्वंटी हम लें जीत,
दोनों की जयकार हो
कैसी सुन्दर रीत?
बजाये जनता ताली
जेब अपनी कर खाली।।
*
मिर्ज़ा या नेहवाल हो
नारी भारी खूब,
जड़ें रखे मजबूत यों
जैसे नन्हीं दूब।
झूलन-झंडा फहरता
ऑस्ट्रेलिया दहलता।।
***



शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

navgeet

एक रचना-
*
दिल मरुथल चमन हुआ
रूप को निहार
*
जनप्रतिनिधि अपने ही
भत्ता बढ़वाते।
खेत के पसीने को
मंडी भिजवाते।
ज्ञान - श्रम को बेच
आजीविका कमाते-
जो उन पर बढ़ा - बढ़ा
कर नित लगवाते।
थाने में सज्जन ज्यों
लूट के शिकार-
दिल मरुथल चमन हुआ
रूप को निहार
*
लाठी - गोली खाई
थाम कर तिरंगा।
जिसने वह आज फिरे
भूखा - अधनंगा।
मत ले, जन - जन को ठग
नेता मुस्काते-
संसद में शोहदों सा
करते हैं दंगा।
थाने जलवा हँसती
बेहया सियासत-
जनमत को भेज रही
हुकूमत तिहाड़
दिल मरुथल चमन हुआ
रूप को निहार
*

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

samiksha

पुस्तक सलिला- 

चलो आज मिलकर नया कल बनायें - कुछ कर गुजरने की कवितायें 
*
[कृति विवरण- चलो आज मिलकर नया कल बनायें, काव्य संग्रह, कुसुम वीर, आकार डिमाई, आवरण- बहुरंगी, सजिल्द, जैकेट सहित, पृष्ठ १३४, मुल्य २००/-, प्रकाशक ज्ञान गंगा २०५ बी, चावडी बाज़ार दिल्ली ११०००६] 
*
सच्चा साहित्य सर्व कल्याण के सात्विक सनातन भाव से आपूरित होता है. कविता 'स्व' को 'सर्व' से संयुक्त कर कवि को कविर्मनीषी बनाती है. कोमलता और शौर्य का, अतीत और भविष्य का, कल्पना और यथार्थ का, विचार और अनुभूति का समन्वय होने पर कविता उपजती है. कुसुम वीर जी की रचनाएँ मांगल्य परक चिंतन से उपजी हैं. वे लिखने के लिये नहीं लिखतीं अपितु कुछ करने की चाह को अभिव्यक्त करने के लिए कागज़-कलम को माध्यम बनाती हैं. प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी, तथा हिंदी प्रशक्षण संस्थान में निदेशक पदों पर अपने कार्यानुभवों को ४ पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में पाठकों के साथ बाँट चुकने के पश्चात् इस कृति में कुसुम जी देश और समाज के वर्तमान से भविष्य गढ़ने के अपने सपने शब्दों के माध्यम से साकार कर सकी हैं. 

साठ सारगर्भित, सुचिंतित, लक्ष्यवाही रचनाओं का यह संग्रह भाव, रस, बिम्ब, प्रतीक और शैली से पाठक को बाँधे रखता है. 
हर नदी के पार होता है किनारा / हर अन्धेरी रात के आगे उजाला 
मन की दुर्बलता मिटाकर तुम चलो / एक दीपक प्रज्वलित कर तुम चलो 

बेहाल बच्चे, बदहवासी, कन्या नहीं अभिशाप हूँ, मैं एक बेटी, मत बाँटों इंसान को जैसी रचनाएँ वर्तमान विषमताओं और विडम्बनाओं से उपजी हैं. कवयित्री इन समस्याओं से निराश नहीं है, वह परिवर्तन का आवाहन आत्मबोध, प्रवाह, मंथन करता यह मन मेरा, जीवन ऐसे व्यर्थ नहो, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए जैसी रचनाओं के माध्यम से करती है. 

दिये के नीचे भले ही अँधेरा हो, ऊपर उजाला ही होता है. यह उजास की प्यास ही घोर तिमिर से भी सवेरा उगाती है. धूप धरा से मिलाने आयी, मधुर मिलन, वात्सल्य, पावस, तेरे आने की आहट   से, प्राण ही शब्दित हुए, मन के झरोखे से अदि रचनाएँ जीवन में माधुर्य, आशा और उल्लास के स्वरों की अभिव्यंजना करती हैं. 
कौन कहता है जगत में / प्रीति की भाषा नहीं है 
मौन के अंत: सुरों से / प्राण ही शब्दित हुए हैं 

शब्द शक्ति की जय-जयकार करती ऐसी पंक्तियाँ पाठक के मन-प्राण को स्पंदित कर देती हैं. 

कुसुम जी की रचनाएँ अपने कथ्य की माँग के अनुसार छंद का प्रयोग करने या न करने का विकल्प चुनती हैं. दोनों हो प्रारूपों में उनकी अभिव्यक्ति प्रांजल और स्पष्ट है- 
उषा को साथ ले/ अरुण-रथ पर सवार होकर
कल फिर लौटेगा सूरज / रत की पोटली में 
सपनों को समेटे / पृथ्वी के प्रांगण पर
स्वर्णिम रश्मियों का उपहार बाँटने 
किसी अकिञ्चन की चाह में    

प्रसाद गुण संपन्न सरस-सहज बोधगम्य भाषा कुसुम जी की शक्ति है. वे मन से मन तक पहुँचने को कविता का गुण बना सकी हैं. डॉ. दिनेश श्रीवास्तव तथा इंद्रनाथ चौधुरी लिखित मंतव्यों ने संग्रह की गरिमा-वृद्धि की है. कुसुम जी का यह संग्रह उनकी अन्य रचनाओं को पढ़ने की प्यास जगाता है. 

***
-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१
९४२५१८३२४४ / salil.sanjiv@gmail.com 

chaupayee chhand

रसानंद दे छंद नर्मदा १४
​​


दोहा, आल्हा, सार ताटंक,रूपमाला (मदन), छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए चौपाई से.
भारत में शायद ही कोई हिन्दीभाषी होगा जिसे चौपाई छंद की जानकारी न हो. रामचरित मानस में मुख्य छंद चौपाई ही है.
​ 
शिव चालीसा, हनुमान चालीसा आदि धार्मिक रचनाओं में चौपाई का प्रयोग सर्वाधिक हुआ है किन्तु इनमें प्रयुक्त भाषा उस समय की बोलियों (अवधी, बुन्देली, बृज, भोजपुरी आदि ) है.
रचना विधान-
​                ​
चौपाई के चार चरण होने के कारण इसे चौपायी नाम मिला है. यह एक 
सम 
मात्रिक 
द्विपदिक
​चतुश्चरणिक
छंद है. इसकी चार चरणों में मात्राओं की संख्या निश्चित तथा समान १६ - १६ रहती हैं. प्रत्येक पद में दो चरण होते हैं जिनकी अंतिम मात्राएँ समान (दोनों में लघु या दोनों में गुरु) होती हैं. चौपायी के प्रत्येक चरण में १६ तथा प्रत्येक पंक्ति में ३२ मात्राएँ होती हैं. चौपायी के चारों चरणों के समान मात्राएँ हों तो नाद सौंदर्य में वृद्धि होती है किन्तु यह अनिवार्य नहीं है. चौपायी के पद के दो चरण विषय की दृष्टि से आपस में जुड़े होते हैं किन्तु हर पंक्ति अपने में स्वतंत्र होता है. चौपायी के पठन या गायन के समय हर चरण के बाद अल्प विराम लिया जाता है जिसे यति कहते हैं.  अत: किसी चरण का अंतिम शब्द अगले चरण में नहीं जाना चाहिए. चौपायी के चरणान्त में गुरु-लघु मात्राएँ वर्जित हैं. चरण के अंत में जगण (ISI) एवं तगण (SSI) नहीं होने चाहिए
​ अर्थात अपन्क्ति का अंत गुरु लघु से न हो ​
​ चौपाई के चरणान्त में गुरु गुरु, लघु लघु गुरु, गुरु लघु लघु या लघु लघु लघु लघु ही होता है. 

मात्रा बाँट - चौपाई में चार चौकल हों तो उसे पादाकुलक कहा जाता है. द्विक्ल या चौकल के बाद सम मात्रिक ​कल द्विपद या चौकल रखा जाता है. विषम मात्रिक कल त्रिकल आदि होने पर पुन: विषम मात्रिक कल लेकर उन्हें सममात्रिक कर लिया जाता है. विषम कल के तुरंत बाद सम कल नहीं रखा जाता।  

उदाहरण:
​ ​
१. जय गिरिजापति दीनदयाला |  -प्रथम चरण 
    १ १  १ १  २ १ १  २ १ १ २ २  = १६ मात्राएँ    
 
सदा करत संतत प्रतिपाला ||    -द्वितीय चरण
    १ २ १ १ १  २ १ १ १ १ २ २    = १६
​ 
 मात्राएँ  
    भाल चंद्रमा सोहत नीके |        - तृतीय चरण
    २ १  २ १ २ २ १ १  २ २       = १६ मात्राएँ  
    कानन कुंडल नाक फनीके ||     -चतुर्थ चरण       -
शिव चालीसा 
​                                                              ​ 
​ 
 
​         ​
१ 
​  ​
​ १  ​
२ १ १  २ १  १ २ २   = १६ मात्राएँ
​२. ​
ज१ य१ ह१ नु१ मा२ न१ ज्ञा२ न१ गु१ न१ सा२ ग१ र१ = १६ मात्रा


​ ​
ज१ य१ क१ पी२ स१ ति१ हुं१ लो२ क१ उ१ जा२ ग१ र१ = १६ मात्रा

​ ​
रा२ म१ दू२ त१ अ१ तु१ लि१ त१ ब१ ल१ धा२ मा२ = १६ मात्रा
​ ​
अं२ ज१ नि१ पु२ त्र१ प१ व१ न१ सु१ त१ ना२ मा२ = १६ मात्रा

​ ३. ​
कितने अच्छे लगते हो तुम | 
​         ​
बिना जगाये जगते हो तुम || 


​         
नहीं किसी को ठगते हो तुम | 
​         
सदा प्रेम में पगते हो तुम || 

​         
दाना-चुग्गा मंगते हो तुम | 
​         
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ चुगते हो तुम || 

​         
आलस कैसे तजते हो तुम?
​         
क्या प्रभु को भी भजते हो तुम?

​         
चिड़िया माँ पा नचते हो तुम | 
​         
बिल्ली से डर बचते हो तुम || 

​         
क्या माला भी जपते हो तुम?
​         
शीत लगे तो कँपते हो तुम?

​         
सुना न मैंने हँसते हो तुम | 
​         
चूजे भाई! रुचते हो तुम ||
​     (
चौपाई छन्द का प्रयोग कर 'चूजे' विषय पर मुक्तिका (हिंदी गजल) 
​में बाल गीत)
  • ४ 
    भुवन भास्कर बहुत दुलारा।
    ​ ​
    मुख मंडल है प्यारा-प्यारा।।
    ​      ​
    सुबह-सुबह जब जगते हो तुम|
    ​ ​
    कितने अच्छे लगते हो तुम।।
    ​ 
    ​-
    रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
  • हर युग के इतिहास ने कहा| भारत का ध्वज उच्च ही रहा|
    ​     ​
    सोने की चिड़िया कहलाया| सदा लुटेरों के मन भाया।।
    ​ -
    छोटू भाई चतुर्वेदी
     
  • मुझको जग में लाने वाले |
    दुनिया अजब दिखने वाले |
    ​     ​
    उँगली थाम चलाने वाले |
    ​ ​
    अच्छा बुरा बताने वाले ||
    ​ -
    शेखर चतुर्वेदी
     
  • श्याम वर्ण, माथे पर टोपी|
    ​ ​
    नाचत रुन-झुन रुन-झुन गोपी|
    हरित वस्त्र आभूषण पूरा|
    ​ ​
    ज्यों लड्डू पर छिटका बूरा||
    ​  -
    मृत्युंजय
  • निर्निमेष तुमको निहारती|
    ​ ​
    विरह –निशा तुमको पुकारती|
    मेरी प्रणय –कथा है कोरी|
    ​ ​
    तुम चन्दा, मैं एक चकोरी||
    ​  -
    मयंक अवस्थी
     
  • .मौसम के हाथों दुत्कारे|
    ​ ​
    पतझड़ के कष्टों के मारे|
    सुमन हृदय के जब मुरझाये|
    ​ ​
    तुम वसंत बनकर प्रिय आये||
    ​ -
    रविकांत पाण्डे
  • १०
    जितना मुझको तरसाओगे| उतना निकट मुझे पाओगे|
    तुम में 'मैं', मुझमें 'तुम', जानो| मुझसे 'तुम', तुमसे 'मैं', मानो||
    ​ 
    राणा प्रताप सिंह
  • ११
    . एक दिवस आँगन में मेरे | 
    उतरे दो कलहंस सबेरे|
    कितने सुन्दर कितने भोले | सारे आँगन में वो डोले ||
    ​  -
    शेषधर तिवारी
  • ​२
    . नन्हें मुन्हें हाथों से जब । 
    छूते हो मेरा तन मन तब॥
    मुझको बेसुध करते हो तुम। कितने अच्छे लगते हो तुम ||
    ​ -
    धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन'
  • *******************

facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 
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बुधवार, 27 जनवरी 2016

laghukatha

लघुकथा-
तिरंगा
*
माँ इसे फेंकने को क्यों कह रही हो? बताओ न इसे कहाँ रखूँ? शिक्षक कह रहे थे इसे सबसे ऊपर रखना होता है। तुम न तो पूजा में रखने दे रही हो, न बैठक में, न खाने की मेज पर, न ड्रेसिंग टेबल पर फिर कहाँ रखूँ?
बच्चा बार-बार पूछकर झुंझला रहा था.… इतने में कर्कश आवाज़ आयी 'कह तो दिया फेंक दे, सुनाता है कि लगाऊँ दो तमाचे?'
अवाक् बच्चा सुबकते हुए बोला 'तुम बड़े लोग गंदे हो। सही बात बताते नहीं और डाँटते हो, तुमसे बात नहीं करूंगा'। सुबकते-सुबकते कब आँख लगी पता ही नहीं चला उसके सीने से अब भी लगा था तिरंगा।
***

laghukatha

लघुकथा - 
अपनों की गुलामी 
*
इस स्वतंत्र देश से तो गुलाम भारत ही ठीक था। हम-तुम एक साथ तो रह पाते थे। तब मेरे लिये तुम लाठी-गोली भी हँसकर खा लेते थे। तुम्हारे साथ खेत, खलिहान, जंगल, पहाड़, महल, झोपड़ी हर जगह मैं रह पाता था। बच्चे, बूढ़े, महिला सभी का सान्निन्ध्य पाकर मेरा सर गर्व से ऊँचा हो जाता था।

देश आज़ाद होने के पहले जो अफसर मेरे साये से भी डरकर मुझसे नफरत करते थे उन्हीं ने मुझे नियम-कायदों में कैद कर अपना गुलाम बना लिया। तुम आज़ाद हो गये, मैं गुलाम हो गया।

अब तुम मुझे अपने घर, खेत, वाहन में फहरा नहीं पाते, गलती से उल्टा लगा लो तो तुम्हें सजा हो जाती है। मजबूरी में तम्हें अपने वस्त्रों और सामानों पर विदेशों के झंडे लगाये देखता हूँ तो मेरा मन रोता है, ऐसी कैसी स्वतंत्रता कि स्वतंत्र नागरिक को अपना झंडा फहराने में भी डरना पड़े।

काश! कोई मुझे दिला दे मुक्ति अपनों की गुलामी से।
***

एक ग़ज़ल : उन्हें हाल अपना सुनाते भी क्या.....

एक ग़ज़ल : उन्हें हाल अपना सुनाते भी क्या...


उन्हें हाल अपना सुनाते भी क्या
भला सुन के वो मान जाते भी क्या

अँधेरे  उन्हें रास आने  लगे
चिराग़-ए-ख़ुदी वो जलाते भी क्या

अभी ख़ुद परस्ती में है मुब्तिला
उसे हक़ शनासी बताते भी क्या

नए दौर की  है नई रोशनी
पुरानी हैं रस्में ,निभाते भी क्या

जहाँ भी गया मैं  गुनह साथ थे
नदामत जदा,पास आते भी क्या

उन्हें ख़ुद सिताई से फ़ुरसत नहीं
वो सुनते भी क्या और सुनाते भी क्या

दम-ए-आख़िरी जब कि निकला था दम

पता था उन्हें, पर वो आते  भी क्या

जहाँ दिल से दिल की न गाँठें खुले
वहाँ हाथ ’आनन’ मिलाते भी क्या

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ;-
ख़ुदपरस्ती =अपने आप को ही सब कुछ समझने का भाव
मुब्तिला = ग्रस्त ,जकड़ा हुआ
हक़शनासी =सत्य व यथार्थ को पहचानना
नदामत जदा = लज्जित /शर्मिन्दा
खुदसिताई =अपने मुँह से अपनी ही प्रशंसा करना

सोमवार, 25 जनवरी 2016

samiksha

पुस्तक सलिला-

नवगीतों के घाट पर कागज़ की नाव  
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: कागज़ की नाव, नवगीत संग्रह, राजेंद्र वर्मा, वर्ष २०१५, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, जैकेट सहित, बहुरंगी, पृष्ठ ८०, मूल्य १५० रु., उत्तरायण प्रकाशन, के ३९७ आशियाना कॉलोनी, लखनऊ २२६०१२, दूरभाष ९८३९८२५०६२, नवगीतकार संपर्क ३/१९ विकास नगर लखनऊ २२६०२२, चलभाष ८००९६६००९६।]
*
'साम्प्रतिक मानव समाज से सम्बद्ध संवेदना के वे सारे आयाम, विसंगतियाँ और विद्रूपताएँ तथा संबंधों का वह खुरदुरापन जिन्हें भोगने-जीने को हम-आप अभिशप्त हैं, इन सारी परिस्थितियों को नवगीतकार राजेंद्र वर्मा ने अपने कविता के कैनवास पर बड़ी विश्वसनीयता के साथ उकेरा है। सामाजिक यथार्थ को आस्वाद्य बना देना उनकी कला है। अनुभूति की गहनता और अभिव्यक्ति की सहजता के दो पाटों के बीच खड़ा आम पाठक अपने को संवेदनात्मक स्तर पर समृद्ध समझने लगता है, यह समीकरण राजेंद्र वर्मा के नवगीतों से होकर गुजरने का एक आत्मीय अनुभव है।' वरिष्ठ नवगीतकार श्री निर्मल शुक्ल ने 'कागज़ की नाव' में अंतर्निहित नवगीतों का सटीक आकलन किया है। 

राजेंद्र वर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं. दोहे, गीत, व्यंग्य लेख, लघुकथा, ग़ज़ल, हाइकु, आलोचना, कविता, कहानी आदि विधाओं में उनकी १५ पुस्तकें प्रकाशित हैं। वे सिर्फ लिखने के लिये नहीं लिखते। राजेंद्र जी के लिये लेखन केवल शौक नहीं अपितु आत्माभिव्यक्ति और समाज सुधार का माध्यम है। वे किसी भी विधा में लिखें उनकी दृष्टि चतुर्दिक हो रही गड़बड़ियों को सुधारकर सत-शिव-सुन्दर की स्थापना हेतु सक्रिय रही है। नवगीत विधा को आत्मसात करते हुए राजेंद्र जी लकीर के फ़कीर नहीं बनते। वे अपने चिंतन, अवलोकन, और आकलन के आधार पर वैषम्य को इन्गित कर उसके उन्मूलन की दिशा दिखाते हैं। उनके नवगीत उपदेश या समाधान को नहीं संकेत को लक्ष्य बनाते हैं क्योंकि उन्हें अपने पाठकों के विवेक और सामर्थ्य पर भरोसा है। 

आम आदमी की आवाज़ न सुनी जाए तो विषमता समाप्त नहीं हो सकती। राजेंद्र जी सर्वोच्च व्यवस्थापक और प्रशासक को सुनने की प्रेरणा देते हैं - 
तेरी कथा हमेशा से सुनते आये हैं, 
सत्य नरायन! तू भी तो सुन 
                               कथा हमारी। 
समय कुभाग लिये  
आगे-आगे चलता है 
सपनों में भी अब तो 
केवल डर पलता है 
घायल पंखों से 
                      उड़ने की है लाचारी। 

यह लाचारी व्यक्ति की हो या समष्टि की, समाज की राजेंद्र जी को प्रतिकार की प्रेरणा देती है और वे कलम को हथियार की तरह उपयोग करते हैं। 

सच की अवहेलना उन्हें सहन नहीं होती। न्याय व्यवस्था की विकलांगता उनकी चिंता का विषय है-
कौआरोर मची पंचों में 
सच की कौन सुने? 
बेटे को खतरा था 
किन्तु सुरक्षा नहीं मिली 
अम्मा दौड़ीं बहुत 
व्यवस्था लेकिन नहीं हिली 
कुलदीपक बुझ गया 
न्याय की देवी शीश धुनें।

'पुरस्कार दिलवाओ' शीर्षक नवगीत में राजेन्द्र जी पुरस्कारों के क्रय-विक्रय की अपसंस्कृति के प्रसार पर वार करते हैं- 
कब तक माला पहनाओगे?
पुरस्कार दिलवाओ।
पद्म पुरस्कारों का देखो / लगा हुआ है मेला 
कुछ तो करो / घटित हो मुझ पर 
शुभ मुहूर्त की बेला 
पैसे ले लो, पर मोमेंटो / सर्टिफिकेट दिलाओ। 

आलोचकों द्वारा गुटबंदी और चीन्ह-चीन्ह कर प्रशंसा की मनोवृत्ति उनसे अदेखी नहीं है- 
बीती जाती एक ज़िंदगी / सर्जन करते-करते 
आलोचकगण आपस में बस / आँख मार कर हँसते।
मेरिट से क्या काम बनेगा सिफारिशें भिजवाओ।

मौलिक प्रतीक, अप्रचलित बिम्ब, सटीक उपमाएँ राजेंद्र जी के नवगीतों का वैशिष्ट्य है। वे अपने कथन से पाठक को चमत्कृत नहीं करते अपितु नैकट्य स्थापित कर अपनी बात को पाठक के मन में स्थापित कर देते हैं। परिवारों के विघटन पर 'विलग साये' नवगीत देखें-
बँट गयी दुनिया मगर / हम कुछ न कर पाये।
घाट बँटा दीवार खिंचकर/ बँट गये खपरैल-छप्पर 
मेड़ छाती ठोंक निकली / बाग़ में खेतों के भीतर 
हम किसी भी एक के / हिस्से नहीं आये  
कुछ इधर हैं, कुछ उधर हैं / आत्म से भी बेखबर हैं 
बात कैसी भी कहें हम / छिड़ रहा जैसे समर है 
बह गयी कैसी हवा / खुद से विलग साये 

आत्म से बेखबर होना और खुद से साये का भी अलग होना समाज के विघटन के प्रति कवि की पीड़ा और चिंता को अभिव्यक्त करता है। 

राजेंद्र जी राजनैतिक अराजकता, प्रशासनिक जड़ता और अखबारी निस्सारता के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिये कलम न उठायें, यह कैसे संभव है- 
राजा बहरा, मंत्री बहरा / बहरा थानेदार 
कलियुग ने भी मानी जैसे / वर्तमान से हार 
चार दिनों से राम दीन की  बिटिया गायब है
थानेदार जनता, लेकिन सिले हुए लब हैं 
उड़ती हुई खबर है, लेकिन फैलाना मत यार!
घटना में शामिल है खुद ही / मंत्री  जी की कार  
कॉलेज के चरसी को भी कुछ-कुछ मालुम है 
लेकिन घटना-वाले दिन से  गुमसुम-गुमसुम है 
टी. व्ही. वालों ने भी अब तक शुरू न की तकरार 
सोमवार से आज हो गया / है देखो इतवार 
प्रथम सूचना दर्ज़ कराने में छक्के छूटे 
किन्तु नामजद रपट कराने में हिम्मत टूटे 
थाने का थाना बैठा है जैसे खाये  खार
बेटी के चरित्र पर उँगली / रक्खे बारम्बार 

यह नवगीत घटना का उल्लेख मात्र नहीं करता अपितु पूरे परिवेश को शब्द चित्र की तरह साकार कर पाता है। 

राजेंद्र जी का भाषिक संस्कार और शब्द वैभव असाधारण है। वे हिंदी, उर्दू, अवधी, अंग्रेजी के साथ अवधी के देशज शब्दों का पूरी सहजता से उपयोग कर पाते हैं। कागज़, मस्तूल, दुश्मन, पाबंदी, रिश्ते, तासीर, इज्जत, गुलदस्ता, हालत, हसरत, फ़क़त, रौशनी, बयान, लब, तकरार, खर, फनकार, बेखबर, वक़्त, असलहे, बेरहम, जाम, हाकिम, खातिर, मुनादी, सकून, तारी, क़र्ज़, बागी, सवाल, मुसाफिर, शातिर, जागीर, गर्क, सिफारिश जैसे उर्दू लफ्ज़ पूरे अपनेपन सहित इंगिति, अभिजन, समीरण, मृदुल, संप्रेषण, प्रक्षेपण, आत्मरूप, स्मृति, परिवाद, सात्विक, जलद, निस्पृह, निराश्रित, रूपंकर, हृदवर, आत्म, एकांत, शीर्षासन, निर्मिति, क्षिप्र, परिवर्तित, अभिशापित, विस्मरण, विकल्प, निर्वासित जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्दों से गलबहियाँ डाले हैं तो करमजली, कौआरोर, नथुने, जिनगी, माड़ा, टटके, ललछौंह, हमीं, बँसवट, लरिकौरी, नेवारी, मेड़, छप्पर, हुद्दा, कनफ़ोड़ू, ठाड़े, गमका, डांडा, काठ, पुरवा जैसे देशज शब्द उनके कंधे पर झूल रहे हैं। इनके साथ ही शब्द दरबार में शब्द युग्मों की अच्छी-खासी उपस्थिति दर्ज़ हुई है- मान-सम्मान, धूल-धूसरित, आकुल-व्याकुल, वाद-विवाद, दान-दक्षिणा, धरा-गगन, साथ-संग, रात-दिवस, राहु-केतु, आनन-फानन, छप्पर-छानी, धन-बल, ठीकै-ठाक, झुग्गी-झोपड़िया, मौज-मस्ती, टोने-टुटके, रास-रंग आदि दृष्टव्य हैं। 

मन-पाखी, मत्स्य-न्याय, सत्यनरायन, गोडसे, घीसू-माधो, मन-विहंग आदि शब्दों का प्रयोग स्थूल अर्थ में नहीं हुआ है। वे प्रतीक के रूप में प्रयुक्त होकर अर्थ के साथ-साथ भाव विशेष की भी अभिव्यंजना करते हैं। राजेंद्र जी मुहावरेदार भाषा के धनी हैं। छोटे-बड़े सभी ने मिल छाती पर मूँग दली, रिश्ते हुए परास्त, स्वार्थ ने बाजी मारी, शीश उठाया तो माली ने की हालत पतली, किन्तु गरीबी ने घर भर का / फ़क़त एक सपना भी छीना, समय पड़े तो / प्राण निछावर / करने का आश्वासन है, मुँह फेरे हैं देखो / कब से हवा और ये बादल, ठण्ड खा गया दिन, खेत हुआ गेहूँ, गन्ने का मन भर आया, किन्तु वे सिर पर खड़े / साधे हुए हम, प्रथम सूचना दर्ज करने में छक्के छूटे, भादों में ही जैसे / फूल उठा कांस, मेंड़ छाती ठोंक निकली, बात का बनता बतंगड़ जैसी भाषा पाठक-मन  को बाँधती है। 

राजेंद्र जी नवगीत को कथ्य के नयेपन, भाषा शैली में नवीनता, बिम्ब-प्रतीकों के नयेपन के निकष पर रचते हैं। क्षिप्र मानचित्र शीर्षक नवगीत ग़ज़ल या मुक्तिका के शिल्प पर रचित होने के साथ-साथ अभिनव कथ्य को प्रस्तुत करता है-
क्या से क्या चरित्र हो गया / आदमी विचित्र हो गया 
पुण्यता अधर में रह रही / नित नवीन चोट सह रही 
स्नान कर प्रभुत्व-गंग में / पातकी पवित्र हो गया 
मित्रता में विष मिला दिया / शत्रुता को मधु पिला दिया 
स्वार्थ-पूर्ति का हुआ चलन / शत्रु ही सुमित्र हो गया 
द्रव्य के समीकरण बने / न्य झुका अनय के सामने 
वीरता के सूर्य को ग्रहण / क्षिप्र मानचित्र हो गया 

राजेन्द्र जी की छंदों पर पकड़ है। निर्विकार बैठे शीर्षक नवगीत का मुखड़ा महाभागवत जातीय विष्णुपद छंद में तथा अन्तरा लाक्षणिक जातीय पद्मावती छंद में है। दोनों छंदों को उन्होंने भली-भाँति साधा है-
नये- नये महराजे / घूम रहे ऐंठे।
लोकतंत्र के अभिजन हैं ये / देवों से भी पावन हैं ये  
सेवक कहलाते-कहलाते / स्वामी बन ऐंठे 
लाज-शरम पी गये घोलकर / आत्मा बेची तोल-तोलकर 
लाख-करोड़ नहीं कुछ इनको / अरबों में पैठे 
नयी सदी के नायक हैं ये / छद्मराग के गायक हैं ये 
लोक जले तो जले, किन्तु ये / निर्विकार बैठे 

मुखड़े और अँतरे में एक ही छंद का प्रयोग करने में भी उन्हें महारत हासिल है। देखिये महाभागवत जातीय विष्णुपद में रचित कागज़ की नाव शीर्षक नवगीत की पंक्तियाँ  -
बारह अभावों की / आयी है / डूबी गली-गली 
डीएम साढ़े / हम देख रहे / काग़ज़ की नाव चली 
माँझी के हाथों में है / पतवार / आँकड़ों की 
है मस्तूल उधर ही / इंगिति / जिधर धाकड़ों की
लंगर जैसे / जमे हुए हैं / नामी बाहुबली 

ऊपर उद्धृत 'सत्यनरायन' शीर्षक नवगीत अवतारी तथा दिगपाल छंदों में है। राजेन्द्र जी का वैशिष्ट्य छंदों के विधान को पूरी तरह अपनाना है। वे प्रयोग के नाम पर छंदों को तोड़ते-मरोड़ते नहीं। भाषा तथा भाव को कथ्य का सहचर बना पाने में वे दक्ष हैं। 'जाने कितने / सूर्य निकल आये' में तथ्य दोष है। कहीं-कहीं मुद्रण त्रुटियाँ हैं। जैसे ग्रहन, सन्यासिनि, उर्जा आदि। 

अव्यवस्था और कुव्यवस्था पर तीक्ष्ण प्रहार कर राजेंद्र जी ने नवगीत को शास्त्र की तरह प्रयोग किया है- राज अभृ, मंत्री बहरा / बहरा थानेदार, अच्छे दिन आनेवाले थे / किन्तु नहीं आये, नए-नए राजे-महराज / घूम रहे ऐंठे, कौआरोर मची पँचों में / सच की कौन सुने?, ऐसा मायाजाल बिछा है / कोई निकले भी तो कैसे?, जन-जन का है / जन के हेतु /  जनों द्वारा / पर, निरुपाय हुआ जाता / जनतंत्र हमारा आदि अभिव्यक्तियाँ  आम आदमी की बात सामने लाती हैं। राजेन्द्र जी आम आदमी को अभषा में उसकी बात कहते हैं। कागज़ की नाव का पाठक इसे पूरी तरह पढ़े बिना छोड़ नहीं पाता यह नवगीतकार के नाते राजेंद्र जी की सफलता है।  

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- २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ / ९४२५१८३२४४

दोहा

दोहा सलिला-
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एक हाथ से दे रहा, दूजे से ले छीन
संविधान ही छल-कथा, रचता नित्य नवीन
*
रोड़ा लाया कहीं से, ईंट कहीं से माँग
संविधान ने अड़ा दी, लोकतंत्र में टाँग
*
नाग साँप बिच्छू खड़े, जिसको चुनिए आप
विष उगलेगा नित वही, देश सहेगा शाप
*
इतने संशोधन हुए, फिर भी हुआ न ठीक
संविधान ने कभी भी, सही नहीं की लीक
*
अंधे के हाथी हुए, संविधान जी आप
दुर्योधन-धृतराष्ट्र मिल, करें आपका जाप
*
जो हो होने दीजिए, बैठें मूँदे नैन
संविधान जी मूक हैं, कभी न बोलें बैन
*