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शनिवार, 31 जुलाई 2010

श्रेष्ठ गीतकार अलंकरण: डा. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

सितारों की महफ़िल में आज डा. रूप चन्द्र शास्त्री मयंक और आचार्य संजीव वर्मा सलिल

लखनऊ, गुरुवार, २९ जुलाई २०१०

ब्लोगोत्सव-२०१० को आयामित करने हेतु किये गए कार्यों में जिनका अवदान सर्वोपरि है वे हैं डा. रूप चन्द्र शास्त्री मयंक और आचार्य संजीव वर्मा सलिल जिन्होनें उत्सव गीत रचकर ब्लोगोत्सव में प्राण फूंकने का महत्वपूर्ण कार्य किया. ब्लोगोत्सव की टीम ने उनके इस अवदान के लिए संयुक्त रूप से उन दोनों सुमधुर गीतकार को वर्ष के श्रेष्ठ उत्सवी गीतकार का अलंकरण देते हुए सम्मानित करने का निर्णय लिया है ...."जानिये अपने सितारों को" के अंतर्गत प्रस्तुत है उनसे पूछे गए कुछ व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर


(१) पूरा नाम :

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

(२) पिता/माता का नाम/जन्म स्थान

पिता का नाम: श्री घासीराम आर्य
माता का नाम: श्रीमती श्यामवती देवी

(३) वर्तमान पता :

टनकपुर-रोड, खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) पिन- 262308

ई मेल का पता :

roopchandrashastri@gmail.com

टेलीफोन/मोबाईल न

Phone/Fax.: 05943-250207
Mobile No. 09368499921, 09997996437, 09456383898

(४) आपके प्रमुख व्यक्तिगत ब्लॉग :

"उच्चारण" http://uchcharan.blogspot.com/
"शब्दों का दंगल" http://uchcharandangal.blogspot.com/
"मयंक" http://powerofhydro.blogspot.com/
"नन्हे सुमन" http://nicenice-nice.blogspot.com/
"चर्चा मंच" http://charchamanch.blogspot.com/
"बाल चर्चा मंच" http://mayankkhatima.blogspot.com/
"अमर भारती" http://bhartimayank.blogspot.com/


(५) अपने ब्लॉग के अतिरिक्त अन्य ब्लॉग पर गतिविधियों का विवरण :

नुक्कड़, तेताला, हिन्दी साहित्य मंच, पिताजी, पल्लवी और नन्हा मन !

(६) अपने ब्लॉग के अतिरिक्त आपको कौन कौन सा ब्लॉग पसंद है ?

कविताओं के तो सभी ब्लॉग पसंद हैं!

(७) ब्लॉग पर कौन सा विषय आपको ज्यादा आकर्षित करता है?

काव्य!

(८) आपने ब्लॉग कब लिखना शुरू किया ?

21 जनवरी, 2009 से!

(९) यह खिताब पाकर आपको कैसा महसूस हो रहा है ?

अच्छा लग रहा है!
आपका आभार कि आपने इस नाचीज को इस योग्य समझा!

(१०) क्या ब्लोगिंग से आपके अन्य आवश्यक कार्यों में अवरोध उत्पन्न नहीं होता ?
होता है

तो उसे कैसे प्रबंध करते है ?

अपनी रुचियों के लिए जैसे अन्य लोग समय निकालते हैं वैसे मैं भी समय निकाल ही लेता हूँ!

(११) ब्लोगोत्सव जैसे सार्वजनिक उत्सव में शामिल होकर आपको कैसा लगा ?

ब्लोगोत्सव जैसे सार्वजनिक उत्सव में शामिल होकर मैं अपने को धन्य मानता हूँ!

(१२) आपकी नज़रों में ब्लोगोत्सव की क्या विशेषताएं रही ?

छिपी हुई प्रतिभाओं को आगे लाने में ब्लोगोत्सव ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है!

(१३) ब्लोगोत्सव में वह कौन सी कमी थी जो आपको हमेशा खटकती रही ?

मेरी नजर में तो कोई भी नही!

(१४) ब्लोगोत्सव में शामिल किन रचनाकारों ने आपको ज्यादा आकर्षित किया ?

सभी ने!

(१५) किन रचनाकारों की रचनाएँ आपको पसंद नहीं आई ?

आपने तो रचनाकारों की चुनीदा रचनाओं को प्रस्तुत किया था इसलिए नापसन्द का तो प्रश्न ही नही उठता है!

(१६) क्या इस प्रकार का आयोजन प्रतिवर्ष आयोजित किया जाना चाहिए ?

अवश्य!

(१७) आपको क्या ऐसा महसूस होता है कि हिंदी ब्लोगिंग में खेमेवाजी बढ़ रही है ?

यह तो सामान्य सी बात है! गुटबाजी से तो बचना ही चाहिए!

(१८) यदि हाँ तो क्या यह हिंदी चिट्ठाकारी के लिए अमंगलकारी नहीं है ?

मंथन के बाद ही तो विष और अमृत निकलता है!
विष त्याग दीजिए और अमृत पान कीजिए!

(१९) आप कुछ अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताएं :
फिर कभी

(२०) चिट्ठाकारी से संवंधित क्या कोई ऐसा संस्मरण है जिसे आप इस अवसर पर सार्वजनिक करना चाहते हैं ?
फिर कभी
(२१) इस अवसर पर अपनी कोई रचना सुनाएँ
एक ऑडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे स्वर दिया अर्चना चाव ने



बहुत बहुत धन्यवाद रूप चन्द्र शास्त्री जी .....इस अवसर पर ऋग्वेद की दो पंक्तियां आपको समर्पित है कि - ‘‘आयने ते परायणे दुर्वा रोहन्तु पुष्पिणी:। हृदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमें ।।’’अर्थात आपके मार्ग प्रशस्त हों, उस पर पुष्प हों, नये कोमल दूब हों, आपके उद्यम, आपके प्रयास सफल हों, सुखदायी हों और आपके जीवन सरोवर में मन को प्रफुल्लित करने वाले कमल खिले।

जी धन्यवाद !
====================================================================

१) पूरा नाम :
संजीव वर्मा 'सलिल'
(२) माता/पिता का नाम/जन्म स्थान :
स्व. श्रीमती शांति देवी - स्व. श्री राजबहादुर वर्मा.

(३) वर्तमान पता :
समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपिअर टाउन, जबलपुर ४८२००१ मध्य प्रदेश.

ई मेल का पता :
सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम, दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

टेलीफोन/मोबाईल न.
०७६१ २४१११३१, ०९४२५१ ८३२४४

(४) आपके प्रमुख व्यक्तिगत ब्लॉग :

दिव्यनर्मदा, गीतसलिला, सलिल की लघुकथाएं, हाइकु सलिला, तेवर तेवरी के खूब, लघुकथा सलिला, किताबघर,

(५) अपने ब्लॉग के अतिरिक्त अन्य ब्लॉग पर गतिविधियों का विवरण :

हिन्दयुग्म पर दोहागाथा सनातन (६५ कड़ी), साहित्याशिल्पी पर काव्य का रचनाशास्त्र (६५ कड़ी), विश्व की किसी भी भाषा के साहित्य की सर्वाधिक लम्बी श्रृंखलाएं, लखनऊ ब्लोगेर्स असोसिअशन, कबीरा खडा़ बाज़ार में, भारत-ब्रिगेड, हिंदुस्तान का दर्द, रचनाकार, स्मृति दीर्घा, पिताजी, जनिक्ति, नन्हा मन, शब्दकार, हिंदीहिंदी.निंग.कॉम, जय भोजपुरी, कायस्थ परिवार पत्रिका, सृजनगाथा, मंथन, अहिव्यक्ति, अनुभूति, आखरकलश, ओपन बुक्स ऑन लाइन, सप्तरंगी, महावीर, आदि पर निरंतर लेखन.

(६) अपने ब्लॉग के अतिरिक्त आपको कौन कौन सा ब्लॉग पसंद है :
उक्त सभी को लगभग नित्य पढता हूँ.

(७) ब्लॉग पर कौन सा विषय आपको ज्यादा आकर्षित करता है?
पद्य रचनाएँ.

(८) आपने ब्लॉग कब लिखना शुरू किया ?
लगभग ३ वर्ष पूर्व.

(९) यह खिताब पाकर आपको कैसा महसूस हो रहा है ?
आनंदित हूँ.

(१०) क्या ब्लोगिंग से आपके अन्य आवश्यक कार्यों में अवरोध उत्पन्न नहीं होता ?

होता है. पत्रिका/पुस्तकों का मुद्रण, दिव्यनर्मदा अलंकरण अभियान, नित्य पत्र लेखन, रचना प्रेषण, मित्रों से मिलन, कार्यक्रमों में जाना अवरुद्ध है. समय सदा कम होता है कार्य अधिक. प्राथमिकता का चयन करना होता है मेरी प्राथमिकता में चिट्ठा लेखन सर्वोपरि है.

यदि होता है तो उसे कैसे प्रबंध करते है ?

कुछ पाने के लिये कुछ खोना ही पड़ता है. घरेलू कार्य श्रीमती जी सम्हाल लेती हैं. शेष अनिवार्य होने पर कम से कम करता हूँ शेष समय हिंदी और चिट्ठाकारी को. हिंदी माँ की सेवा के लिये शेष सब सहर्ष छोड़ा जा सकता है.

(११)ब्लोगोत्सव जैसे सार्वजनिक उत्सव में शामिल होकर आपको कैसा लगा ?

दुर्भाग्य से अवकाश न मिलने से सम्मिलित नहीं हो सका, अधम चाकरी की माया. स्थानीय व् अन्यत्र चिट्ठाकारों के कार्यक्रमों में गया हूँ और आनंद भी मिला है.

(१२) आपकी नज़रों में ब्लोगोत्सव की क्या विशेषताएं रही ?

अनेकता में एकता... रचनात्मकता और स्नेहपरकता.

(१३) ब्लोगोत्सव में वह कौन सी कमी थी जो आपको हमेशा खटकती रही ?

मेरी अनुपस्थिति जिसके कारण बहुतों से नहीं मिल सका, अपूरणीय क्षति हुई है मेरी.

(१४) ब्लोगोत्सव में शामिल किन रचनाकारों ने आपको ज्यादा आकर्षित किया ?

सभी की रचनाओं का प्रशंसक हूँ. संगीता पुरी, रश्मिप्रभा,

(१५) किन रचनाकारों की रचनाएँ आपको पसंद नहीं आई ?

ऐसा तो कोई भी नहीं है. हर रचना में कुछ न कुछ ग्रहणीय होता है.

(१६) क्या इस प्रकार का आयोजन प्रतिवर्ष आयोजित किया जाना चाहिए ?

नहीं. फक बार से क्या होगा? प्रति वर्ष अलग-अलग स्थानों पर कई बार.

(१७) आपको क्या ऐसा महसूस होता है कि हिंदी ब्लोगिंग में खेमेवाजी बढ़ रही है ?

जी हाँ और राजनीति भी. बरसाती नदी में सलिल के साथ कचरा भी आता ही है.

(१८)तो क्या यह हिंदी चिट्ठाकारी के लिए अमंगलकारी नहीं है ?

नहीं. बरसाती नदी में कचरा एक साथ हो ही जाता है पर नदी के प्रवाह को रोक नहीं पाता. अंततः निर्मल जल ही शेष रहता है.

(१९) आप कुछ अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताएं :

क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाये, बिन कहे भी रहा नहीं जाये की सी स्थिति है. ... पूज्य बुआ श्री (महीयसी महादेवी जी) के सानिन्ध्य में गुजरे पल मेरे जीवन की थाती हैं. स्व. कृष्ण बिहारी 'नूर' के कर कमलों से प्रथम काव्य संकलन 'लोकतंत्र का मकबरा' का लखनऊ में विमोचन, श्री नाथद्वारा में श्री नरेंद्र कोहली व् मुख्य पुजारी जी, जयपुर में राजस्थान के मुख्यमंत्री स्व. शिवचरण लाल माथुर व् राज्यपाल सर्व श्री सिंह, लखनऊ में स्व. विष्णुकांत शास्त्री, व्यंग्य सम्राट के.पी.सक्सेना, कविवर नरेश सक्सेना व् डॉ. राय महापौर, अयोध्या में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद शास्त्री, बेलगाम कर्णाटक में गोवा के राज्यपाल स्व. केदारनाथ साहनी, अहमदाबाद में डॉ. अम्बाशंकर नागर, प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र, इंदौर में चन्द्रसेन 'विराट', जबलपुर में गाँधी जी के सचिव प्रो महेश दत्त मिश्र, प्रो, ज्ञान रंजन, श्री अमृत लाल वेगड़, डॉ. छाया राय, कुलपति डॉ. जगदीश प्रसाद शुक्ल, , विधान सभा अध्यक्ष श्री ईश्वर दास रोहाणी आदि से स्नेह-सम्मान पाना जीवन की निधि है. आप जैसे मित्रों की उदारता से देश के विविध प्रान्तों में असीम स्नेह और दुलार की वर्ष हुई है.
नानाजी राय बहादुर माताप्रसाद सिन्हा 'रईस' ऑनरेरी मजिस्ट्रेट मैनपुरी गाँधीजी के आव्हान पर वैभव को ठोकर मारकर स्वतंत्रता सत्याग्रही बन गए थे. फूफाजी स्व. जगन्नाथप्रसाद वर्मा नागपुर में डॉ. हेडगेवार व् कैप्टेन मुंजे के साथ राम सेना वा शिव सेना के संस्थापक थे. ताऊ जी स्व. ज्वाला प्रसाद वर्मा घर के व्यवसाय को छोड़कर सत्याग्रही बन गए थे. इस विरासत के रहते मैं वह नहीं कर या रच पाता जो आज बहुत लोकप्रिय है. साहित्य सृजन, हिंदी प्रचार,पर्यावरण सुधार, अंध श्रृद्धा उन्मूलन, नागरिक-उपभोक्ता अधिकार संरक्षण, सामूहिक विवाह, दहेज़ निषेध, जातीय सद्भाव, पौधारोपण, कचरा निस्तारण, पर्यटन, छायांकन, जल संरक्षण आदि मुझे प्रिय हैं.
फैजाबाद में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की अज्ञातवास-स्थली देखने, ग्वालियर में जे.पी.के समक्ष आत्म समर्पण किए दस्युओं से मिलने, भोपाल में गैस कांड के ही दिन साढ़े दस हज़ार अभियंताओं की रैली का नेतृत्व करने, १९९४ में सड़क दुर्घटना में घायल होकर विकलांग होने और २००८-२००९ में माता-पिता से बिछुड़ने के पल भुलाये नहीं भूलता.

(२०) चिट्ठाकारी से संवंधित क्या कोई ऐसा संस्मरण है जिसे आप इस अवसर पर सार्वजनिक करना चाहते हैं ?

अनेक में से एक: उन दिनों चिट्ठा जगत से नया-नया ही जुड़ा था. जिन चिट्ठों को प्रकाशनार्थ रचना भेजता उनसे उपेक्षा मिलती. कुछ दिन बाद इन्हीं चिट्ठों के संचालक बार-बार रचना हेतु अनुरोध करने लगे. बिना किसी राग-द्वेष के मैं अन्यों के साथ उन्हें भी रचना भेज देता हूँ. पता नहीं उन्हें प्रारंभ में मेरे साथ किया व्यवहार याद है या नहीं पर मैंने सब कुछ याद रहते हुए भी प्रतिकार न करने का निर्णय किया है.... एक अन्य दिग्गज रचनाकार जो विदेशवासी हैं को मेरे नाम के साथ 'आचार्य' जुड़ा देखकर आपत्ति थी कि यह कब, किसने, क्यों दिया? पर वे कहते नहीं थे. प्रभु कृपा से गत मातृ-दिवस पर उनका सन्देश मिला कि माँ की स्मृति में मेरे द्वारा एक साथ रचित एक नव गीत तथा एक बाल गीत पढ़कर उन्हें अनुभूति हुई कि मैं इसका पात्र हूँ. मैं अब भी मौन हूँ और उनसे स्नेह संबंध बना ही नहीं है प्रगाढ़ भी हुआ है. अब तो विदेश में बसे कई श्रेष्ठ-ज्येष्ठ रचनाकारों (जिनसे कभी भेँट नहीं हुई) केवल चिट्ठाकरी के परिचय से अपनी सद्य प्रकाशित कृतियाँ प्रतिक्रिया या समीक्षा हेतु भेज रहे हैं. मुझ बाल बुद्धि विद्यार्थी को इतना स्नेह-सम्मान चिट्ठाकारी से मिला कि अभिभूत हूँ.

(२१) अपनी कोई पसंदीदा रचना की कुछ पंक्तियाँ सुनाएँ : (यदि आप चाहें तो यहाँ ऑडियो/विडिओ का प्रयोग भी कर सकते हैं )

अपना बिम्ब सँवारो दर्पण मत तोड़ो
कहता है प्रतिबिम्ब कि दर्पण मत तोड़ो
स्वयं सराह न पाओ मन को बुरा लगे
तो निज रूप सुधारो दर्पण अंत तोड़ो...

शीश उठाकर चलो झुकाओ शीश नहीं.
खुद से बढ़कर और दूसरा ईश नहीं.
तुम्हीं परीक्षार्थी हो तुम्हीं परीक्षक हो-
खुद को खुदा बनाओ, दर्पण मत तोड़ो...

पथ पर पग रख दो तो मंजिल पग चूमे.
चलो झूमकर दिग-दिगंत वसुधा झूमे.
आदम हो इंसान बनोगे, प्राण कर लो-
पंकिल चरण पखारो, दर्पण मत तोड़ो...

बाँटो औरों में जो भी अमृतमय हो.
गरल कंठ में धारण कर लो निर्भय हो.
वरण मौत का कर जो जीवन पाते हैं-
जीवन में 'सलिल' उतारो, दर्पण मत तोड़ो...
बहुत बहुत धन्यवाद संजीव जी .....इस अवसर पर ऋग्वेद की दो पंक्तियां आपको समर्पित है कि - ‘‘आयने ते परायणे दुर्वा रोहन्तु पुष्पिणी:। हृदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमें ।।’’अर्थात आपके मार्ग प्रशस्त हों, उस पर पुष्प हों, नये कोमल दूब हों, आपके उद्यम, आपके प्रयास सफल हों, सुखदायी हों और आपके जीवन सरोवर में मन को प्रफुल्लित करने वाले कमल खिले।
जी आपका भी धन्यवाद !
************************************
                                                                                                                आभार: लखनऊ ब्लोगेर्स असोसिअशन.

मुक्तिका: प्यार-मुहब्बत नित कीजै.. संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

प्यार-मुहब्बत नित कीजै..

संजीव 'सलिल'
*













*
अंज़ाम भले मरना ही हो हँस प्यार-मुहब्बत नित कीजै..

रस-निधि पाकर रस-लीन हुए, रस-खान बने जी भर भीजै.


जो गिरता वह ही उठता है, जो गिरे न उठना क्या जाने?

उठकर औरों को उठा, न उठने को कोई कन्धा लीजै..


हो वफ़ा दफा दो दिन में तो भी इसमें कोई हर्ज़ नहीं

यादों का खोल दरीचा, जीवन भर न याद का घट छीजै..


दिल दिलवर या कि ज़माना ही, खुश या नाराज़ हो फ़िक्र न कर.

खुश रह तू अपनी दुनिया में, इस तरह कि जग तुझ पर रीझै..


कब आया कोई संग, गया कब साथ- न यह मीजान लगा.

जितने पल जिसका संग मिला, जी भर खुशियाँ दे-ले जीजै..


अमृत या ज़हर कहो कुछ भी पीनेवाले पी जायेंगे.

आनंद मिले पी बार-बार, ऐसे-इतना पी- मत खीजै..


नित रास रचा- दे धूम मचा, ब्रज से यूं.एस. ए.-यूं. के. तक.

हो खलिश न दिल में तनिक 'सलिल' मधुशाला में छककर पीजै..

***********************************************

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

गीत... प्रतिभा खुद में वन्दनीय है... संजीव 'सलिल'

गीत...
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है...
संजीव 'सलिल'
*
   




 




   *
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है...
*
प्रतिभा मेघा दीप्ति उजाला
शुभ या अशुभ नहीं होता है.
वैसा फल पाता है साधक-
जैसा बीज रहा बोता है.

शिव को भजते राम और
रावण दोनों पर भाव भिन्न है.
एक शिविर में नव जीवन है
दूजे का अस्तित्व छिन्न है.

शिवता हो या भाव-भक्ति हो
सबको अब तक प्रार्थनीय है.
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है.....
*
अन्न एक ही खाकर पलते
सुर नर असुर संत पशु-पक्षी.
कोई अशुभ का वाहक होता
नहीं किसी सा है शुभ-पक्षी.

हो अखंड या खंड किन्तु
राकेश तिमिर को हरता ही है.
पूनम और अमावस दोनों
संगिनीयों को वरता भी है
 
भू की उर्वरता-वत्सलता
'सलिल' सभी को अर्चनीय है.
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है.
*

    कौन पुरातन और नया क्या?
    क्या लाये थे?, साथ गया क्या?
    राग-विराग सभी के अन्दर-
    क्या बेशर्मी और हया क्या?

    अतिभोगी ना अतिवैरागी.
    सदा जले अंतर में आगी.
    नाश और निर्माण संग हो-
    बने विरागी ही अनुरागी.

    प्रभु-अर्पित निष्काम भाव से
    'सलिल'-साधना साधनीय है.
    प्रतिभा खुद में वन्दनीय है.
    *

.
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

गीत: हिन्दी ममतामय मैया है... संजीव 'सलिल'

गीत:

हिन्दी ममतामय मैया है...


संजीव 'सलिल'

*



















*
हिंदी ममतामय मैया है
मत इससे खिलवाड़ करो...
*
सूर कबीर रहीम देव
तुलसी
से बेटों की मैया.
खुसरो बरदाई मीरां
जगनिक
खेले इसकी कैंया.

घाघ भड्डरी ईसुरी गिरिधर
जगन्नाथ भूषण
मतिमान.
विश्वनाथ श्री क्षेमचंद्र
जयदेव वृन्द
लय-रस की खान.

जायसी रायप्रवीण बिहारी
सेनापति
बन लाड़ करो.
हिंदी ममतामय मैया है
मत इससे खिलवाड़ करो...
*
बिम्ब प्रतीक व्याकरण पिंगल
क्षर-अक्षर रसलीन रहो.
कर्ताकारक कर्म क्रिया उपयुक्त
न रख क्यों दीन रहो?

रसनिधि
शब्द-शब्द चुनकर
बुनकर अभिनव ताना-बाना.
बन जाओ रसखान काव्य की 
गगरी निश-दिन छलकाना.

तत्सम-तद्भव लगे डिठौना

किन्तु न तिल को ताड़ करो.
हिंदी ममतामय मैया है
मत इससे खिलवाड़ करो...
*

जिस ध्वनि का जैसा उच्चारण

वैसा लिखना हिन्दी है.
जैसा लिखना वैसा पढ़ना
वही समझना हिंदी है.

मौन न रहता कोई अक्षर,

गिरता कोई हर्फ़ नहीं.
एक वर्ण के दो उच्चारण
दो उच्चारो- वर्ण नहीं.

करो 'सलिल' पौधों का रोपण,

अब मत रोपा झाड़ करो.
हिंदी ममतामय मैया है
मत इससे खिलवाड़ करो...

अभिनव प्रयोग दोहा-हाइकु गीत समस्या पूर्ति: प्रतिभाओं की कमी नहीं... संजीव 'सलिल'

अभिनव प्रयोग / समस्या पूर्ति:

दोहा-हाइकु गीत

प्रतिभाओं की कमी नहीं...

संजीव 'सलिल'
*

*
प्रतिभाओं की
कमी नहीं किंचित,
विपदाओं की....
*
         धूप-छाँव का खेल है
         खेल सके तो खेल.
         हँसना-रोना-विवशता
         मन बेमन से झेल.

         दीपक जले उजास हित,
         नीचे हो अंधेर.
         ऊपरवाले को 'सलिल' 
         हाथ जोड़कर टेर.

         उसके बिन तेरा नहीं
         कोई कहीं अस्तित्व.
         तेरे बिन उसका कहाँ
         किंचित बोल प्रभुत्व?

क्षमताओं की
कमी नहीं किंचित
समताओं की.
प्रतिभाओं की
कमी नहीं किंचित,
विपदाओं की....
*
       पेट दिया दाना नहीं.
       कैसा तू नादान?
       'आ, मुझ सँग अब माँग ले-
        भिक्षा तू भगवान'.

        मुट्ठी भर तंदुल दिए,
        भूखा सोया रात.
        लड्डूवालों को मिली-
        सत्ता की सौगात.

       मत कहना मतदान कर,
       ओ रे माखनचोर.
       शीश हमारे कुछ नहीं.
       तेरे सिर पर मोर.

उपमाओं की
कमी नहीं किंचित
रचनाओं की.
प्रतिभाओं की
कमी नहीं किंचित,
विपदाओं की....
*
http://divyanarmada.blogspot.com

बुधवार, 28 जुलाई 2010

" हाइकु " ---कुसुम ठाकुर

" हाइकु " 
कुसुम ठाकुर 
*
 
 
 
*
सुख औ दुःख 
जीवन के दो पाट 
तो गम कैसा 

चलते रहो 
हौसला ना हो कम 
दुरियाँ क्या है 

लक्ष्य जो करो 
ज्यों ध्यान तुम धरो 
मिलता फल 

हार ना मानो 
ज्यों सतत प्रयास 
मंजिल पाओ 

कर्म ही पूजा 
उस सम ना दूजा 
कहो उल्लास 

ध्यान धरो 
बस मौन ही रहो 
पाओ उल्लास 

- कुसुम ठाकुर -

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

दोहां सलिला: संजीव 'सलिल'

दोहां सलिला:
संजीव 'सलिल'
*
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*
गृह मंदिर में, कर सकें, प्रभु को प्रति पल याद.
सुख-समृद्धि-यश पा अमित, सदा रहें आबाद.

कल का कल पर छूटता, आज न होता काज.
अभी करे जो हो वही, यही काज का राज..

बिन सोचे लिख डालिए, जो मन हो तत्काल.
देव कलम के स्वयं ही, लेते कथ्य सम्हाल..

कौन लिखाना चाहता, जान सका है कौन?
कौन लिख रहा जानकर, 'सलिल' हो रहा मौन..

मल में रह निर्मल रहे, शतदल कमल न भूल.
नित मल-मलकर नहाती, स्वच्छ न होती धूल..

हँसी कुमुदिनी या धरा पर उतरा रजनीश.
सरवर में पंकज खिला, या विहँसे पृथ्वीश..


Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

मुक्तिका: जब दिल में अँधेरा हो... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

जब दिल में अँधेरा हो...

संजीव  'सलिल'
*













*

जब दिल में अँधेरा हो, क्या होगा मशालों से
मिलते हों गले काँटे, जब पाँव के छालों से?

चाबी की करे चिंता, कोई क्यों बताओ तो?
हों हाथ मिलाये जब, चोरों ने ही तालों से..

कुर्सी पे मैं बैठूँगा, बीबी को बिठाऊँगा.
फिर राज चलाऊँगा, साली से औ' सालों से..
 
इतिहास भी लिक्खेगा, 'मुझसा नहीं दूजा है,
है काबलियत मेरी, घपलों में-घुटालों में..

सडकों पे तुम्हें गड्ढे, दिखते तो दोष किसका?
चिकनी मुझे लगती हैं, हेमा जी के गालों से..

नंगों की तुम्हें चिंता, मुझको है फ़िक्र खुद की.
लज्जा को ढाँक दूँगा, बातों के दुशालों से..

क्यों तुमको खलिश होती, है कल की कहो चिंता.
सौदा है 'सलिल' का जब सूरज से उजालों से..

**********************************************

गीत : राह देखती माँ की गोदी... संजीव 'सलिल' *


गीत :
राह देखती माँ की गोदी...
संजीव 'सलिल'
*
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*
राह देखती माँ की गोदी
लाड़ो बिटिया आ जाओ.
प्यासी ममता हेर रही है-
कुछ तो प्यास बुझा जाओ....
*
नटखट-चंचल भोलापन
तेरा जीवन की थाती है.
दीप यहाँ मैं दूर कहीं तू-
लेकिन मेरी बाती है. 

दीपक-बाती साथ रहें कुछ पल
तो तम् मिट जायेगा.
अगरु-धूप सा स्मृतियों का
धूम्र सुरभि फैलाएगा.

बहुत हुआ अब मत तरसाओ
घर-अँगना में छा जाओ.
प्यासी ममता हेर रही है-
कुछ तो प्यास बुझा जाओ....
*
परस पुलक से भर देगा
जब तू कैयां में आयेगी.
बीत गयीं जो घड़ियाँ उनकी
फिर-फिर याद दिलायेगी.

सखी-सहेली, कौन कहाँ है?
किसने क्या खोया-पाया?
कौन कष्ट में भी हँसता है?
कौन सुखों में भरमाया?

पुरवाई-पछुआ से मिलकर
खिले जुन्हाई आ जाओ.
प्यासी ममता हेर रही है-
कुछ तो प्यास बुझा जाओ....

सोमवार, 26 जुलाई 2010

चिंतन और आकलन: हम और हमारी हिन्दी संजीव सलिल'

चिंतन और आकलन:                                              

हम और हमारी हिन्दी

संजीव सलिल'
*
*
हिंदी अब भारत मात्र की भाषा नहीं है... नेताओं की बेईमानी के बाद भी प्रभु की कृपा से हिंदी विश्व भाषा है. हिंदी के महत्त्व को न स्वीकारना ऐसा ही है जैसे कोई आँख बंद कर सूर्य के महत्त्व को न माने. अनेक तमिलभाषी हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार हैं. तमिलनाडु के विश्वविद्यालयों में हिन्दी में प्रति वर्ष सैंकड़ों छात्र एम्.ए. और अनेक पीएच. डी. कर रहे हैं. मेरे पुस्तक संग्रह में अनेक पुस्तकें हैं जो तमिलभाषियों ने हिन्दी साहित्यकारों पर लिखी हैं. हिन्दी भाषी प्रदेश में आकर लाखों तमिलभाषी हिन्दी बोलते, पढ़ते-लिखते हैं.
अन्य दक्षिणी प्रान्तों में भी ऐसी ही स्थिति है.



मुझे यह बताएँ लाखों हिन्दी भाषी दक्षिणी प्रांतों में नौकरी और व्यवसाय कर रहे हैं, बरसों से रह रहे हैं. उनमें से कितने किसी दक्षिणी भाषा का उपयोग करते हैं. दुःख है कि १% भी नहीं. त्रिभाषा सूत्र के अनुसार हर भारतीय को रह्स्त्र भाषा हिंदी, संपर्क भाषा अंगरेजी तथा एक अन्य भाषा सीखनी थी. अगर हम हिंदीभाषियों ने दक्षिण की एक भाषा सीखी होती तो न केवल हमारा ज्ञान, आजीविका अवसर, लेखन क्षेत्र बढ़ता अपितु राष्ट्र्री एकता बढ़ती. भाषिक ज्ञान के नाम पर हम शून्यवत हैं. दक्षिणभाषी अपनी मातृभाषा, राष्ट्र भाषा, अंगरेजी, संस्कृत तथा पड़ोसी राज्यों की भाषा इस तरह ४-५ भाषाओँ में बात और काम कर पाते हैं. कमी हममें हैं और हम ही उन पर आरोप लगाते हैं. मुझे शर्म आती है कि मैं दक्षिण की किसी भाषा में कुछ नहीं लिख पाता, जबकि हिन्दी मेरी माँ है तो वे मौसियाँ तो हैं.

यदि अपनी समस्त शिक्षा हिन्दी मध्यम से होने के बाद भी मैं शुद्ध हिन्दी नहीं लिख-बोल पाता, अगर मैं हिन्दी के व्याकरण-पिंगल को पूरी तरह नहीं जानता तो दोष तो मेरा ही है. मेरी अंगरेजी में महारत नहीं है जबकि मैंने इंजीनियरिंग में ८ साल अंगरेजी मध्यम से पढ़ा है. मैंने शालेय शिक्षा में संस्कृत पढी पर एक वाक्य भी संकृत में बोल-लिख-समझ नहीं सकता, मुझे बुन्देली भी नहीं आती, पड़ोसी राज्यों की छतीसगढ़ी, भोजपुरी, अवधी, मागधी, बृज, भोजपुरी से भी मैं अनजान हूँ... मैं स्वतंत्र भारत में पैदा हुई तीन पीढ़ियों से जुड़ा हूँ देखता हूँ कि वे भी मेरी तरह भाषिक विपन्नता के शिकार हैं. कोई भी किसी भाषा पर अधिकार नहीं रखता... क्यों?

मेंरे कुछ मित्र चिकित्सा के उच्च अध्ययन हेतु रूस गए... वहाँ पहले तीन माह रूसी भाषा का अध्ययन कर प्रमाणपत्र परीक्षा उत्तीर्ण की तब रूसी भाषा की किताबों के माध्यम से विषय पढ़ा. कोई समस्या नहीं हुई.. विश्व के विविध क्षेत्रों से लाखों छात्र इसी तरह, रूस, जापान आदि देशों में जाकर पढ़ते हैं. भारत में हिन्दी भाषी ही हिन्दी में दक्ष नहीं हैं तो तकनीकी किताबें कब हिन्दी में आयेंगी?, विदेशों से भारत में आकर पढनेवाले छात्र को हिन्दी कौन और कब सिखाएगा? हम तो शिशुओं को कन्वेंतों में अंगरेजी के रैम रटवाएं, मेहमानों के सामने बच्चे से गवाकर गर्व अनुभव करें, फिर हर विषय में ट्यूशन लगवाकर प्रवीणता दिलाएं हिंदी को छोड़कर... यह हिंदी-द्रोह नहीं है क्या? आप अपनी, मेरी या किसी भी छात्र की अंक सूची देखें... कितने हैं जिन्हें हिन्दी में प्रवीणता के अंक ८०% या अधिक मिले? हम विषयवार कितने घंटे किस विषय को पढ़ते हैं? सबसे कम समय हिंदी को देते हैं. इसलिए हमें हिन्दी ठीक से नहीं आती. हम खिचडी भाषा बोलते-लिखते हैं जिसे अब 'हिंगलिश' कह रहे हैं.

दोष हिन्दी भाषी नेताओं की दूषित मानसिकता का है जो न तो खुद भाषा के विद्वान थे, न उन्होंने भाषा के विद्वान् बनने दिये. त्रिभाषा सूत्र की असफलता का कारण केवल हिन्दीभाषी नेता हैं. भारत की भाषिक एकता और अपने व्यक्तिगत लाभ (लेखन क्षेत्र, अध्ययन क्षेत्र, आजीविका क्षेत्र, व्यापार क्षेत्र के विस्तार) के लिये भी हमें दक्षिणी भाषाएँ सीखना ही चाहिए. संगीत, आयुर्वेद, ज्योतिष, तेल चिकित्सा आदि के अनेक ग्रन्थ केवल दक्षिणी भाषाओँ में हैं. हम उन भाषाओँ को सीखकर उन ग्रंथों को हिन्दी में अनुवादित करें.

आशा की किरण:

अन्तरिक्षीय प्रगति के कारण आकाश गंगा के अन्य सौर मंडलों में सभ्यताओं की सम्भावना और उनसे संपर्क के लिये विश्व की समस्त भाषाओँ का वैज्ञानिक परीक्षण किया गया है. ध्वनि विज्ञानं के नियमों के अनुसार कहे को लिखने, लिखे को पढने, पढ़े को समझने और विद्युत तरंगों में परिवर्तित-प्रति परिवर्तित होने की क्षमता की दृष्टि से संस्कृत प्रथम, हिन्दी द्वितीय तथा शेष भाषाएँ इनसे कम सक्षम पाई गयीं. अतः इन दो भाषाओँ के साथ अंतरिक्ष वा अन्य विज्ञानों में शोध कार्य समपन्न भाषों यथा अंगरेजी, रूसी आदि में पृथ्वीवासियों का संदेश उन सभ्यताओं के लिये भेजा गया है. हिन्दी की संस्कृत आधारित उच्चारणपद्धति,शब्द-संयोजन और शब्द-निर्माण की सार्थक प्रणाली जिसके कारण हिन्दी विश्व के लिये अपरिहार्य बन गयी है, कितने हिंदी भाषी जानते हैं?

समय की चुनौती सामने है. हमने खुद को नहीं बदला तो भविष्य में हमारी भावी पीढियां हिंदी सीखने विदेश जायेंगी. आज विश्व का हर देश अपनी उच्च शिक्षा में हिन्दी की कक्षाएं, पाठ्यक्रम और शोध कार्य का बढ़ता जा रहा है और हम बच्चों को हिन्दी से दूरकर अंगरेजी में पढ़ा रहे हैं. दोषी कौन? दोष किसका और कितना?,

अमरीका के राष्ट्रपति एकाधिक बार सार्वजनिक रूप से अमरीकियों को चेता चुके हैं कि हिन्दी के बिना भविष्य उज्जवल नहीं है. अमरीकी हिन्दी सीखें. हमर अधिकारी और नेता अभी भी मानसिक रूप से अंग्रेजों के गुलाम हैं. उनके लिये हिंदी गुलाम भारतीयों की और अंगरेजी उनके स्वामियों की भाषा है... इसलिए भारतीयों के शशक या नायक बनने के लिये वे हिन्दी से दूर और अंगरेजी के निकट होने प्रयास करते हैं. अंग्रेजों के पहले मुगल शासक थे जिनकी भाषा उर्दू थी इसलिए उर्दू का व्याकरण, छंद शास्त्र और काव्य शास्त्र न जानने के बाद भी हम उर्दू काव्य विधाओं में लिखते हैं जिन्हें उर्दू के विद्वान कचरे के अलावा कुछ नहीं मानते.

कभी नहीं से देर भली... जब जागें तभी सवेरा... हिन्दी और उसकी सहभाषाओं पर गर्व करें... उन्हें सीखें... उनमें लिखें और अन्य भाषाओँ को सीखकर उनका श्रेष्ठ साहित्य हिन्दी में अनुवादित करें. हिन्दी किसी की प्रतिस्पर्धी नहीं है... हिन्दी का अस्तित्व संकट में नहीं है... जो अन्य भाषाएँ-बोलियाँ हिन्दी से समन्वित होंगी उनका साहित्य हिन्दी साहित्य के साथ सुरक्षित होगा अन्यथा समय के प्रवाह में विलुप्त हो जायगा.

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रविवार, 25 जुलाई 2010

उपयोगी दूरभाष : विजय कौशल.

एयरलाइंस
भारतीय - एयरलाइंस 1800 180 1407
जेट - एयरवेज 1800 22 5522
- स्पाइसजेट 1800 180 3333
हवा - भारत 1800 22 7722
- किंगफिशर 1800 180 0101

बैंकों

एबीएन - एमरो 1800 11 2224
केनरा बैंक - 1800 44 6000
- सिटीबैंक 1800 44 2265
Corporatin बैंक - 1800 443 555
डेवलपमेंट क्रेडिट बैंक - 1800 22 5769
एचडीएफसी बैंक - 1800 227 227
आईसीआईसीआई बैंक - 1800 333 499
आईसीआईसीआई बैंक - एनआरआई 1800 22 4848
आईडीबीआई बैंक - 1800 11 6999
भारतीय बैंक - 1800 425 1400
आईएनजी - वैश्य 1800 44 9900
कोटक महिंद्रा बैंक - 1800 22 6022
भगवान कृष्ण बैंक - 1800 11 2300
पंजाब नेशनल बैंक - 1800 122 222
भारत के राज्य बैंक - 1800 44 1955
सिंडिकेट बैंक - 1800 44 6655
 
 

ऑटोमोबाइल
महिंद्रा - वृश्चिक 1800 22 6006
- मारुति 1800 111 515
टाटा - मोटर्स 1800 22 5552
विंडशील्ड - विशेषज्ञों 1800 11 3636


कंप्यूटर आईटी /

- Adrenalin 1800 444 445
- AMD 1800 425 6664
एप्पल कंप्यूटर - 1800 444 683
- कैनन 1800 333 366
सिस्को सिस्टम - 1800 221 777
- कॉम्पैक हिमाचल प्रदेश - 1800 444 999
डेटा एक - ब्रोड्बैंड 1800 424 1800
- Dell 1800 444 026
- Epson 1800 44 0011
- ESys 3970 0011
उत्पत्ति टैली अकादमी - 1800 444 888
- एचसीएल 1800 180 8080
- आईबीएम 1800 443 333
- Lexmark 1800 22 4477
मार्शल है - प्वाइंट 1800 33 4488
- Microsoft 1800 111 100
माइक्रोसॉफ्ट वायरस अपडेट - 1901 333 334
- Seagate 1800 180 1104
- Symantec 1800 44 5533
टीवीएस - इलैक्ट्रॉनिक्स 1800 444 566
WEP - Peripherals 1800 44 6446
- विप्रो 1800 333 312
- ज़ीरक्सा 1800 180 1225
- शीर्षबिंदु 1800 222 004  
 
 

भारतीय रेलवे के जनरल पूछताछ 131
भारतीय रेल केंद्रीय 131 पूछताछ
भारतीय रेलवे आरक्षण 131
भारतीय रेल रेलवे आरक्षण पूछताछ 1345,1335,1330
भारतीय रेल केंद्रीकृत रेलवे 5/6/7/8/9 1330/1/2/3/4 / पूछताछ

 
कोरियर / पैकर्स एंड मूवर्स
ABT - कूरियर 1800 44 8585
AFL - Wizz 1800 22 9696
अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स - 1800 11 4321
एसोसिएटेड Packers लिमिटेड - पी 1800 21 4560
- डीएचएल 1800 111 345
- FedEx 1800 22 6161
गोयल Packers और मूवर्स - 1800 11 3456
- अप 1800 22 7171
 
घरेलू उपकरणों

सोनी / Aiwa - 1800 11 1188
एंकर - 1800 22 7979 स्विच
ब्लू - स्टार 1800 22 2200
ऑडियो बोस - 1800 11 2673
Bru कॉफी वेंडिंग मशीनों - 1800 44 7171
Daikin एयर - कंडीशनर 1800 444 222
- DishTV 1800 12 3474
फैबर - Chimneys 1800 21 4595
- गोदरेज 1800 22 5511
Grundfos - पंप्स 1800 33 4555
एलजी - 1901 180 9999
- फिलिप्स 1800 22 4422
- सैमसंग 1800 113 444
- Sanyo 1800 11 0101
- वोल्टास 1800 33 4546
WorldSpace सैटेलाइट रेडियो - 1800 44 5432

निवेश वित्त /

- CAMS 1800 44 2267
चोला म्युचुअल फंड - 1800 22 2300
आसान है आईपीओ 5757 - 3030
निष्ठा - निवेश 1800 180 8000
फ्रेंकलिन टेम्पलटन फंड - 1800 425 4255
जेएम मॉर्गन - स्टेनली 1800 22 0004
कोटक म्युचुअल फंड - 1800 222 626
एलआईसी हाउसिंग - वित्त 1800 44 0005
एसबीआई म्युचुअल फंड - 1800 22 3040
- शेयरखान 1800 22 7500
टाटा मुचुअल फंड - 1800 22 0101

यात्रा

क्लब महिंद्रा छुट्टियाँ - 1800 33 4539
कॉक्स एंड किंग्स - 1800 22 1235
भगवान टी वी - यात्रा 1800 442 777
केरल - पर्यटन 1800 444 747
कुमारकोम लेक Resort - 1800 44 5030
राज ट्रैवल्स और यात्रा - 1800 22 9900
सीता - Tours 1800 111 911
एसओटीसी - Tours 1800 22 3344



हेल्थकेयर
स्वास्थ्य पर सर्वश्रेष्ठ - 1800 11 8899
डॉ. - Batras 1800 11 6767
- ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन 1800 22 8797
जॉनसन एंड जॉनसन - 1800 22 8111
काया स्किन - क्लिनिक 1800 22 5292
- LifeCell 1800 44 5323
Manmar प्रौद्योगिकियों - 1800 33 4420
- फाइजर 1800 442 442
Roche Accu - Chek 1800 11 45 46
- रूद्राक्ष 1800 21 4708
Varilux - लेंस 1800 44 8383
- वीएलसीसी 1800 33 1262


बीमा
एएमपी - SanMar 1800 44 2200
- अवीवा 1800 33 2244
बजाज - एलियांज 1800 22 5858
चोल एमएस जनरल इंश्योरेंस - 1800 44 5544
एचडीएफसी स्टैंडर्ड जीवन - 1800 227 227
- एलआईसी 1800 33 4433
मैक्स न्यूयॉर्क जीवन - 1800 33 5577
रॉयल - सुंदरम 1800 33 8899
एसबीआई जीवन बीमा - 1800 22 9090


होटल आरक्षण
ग्रांड grt - 1800 44 5500
इंटरकांटिनेंटल होटल समूह - 1800 111 000
- मैरियट 1800 22 0044
सरोवर पार्क - प्लाजा 1800 111 222
ताज छुट्टियाँ - 1800 111 825


Teleshoppin
एशियन स्काई - शॉप 1800 22 1800
Jaipan - Teleshoppe 1800 11 5225
टेली - ब्रांड 1800 11 8000
Teleshopping VMI - 1800 447 777
Teleshopping WWS - 1800 220 777


दूसरों
डॉमिनो है पिज़्ज़ा - 1800 111 123

सेल फ़ोन
- BenQ 1800 22 08 08
पक्षी - सेलफोन 1800 11 7700
मोटोरोला - MotoAssist 1800 11 1211
- नोकिया 3030 3838
सोनी एरिक्सन - 3901 1111
विंग कमांडर प्रवीण अरोड़ा बीकॉम. (एच), एमबीए, AICWA, ACS, पी जी, DBF
भारतीय वायु सेना

ईमेल: pk_arora@yahoo.com
: भीड़ + 91 9035455787

दो लघुकथाएं: १. गाँधी और गाँधीवाद २. निपूती भली थी आचार्य संजीव ‘सलिल’

आचार्य संजीव ‘सलिल’ की दो लघुकथाएं



१. गाँधी और गाँधीवाद
* बापू आम आदमी के प्रतिनिधि थे. जब तक हर भारतीय को कपड़ा न मिले, तब तक कपड़े न पहनने का संकल्प उनकी महानता का जीवत उदाहरण है. वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं’ -नेताजी भाषण फटकारकर मंच से उतरकर अपनी मंहगी आयातित कार में बैठने लगे तो पत्रकारों ने उनसे कथनी-करनी में अन्तर का कारण पूछा.

नेताजी बोले– ‘बापू पराधीन भारत के नेता थे. उनका अधनंगापन पराये शासन में देश की दुर्दशा दर्शाता था, हम स्वतंत्र भारत के नेता हैं. अपने देश के जीवनस्तर की समृद्धि तथा सरकार की सफलता दिखाने के लिए हमें यह ऐश्वर्य भरा जीवन जीना होता है. हमारी कोशिश तो यह है की हर जनप्रतिनिधि को अधिक से अधिक सुविधाएं दी जायें.’

‘ चाहे जन प्रतिनिधियों की सुविधाएं जुटाने में देश के जनगण क दीवाला निकल जाए. अभावों की आग में देश का जन सामान्य जलाता रहे मगर नेता नीरो की तरह बांसुरी बजाते ही रहेंगे- वह भी गाँधी जैसे आदर्श नेता की आड़ में.’ – एक युवा पत्रकार बोल पड़ा.

अगले दिन से उसे सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो गया.

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२. निपूती भली थी 
 *
बापू के निर्वाण दिवस पर देश के नेताओं, चमचों एवं अधिकारियों ने उनके आदर्शों का अनुकरण करने की शपथ ली. अख़बारों और दूरदर्शनी चैनलों ने इसे प्रमुखता से प्रचारित किया.

अगले दिन एक तिहाई अर्थात नेताओं और चमचों ने अपनी आंखों पर हाथ रख कर कर्तव्य की इति श्री कर ली. उसके बाद दूसरे तिहाई अर्थात अधिकारियों ने कानों पर हाथ रख लिए, तीसरे दिन शेष तिहाई अर्थात पत्रकारों ने मुंह पर हाथ रखे तो भारत माता प्रसन्न हुई कि देर से ही सही इन्हे सदबुद्धि तो आयी.

उत्सुकतावश भारत माता ने नेताओं के नयनों पर से हाथ हटाया तो देखा वे आँखें मूंदे जनगण के दुःख-दर्दों से दूर सत्ता और सम्पत्ति जुटाने में लीन थे.

दुखी होकर भारत माता ने दूसरे बेटे अर्थात अधिकारियों के कानों पर रखे हाथों को हटाया तो देखा वे आम आदमी की पीड़ाओं की अनसुनी कर पद के मद में मनमानी कर रहे थे. नाराज भारत माता ने तीसरे पुत्र अर्थात पत्रकारों के मुंह पर रखे हाथ हटाये तो देखा नेताओं और अधिकारियों से मिले विज्ञापनों से उसका मुंह बंद था और वह दोनों की मिथ्या महिमा गा कर ख़ुद को धन्य मान रहा था.

अपनी सामान्य संतानों के प्रति तीनों की लापरवाही से क्षुब्ध भारत माता के मुँह से निकला- ‘ऐसे पूतों से तो मैं निपूती ही भली थी.

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चित्रगुप्त महिमा - आचार्य संजीव 'सलिल'

चित्रगुप्त महिमा - आचार्य संजीव 'सलिल'



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चित्र-चित्र में गुप्त जो, उसको विनत प्रणाम।
वह कण-कण में रम रहा, तृण-तृण उसका धाम ।


विधि-हरि-हर उसने रचे, देकर शक्ति अनंत।
वह अनादि-ओंकार है, ध्याते उसको संत।


कल-कल,छन-छन में वही, बसता अनहद नाद।
कोई न उसके पूर्व है, कोई न उसके बाद।


वही रमा गुंजार में, वही थाप, वह नाद।
निराकार साकार वह, नेह नर्मदा नाद।


'सलिल' साधना का वही, सिर्फ़ सहारा एक।
उस पर ही करता कृपा, काम करे जो नेक।


जो काया को मानते, परमब्रम्ह का अंश।
'सलिल' वही कायस्थ हैं, ब्रम्ह-अंश-अवतंश।


निराकार परब्रम्ह का, कोई नहीं है चित्र।
चित्र गुप्त पर मूर्ति हम, गढ़ते रीति विचित्र।


निराकार ने ही सृजे, हैं सारे आकार।
सभी मूर्तियाँ उसी की, भेद करे संसार।


'कायथ' सच को जानता, सब को पूजे नित्य।
भली-भाँति उसको विदित, है असत्य भी सत्य।


अक्षर को नित पूजता, रखे कलम भी साथ।
लड़ता है अज्ञान से, झुका ज्ञान को माथ।


जाति वर्ण भाषा जगह, धंधा लिंग विचार।
भेद-भाव तज सभी हैं, कायथ को स्वीकार।


भोजन में जल के सदृश, 'कायथ' रहता लुप्त।
सुप्त न होता किन्तु वह, चित्र रखे निज गुप्त।


चित्र गुप्त रखना 'सलिल', मन्त्र न जाना भूल।
नित अक्षर-आराधना, है कायथ का मूल।


मोह-द्वेष से दूर रह, काम करे निष्काम।
चित्र गुप्त को समर्पित, काम स्वयं बेनाम।


सकल सृष्टि कायस्थ है, सत्य न जाना भूल।
परमब्रम्ह ही हैं 'सलिल', सकल सृष्टि के मूल।


अंतर में अंतर न हो, सबसे हो एकात्म।
जो जीवन को जी सके, वह 'कायथ' विश्वात्म।
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गुरु पूर्णिमा पर : दोहे गुरु वंदना के... संजीव 'सलिल'

गुरु पूर्णिमा पर :

दोहे गुरु वंदना के...

संजीव 'सलिल'
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गुरु को नित वंदन करो, हर पल है गुरूवार.
गुरु ही देता शिष्य को, निज आचार-विचार..
*
विधि-हरि-हर, परब्रम्ह भी, गुरु-सम्मुख लघुकाय.
अगम अमित है गुरु कृपा, कोई नहीं पर्याय..
*
गुरु है गंगा ज्ञान की, करे पाप का नाश.
ब्रम्हा-विष्णु-महेश सम, काटे भाव का पाश..
*
गुरु भास्कर अज्ञान तम्, ज्ञान सुमंगल भोर.
शिष्य पखेरू कर्म कर, गहे सफलता कोर..
*
गुरु-चरणों में बैठकर, गुर जीवन के जान.
ज्ञान गहे एकाग्र मन, चंचल चित अज्ञान..
*
गुरुता जिसमें वह गुरु, शत-शत नम्र प्रणाम.
कंकर से शंकर गढ़े, कर्म करे निष्काम..
*
गुरु पल में ले शिष्य के, गुण-अवगुण पहचान.
दोष मिटा कर बना दे, आदम से इंसान..
*
गुरु-चरणों में स्वर्ग है, गुरु-सेवा में मुक्ति.
भव सागर-उद्धार की, गुरु-पूजन ही युक्ति..
*
माटी शिष्य कुम्हार गुरु, करे न कुछ संकोच.
कूटे-साने रात-दिन, तब पैदा हो लोच..
*
कथनी-करनी एक हो, गुरु उसको ही मान.
चिन्तन चरखा पठन रुई, सूत आचरण जान..
*
शिष्यों के गुरु एक है, गुरु को शिष्य अनेक.
भक्तों को हरि एक ज्यों, हरि को भक्त अनेक..
*
गुरु तो गिरिवर उच्च हो, शिष्य 'सलिल' सम दीन.
गुरु-पद-रज बिन विकल हो, जैसे जल बिन मीन..
*
ज्ञान-ज्योति गुरु दीप ही, तम् का करे विनाश.
लगन-परिश्रम दीप-घृत, श्रृद्धा प्रखर प्रकाश..
*
गुरु दुनिया में कम मिलें, मिलते गुरु-घंटाल.
पाठ पढ़ाकर त्याग का, स्वयं उड़ाते माल..
*
गुरु-गरिमा-गायन करे, पाप-ताप का नाश.
गुरु-अनुकम्पा काटती, महाकाल का पाश..
*
विश्वामित्र-वशिष्ठ बिन, शिष्य न होता राम.
गुरु गुण दे, अवगुण हरे, अनथक आठों याम..
*
गुरु खुद गुड़ रह शिष्य को, शक्कर सदृश निखार.
माटी से मूरत गढ़े, पूजे सब संसार..
*
गुरु की महिमा है अगम, गाकर तरता शिष्य.
गुरु कल का अनुमान कर, गढ़ता आज भविष्य..
*
मुँह देखी कहता नहीं, गुरु बतलाता दोष.
कमियाँ दूर किये बिना, गुरु न करे संतोष..
*
शिष्य बिना गुरु अधूरा, गुरु बिन शिष्य अपूर्ण.
सिन्धु-बिंदु, रवि-किरण सम, गुरु गिरि चेला चूर्ण..
*
गुरु अनुकम्पा नर्मदा,रुके न नेह-निनाद.
अविचल श्रृद्धा रहे तो, भंग न हो संवाद..
*
गुरु की जय-जयकार कर, रसना होती धन्य.
गुरु पग-रज पाकर तरें, कामी क्रोधी वन्य..
*
गुरुवर जिस पर सदय हों, उसके जागें भाग्य.
लोभ-मोह से मुक्ति पा, शिष्य वरे वैराग्य..
*
गुरु को पारस जानिए, करे लौह को स्वर्ण.
शिष्य और गुरु जगत में, केवल दो ही वर्ण..
*
संस्कार की सान पर, गुरु धरता है धार.
नीर-क्षीर सम शिष्य के, कर आचार-विचार..
*
माटी से मूरत गढ़े, सद्गुरु फूंके प्राण.
कर अपूर्ण को पूर्ण गुरु, भव से देता त्राण..
*
गुरु से भेद न मानिये, गुरु से रहें न दूर.
गुरु बिन 'सलिल' मनुष्य है, आँखें रहते सूर.
*
टीचर-प्रीचर गुरु नहीं, ना मास्टर-उस्ताद.
गुरु-पूजा ही प्रथम कर, प्रभु की पूजा बाद..
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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

शनिवार, 24 जुलाई 2010

नवगीत: हिन्दी का दुर्भाग्य है... ---संजीव 'सलिल'

नवगीत / दोहा गीत :
हिन्दी का दुर्भाग्य है...
संजीव 'सलिल'
*
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*
हिन्दी का दुर्भाग्य है,
दूषित करते लोग.....
*
कान्हा मैया खोजता,
मम्मी लगती दूर.
हनुमत कह हम पूजते-
वे मानें लंगूर.

सही-गलत का फर्क जो
झुठलाये है सूर.
सुविधा हित तोड़ें नियम-
खुद को समझ हुज़ूर.

चाह रहे जो शुद्धता,
आज मनाते सोग.
हिन्दी का दुर्भाग्य है,
दूषित करते लोग.....
*
कोई हिंगलिश बोलता,
अपना सीना तान.
अरबी के कुछ शब्द कह-
कोई दिखाता ज्ञान.

ठूँस फारसी लफ्ज़ कुछ
बना कोई विद्वान.
अवधी बृज या मैथिली-
भूल रहे नादान.

माँ को ठुकरा, सास को
हुआ पूजना रोग.
हिन्दी का दुर्भाग्य है,
दूषित करते लोग.....
*
गलत सही को कह रहे,
सही गलत को मान.
निज सुविधा ही साध्य है-
भाषा-खेल समान.

करते हैं खिलवाड़ जो,
भाषा का अपमान.
आत्मा पर आघात कर-
कहते बुरा न मान.

केर-बेर के सँग सा
घातक है दुर्योग.
हिन्दी का दुर्भाग्य है,
दूषित करते लोग.....

*******************
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

नव गीत: हम खुद को.... संजीव 'सलिल'

नव गीत:
हम खुद को....
संजीव 'सलिल'
*
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*
हम खुद को खुद ही डंसते हैं...
*
जब औरों के दोष गिनाये.
हमने अपने ऐब छिपाए.
विहँस दिया औरों को धोखा-
ठगे गए तो अश्रु बहाये.

चलते चाल चतुर कह खुद को-
बनते मूर्ख स्वयं फंसते हैं...
*
लिये सुमिरनी माला फेरें.
मन से प्रभु को कभी न टेरें.
जब-जब आपद-विपदा घेरें-
होकर विकल ईश-पथ हेरें.

मोह-वासना के दलदल में
संयम रथ पहिये फंसते हैं....
*
लगा अल्पना चौक रंगोली,
फैलाई आशा की झोली.
त्योहारों पर हँसी-ठिठोली-
करे मनौती निष्ठां भोली.

पाखंडों के शूल फूल की
क्यारी में पाये ठंसते हैं.....
*
पुरवैया को पछुआ घेरे.
दीप सूर्य पर आँख तरेरे.
तड़ित करे जब-तब चकफेरे
नभ पर छाये मेघ घनेरे.

आशा-निष्ठां का सम्बल ले
हम निर्भय पग रख हँसते हैं.....
****************
Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

नवगीत: संजीव 'सलिल' --अपना हर पल है हिन्दीमय

नवगीत:
संजीव 'सलिल'
अपना हर पल है हिन्दीमय.....
*











*
अपना हर पल
है हिन्दीमय
एक दिवस
क्या खाक मनाएँ?
बोलें-लिखें
नित्य अंग्रेजी
जो वे
एक दिवस जय गाएँ...
निज भाषा को
कहते पिछडी.
पर भाषा
उन्नत बतलाते.
घरवाली से
आँख फेरकर
देख पडोसन को
ललचाते.
ऐसों की
जमात में बोलो,
हम कैसे
शामिल हो जाएँ?...
हिंदी है
दासों की बोली,
अंग्रेजी शासक
की भाषा.
जिसकी ऐसी
गलत सोच है,
उससे क्या
पालें हम आशा?
इन जयचंदों 
की खातिर
हिंदीसुत
पृथ्वीराज बन जाएँ...
ध्वनिविज्ञान-
नियम हिंदी के
शब्द-शब्द में 
माने जाते.
कुछ लिख,
कुछ का कुछ पढने की
रीत न हम
हिंदी में पाते.
वैज्ञानिक लिपि,
उच्चारण भी
शब्द-अर्थ में
साम्य बताएँ...
अलंकार,
रस, छंद बिम्ब,
शक्तियाँ शब्द की
बिम्ब अनूठे.
नहीं किसी
भाषा में  मिलते,
दावे करलें
चाहे झूठे.
देश-विदेशों में
हिन्दीभाषी
दिन-प्रतिदिन
बढ़ते जाएँ...
अन्तरिक्ष में
संप्रेषण की
भाषा हिंदी
सबसे उत्तम.
सूक्ष्म और
विस्तृत वर्णन में
हिंदी है
सर्वाधिक
सक्षम.
हिंदी भावी
जग-वाणी है
निज आत्मा में
'सलिल' बसाएँ...
********************
-दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

बुधवार, 21 जुलाई 2010

दोहा दर्पण: संजीव 'सलिल' *


दोहा दर्पण:

संजीव 'सलिल'

*
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*
कविता की बारिश करें, कवि बादल हों दूर.
कौन किसे रोके 'सलिल', आँखें रहते सूर..

है विवेक ही सुप्त तो, क्यों आये बरसात.
काट वनों को, खोद दे पर्वत खो सौगात..

तालाबों को पाट दे, मरुथल से कर प्यार.
अपना दुश्मन मनुज खुद, जीवन से बेज़ार..

पशु-पक्षी सब मारकर खा- मंगल पर घूम.
दंगल कर, मंगल भुला, 'सलिल' मचा चल धूम..

जर-ज़मीन-जोरू-हुआ, सिर पर नशा सवार.
अपना दुश्मन आप बन, मिटने हम बेज़ार..

गलती पर गलती करें, दें औरों को दोष.
किन्तु निरंतर बढ़ रहा, है पापों का कोष..

ले विकास का नाम हम, करने तुले विनाश.
खुद को खुद ही हो रहे, 'सलिल' मौत का पाश..
******
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

hasya rachna: दिल मगर जवान है... ख़लिश - सलिल - कमल

दिल मगर जवान है...

ख़लिश - सलिल - कमल
*








*

१.ख़लिश
साठ और पाँच साल हो चले तो हाल है
झुर्रियाँ बदन पे और डगमगाई चाल है

है रगों में ख़ून तो अभी भी गर्म बह रहा
क्या हुआ लटक रही कहीं-कहीं पे खाल है

पान की गिलौरियों से होंठ लाल-लाल हैं
ग़म नहीं पिचक रहा जो आज मेरा गाल है

बदगुमान हैं बड़े वो हुस्न के ग़ुरूर में
कह रहे हैं शर्म कर, सिर पे तेरे काल है

ढल गईं जवानियाँ, दिल मगर जवान है
शायरी का यूँ ख़लिश हो गया कमाल है.

महेश चंद्र गुप्त ख़लिश
(Ex)Prof. M C Gupta
MD (Medicine), MPH, LL.M.,
Advocate & Medico-legal Consultant
www.writing.com/authors/mcgupta44
२. 'सलिल'

साठ और पाँच साल के सबल जवान हैं.
तीर अब भी है जुबां, कमर भले कमान है..
 
खार की खलिश सहें, किन्तु आह ना भरें. 
देखकर कली कहें: वाह! क्या उठान है?
 
शेर सुना शेर को पल में दूर दें भगा.
जो पढ़े वो ढेर हो, ब्लॉग ही मचान है. 
 
बाँकपन अभी भी है, अलहदा शबाब है.
बिन पिए चढ़ा नशा दूर हर थकान है..
 
तिजोरी हैं तजुर्बों की, खोल माल बाँट लो--
'सलिल' देख हौसला, भर रहे उड़ान है.
३. कमल 

शायरी का कमाल साठ औ  पांच में ही  सिर चढ़ कर बोल रहा है 
मैं अस्सी और पांच के करीब पहुँच कर भी शायरी के कुंवारेपन से नहीं 
उबर पा रहा हूँ |  वैसे शायरी अद्भुत दवा है एक लम्बी उमर पाने के लिये |
 
खाल लटक जाय चाल डगमगाय गाल पिचक जाय 
किन्तु शायरी सिमट जाय भला  क्या मजाल है
हो गीतों गजलों की  हाला कल्पना बनी हो मधुबाला 
ढल जाय उमर उस मधुशाला में तो क्या मलाल है  |

******
आप सबका बहुत धन्यवाद. सलिल जी, आपकी आशु-कविता ज़बर्दस्त है.

बरसात की बात

बरसात की बात






विवेक रंजन श्रीवास्तव

ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी

रामपुर , जबलपुर





लो हम फिर आ गये

बरसात की बात करने ,पावस गोष्ठी में

जैसे किसी महिला पत्रिका का

वर्षा विशेषांक हों , बुक स्टाल पर

ये और बात है कि

बरसात सी बरसात ही नही आई है

अब तक

बादल बरसे तो हैं , पर वैसे ही

जैसे बिजली आती है गांवो में

जब तब



हर बार

जब जब

घटायें छाती है

मेरा बेटा खुशियां मनाता है

मेरा अंतस भी भीग जाता है

और मेरा मन होता है एक नया गीत लिखने का

मौसम के इस बदलते मिजाज से

हमारी बरसात से जुड़ी खुशियां बहुगुणित हो

किश्त दर किश्त मिल रही हैं हमें

क्योकि बरसात वैसे ही बार बार प्रारंभ होने को ही हो रही है

जैसे हमें एरियर

मिल रहा है ६० किश्तों में



मुझे लगता है

अब किसान भी

नही करते

बरसात का इंतजार उस व्यग्र तन्मयता से

क्योंकि अब वे सींचतें है खेत , पंप से

और बढ़ा लेते हैं लौकी

आक्सीटोन के इंजेक्शन से



देश हमारा बहुत विशाल है

कहीं बाढ़ ,तो कहीं बरसात बिन

हाल बेहाल हैं

जो भी हो

पर

अब भी

पहली बरसात से

भीगी मिट्टी की सोंधी गंध,

प्रेमी मन में बरसात से उमड़ा हुलास

और झरनो का कलकल नाद

उतना ही प्राकृतिक और शाश्वत है

जितना कालिदास के मेघदूत की रचना के समय था

और इसलिये तय है कि अगले बरस फिर

होगी पावस गोष्ठी

और हम फिर बैठेंगे

इसी तरह

नई रचनाओ के साथ .

नव गीत: बहुत छला है..... संजीव 'सलिल'

नव गीत:

बहुत छला है.....

संजीव 'सलिल'
*











*
बहुत छला है
तुमने राम....
*
चाहों की
क्वांरी सीता के
मन पर हस्ताक्षर
धनुष-भंग कर
आहों का
तुमने कर डाले.
कैकेयी ने
वर कलंक
तुमको वन भेजा.
अपयश-निंदा ले
तुमको
दे दिये उजाले.
जनगण बोला:
विधि है वाम.
बहुत छला है
तुमने राम....
*
शूर्पनखा ने
करी कामना
तुमको पाये.
भेज लखन तक
नाक-कान
तुमने कटवाये.
वानर, ऋक्ष,
असुर, सुर
अपने हित मरवाये.
फिर भी दीनबन्धु
करुणासागर
कहलाये.
कह अकाम
साधे निज काम.
बहुत छला है
तुमने राम....
*
सीता मैया
परम पतिव्रता
जंगल भेजा.
राज-पाट
किसकी खातिर
था कहो सहेजा?
लव-कुश दे
माँ धरा समायीं
क्या तुम जीते?
डूब गए
सरयू में
इतने हुए फजीते.
नष्ट अयोध्या
हुई अनाम.
बहुत छला है
तुमने राम....
************
दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

सरस्वती वंदना: संजीव 'सलिल'

सरस्वती वंदना:

संजीव 'सलिल'
*


















*

संवत १६७७ में रचित ढोला मारू दा दूहा से सरस्वती वंदना का दोहा :

सकल सुरासुर सामिनी, सुणि माता सरसत्ति.
विनय करीन इ वीनवुं, मुझ घउ अविरल मत्ति..

अम्ब  विमल मति दे.....
*


हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....

नन्दन कानन हो यह धरती।
पाप-ताप जीवन का हरती।
हरियाली विकसे.....

बहे नीर अमृत सा पावन।
मलयज शीतल शुद्ध सुहावन।
अरुण निरख विहसे.....

कंकर से शंकर गढ़ पायें।
हिमगिरि के ऊपर चढ़ जाएँ।
वह बल-विक्रम दे.....

हरा-भरा हो सावन-फागुन।
रम्य ललित त्रैलोक्य लुभावन।
सुख-समृद्धि सरसे.....

नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें।
स्नेह समन्वय मन्त्र उचारें।
' सलिल' विमल प्रवहे.....

************************

२.

हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....

जग सिरमौर बने माँ भारत.
सुख-सौभाग्य करे नित स्वागत.
आशिष अक्षय दे.....

साहस-शील हृदय में भर दे.
जीवन त्याग तपोमय करदे.
स्वाभिमान भर दे.....

लव-कुश, ध्रुव, प्रहलाद हम बनें.
मानवता का त्रास-तम् हरें.
स्वार्थ सकल तज दे.....

दुर्गा, सीता, गार्गी, राधा,
घर-घर हों काटें भव बाधा.
नवल सृष्टि रच दे....

सद्भावों की सुरसरि पवन.
स्वर्गोपम हो राष्ट्र सुहावन.
'सलिल' निरख हरषे...
*

३.

हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....

नाद-ब्रम्ह की नित्य वंदना.
ताल-थापमय सलिल-साधना
सरगम कंठ सजे....,

रुन-झुन रुन-झुन नूपुर बाजे.
नटवर-नटनागर उर साजे.
रास-लास उमगे.....

अक्षर-अक्षर शब्द सजाये.
काव्य, छंद, रस-धार बहाये.
शुभ साहित्य सृजे.....

सत-शिव-सुन्दर सृजन शाश्वत.
सत-चित-आनंद भजन भागवत.
आत्मदेव पुलके.....

कंकर-कंकर प्रगटें शंकर.
निर्मल करें हृदय प्रलयंकर.
गुप्त चित्र प्रगटे.....
*

४.

हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....

कलकल निर्झर सम सुर-सागर.
तड़ित-ताल के हों कर आगर.
कंठ विराजे सरगम हरदम-
सदय रहें नटवर-नटनागर.
पवन-नाद प्रवहे...

विद्युत्छटा अलौकिक वर दे.
चरणों मने गतिमयता भर डॉ.
अंग-अंग से भाव साधना-
चंचल चपल चारू चित कर दे.
तुहिन-बिंदु पुलके....

चित्र गुप्त, अक्षर संवेदन.
शब्द-ब्रम्ह का कलम निकेतन.
जियें मूल्य शाश्वत शुचि पावन-
जीवन-कर्मों का शुचि मंचन.
मन्वन्तर महके...
****************

हास्य कुण्डली: संजीव 'सलिल'
















हास्य कुण्डली:

संजीव 'सलिल'
*
घरवाली को छोड़कर, रहे पड़ोसन ताक.
सौ चूहे खाकर बने बिल्ली जैसे पाक..
बिल्ली जैसे पाक, मगर नापाक इरादे.
काश इन्हें इनकी कोई औकात बतादे..
भटक रहे बाज़ार में, खुद अपना घर छोड़कर.
रहें न घर ना घाट के, घरवाली को छोड़कर..
*
सूट-बूट सज्जित हुए, समझें खुद को लाट.
अंगरेजी बोलें गलत, दिखा रहे हैं ठाठ..
दिखा रहे हैं ठाठ, मगर मन तो गुलाम है.
निज भाषा को भूल, नामवर भी अनाम है..
हुए जड़ों से दूर, पग-पग पर लज्जित हुए.
घोडा दिखने को गधे, सूट-बूट सज्जित हुए..
*
गाँव छोड़ आये शहर, जबसे लल्लूलाल.
अपनी भाषा छोड़ दी, तन्नक नहीं मलाल..
तन्नक नहीं मलाल, समझते खुद को साहब.
हँसे सभी जब सुना: 'पेट में हैडेक है अब'..
'फ्रीडमता' की चाह में, भटकें तजकर ठाँव.
होटल में बर्तन घिसें, भूले खेती-गाँव..
*

सामूहिक सरस्वती वंदना:

सरस्वती वंदना:

१. महाकवि गुलाब खंडेलवालजी :
अयि मानस-कमल-विहारिणी!
हंस-वाहिनी! माँ सरस्वती! वीणा-पुस्तक-धारिणी!

शून्य अजान सिन्धु के तट पर
मानव-शिशु रोता  था कातर
उतरी ज्योति सत्य, शिव, सुन्दर
तू भय-शोक-निवारिणी

देख प्रभामय तेरी मुख-छवि
नाच उठे भू, गगन, चन्द्र, रवि
चिति की चिति तू  कवियों की कवि
अमित रूप विस्तारिणी

तेरे मधुर स्वरों से मोहित
काल अशेष शेष-सा नर्तित
आदि-शक्ति तू अणु-अणु में स्थित
जन-जन-मंगलकारिणी

अयि मानस-कमल-विहारिणी!
हंस-वाहिनी! माँ सरस्वती! वीणा-पुस्तक-धारिणी!

*****************
शकुंतला बहादुर जी :
शारदे ! वर दे , वर दे ।
दूर कर अज्ञान-तिमिर माँ,
ज्ञान-ज्योति भर दे , वर दे । शारदे...
सत्य का संकल्प दे माँ,
मन पवित्र रहें हमारे ,
वेद की वीणा बजा कर,
जग झंकृत कर दे,वर दे ।। शारदे...
** ** **

सरस्वती माता ss
सरस्वती माता ss
विद्या-दानी, दयानी
सरस्वती माता ss
कीजे कृपा दृष्टि,
दीजे विमल बुद्धि,
गाऊँ मैं शुभ-गान,
मुझको दो वरदान।
सरस्वती माता, सरस्वती माता।।
** ** **
आर. सी. शर्मा :  
 rcsharmaarcee@yahoo.co.in
माँ शारदे ऐसा वर दे।
दिव्य ज्ञान से जगमग कर दे॥

शीश झुका कर दीप जला कर।
शब्द्पुष्प के हार बना कर॥
हम  तेरा  वंदन  करते  हैं।
सब मिल अभिनन्दन करते हैं।।
करुण कृपा का वरद हस्त  माँ, शीश मेरे धर दे।

प्रेम दया सबके हित मन में।
करुणा की जलधार नयन में॥
वीणा  की  झंकार  सृजन  में।
भक्ति की  रसधार  भजन में॥
हंस वाहिनी धवल धारिणी परम कृपा कर दे।

साक्षरता के दिये  जला दें।
भूख  और  संताप मिटा दें।
बहे ज्ञान की  अविरल धरा
हो अभिभूत जगत ये सारा॥
जग जननी माँ अब गीतों को नितनूतन स्वर दे।
माँ शारदे ऐसा वर दे।
दिव्य ज्ञान से जगमग कर दे॥

***********************
 
माँ शारदा के स्तुति गान में एक विनम्र पुष्प:
कल्पना की क्यारियों से
फूल चुन चुन कर सजाये
कार्तिकी पूनम निशा के
मोतियॊं की गूँथ माला
शब्द के अक्षत रंगे हैं
भावना की रोलियों में
प्राण में दीपित किये हैं
अर्चना की दीप-ज्वाला
और थाली में रखे हैं
काव्य की अगरु सुगन्धित
शारदे तेरे चरण में
एक कविता और अर्पित
छंद दोहे गीत मुक्तक
नज़्म कतए और गज़लें
कुछ तुकी हैं, बेतुकी कुछ
जो उगा हम लाये फ़सलें
हर कवि के कंठ से तू
है विनय के ्साथ वम्दित
शारदे तेरे चरण में
एक कविता और अर्पित
आदि तू है, तू अनादि
तू वषटकारा स्वरा है
तू है स्वाहा तू स्वधा है
तू है भाषा, अक्षरा है
तेरी वीणा की धुनों पर
काल का हर निमिष नर्तित
शारदे तेरे चरण में
एक कविता और अर्पित
************************ 

-आर० सी० शर्मा “आरसी”
 - rcsharmaarcee@yahoo.co.in

धवल  धारिणी  शारदे,  वीणा  सोहे  हाथ।
शब्द सुमन अर्पित करें, धर चरणों में माथ ॥
 
वागेश्वरी, सिद्धेश्वरी, विश्वेश्वरी तुम मात।
वाणी का वरदान दो, गीतों की  बरसात ॥
 
बन याचक  वर  मांगते, पूरी  कर  दे साध।
हम पानी के बुलबुले, तू कृपासिन्धु अगाध॥
 
शब्द पुष्प अर्पित करें, हम गीतों के हार ।
दिन दूना बढ़ता रहे, ज्ञान कृपा भण्डार ॥
 
इतनी  शीतलता  लिए,  है  माँ  तेरा  प्यार ।
ज्ञान पिपासु हम धरा, तू रिमझिम बरसात ॥
 
हम  तेरे  सुत  शारदे  दे  ऐसा  वरदान ।
फसल उगाएं ज्ञान की, भरें खेत खलिहान॥
 
आस लिए  हम  सब  खड़े, देखें तेरी ओर।
ज्यों चातक स्वाति तके, चंदा तके चकोर ।।
 
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