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गुरुवार, 30 जून 2011

Gita Path Bhagvad Gita –Adhyay 19 -vijay kaushal

Subject: Gita Path
Bhagvad Gita –Adhyay 19
vijay kaushal

Arjun
:Hey Vasudev, how can I do the most heinous and unpardonable
act of forwarding email that I receive, to my friends, relatives and
revered elders?

Krishna: Paarth, at this moment, none of them is your friend or foe,
relative or in-law, young or old and good or evil. You have no escape
from following your Net-Dharma. Make haste to log on and send off the
email to one and all. That is the only Karma expected of you and
Dharma you must follow.

Arjun: Hey Murari! Do not implore me to do something that pricks my
conscience and stirs my soul.

Krishna: O Kunti-Putra, you are caught in the vicious circle of
Maya. In this material world, you are committed to no one except to
yourself, your Dharma and your mouse. emails have existed for the
last 25 years and will remain long after you are gone. Rise above the
Maya and perform your bounden duty.

Arjun: Lord Krishna, pray and enlighten me on how email is related to Maya.

Krishna: Vatsa, email is the 6 th element in the universe –Aap,
Vaayu, Jal, Agni, Aakaash and email. It is at the same time animate
and inanimate, living and dead beat. It overloads the system and fills
up the hard disk. But it serves one great purpose. It leads people to
believe that they are filling their time in an intellectual pursuit by
reading and re-forwarding mail. It gives them a sense of achievement
without investing their intellect and efforts. Like the Atman that
leaves one’s physical body and moves on to another, the email moves
from system to system and never gets deleted or dies.

Arjun: Great Giridhaari, kindly tell me what the true attributes of email are.

Krishna: Neither fire can burn it, nor air can evaporate it. Neither
can it be conquered nor can it be defeated. email is omnipresent and
immortal like your noble and eternal soul. Unlike an arrow shot from
your bow, many a time the email forwarded by you, will even return to
you safely after some months or even years, allowing you to
re-re-forward it to the same people.

Arjun: Great Saarathi, my salutations to you. You have opened my eyes
to the cult of email. I was lost in the Maya and have been reading all
the email that I keep receiving and doing no other Karma. Now on, I
will just press the "Forward" button without reading any of it and
send it to all and sundry, friends and foes, relatives and in-laws,
young and old. That will surely bring them to their knees in this
epochal battle of Good against Evil, in the Kurukshetra.


Krishna: Arjuna, victory or defeat is not in your hands. Do not
ponder over the fruits of your labour. Just keep forwarding email and
make one and all go bananas reading it and you will have done your
supreme duty. Tathastu.


Thus Spoke......

Lord Krishna

बुधवार, 29 जून 2011

गीत: काल तो सदा हमारे साथ... --संजीव 'सलिल'

गीत:
काल तो सदा हमारे साथ...
संजीव 'सलिल'
*
काल तो सदा हमारे साथ,
काल की क्यों करते परवाह?
काल है नहीं किसी के साथ, काल की यों करते परवाह...
*
काल दे साथ उठाता शीश, काल विपरीत झुकाता माथ...
काल कर देता लम्बे हस्त, काल ही काटे पल में हाथ..
काल जो चाहे वह हो नित्य, काल विपरीत न करिए चाह-
काल है नहीं किसी के साथ, काल की यों करते परवाह...
*
काल के वश में है हर एक, काल-संग चलिए लाठी टेक.
काल से करिए विनय हमेश, न छूटे किंचित बुद्धि-विवेक..
काल दे स्नेह-प्रेम, सद्भाव, काल हर ले ईर्ष्या औ' डाह-
काल है नहीं किसी के साथ, काल की यों करते परवाह...
*

काल कल, आज और कल मीत, न आता-जाता हुआ प्रतीत.
काल पल सुखद गये कब बीत?, दुखद पल होते नहीं व्यतीत..
काल की गरिमा नभ विस्तीर्ण, काल की महिमा समुद अथाह-
काल है नहीं किसी के साथ, काल की यों करते परवाह...
*
काल से महाकाल
भी भीत, हुए भू-लुंठित हारे-जीत.
काल संग पढ़ो काल के पाठ, न फिर दुहराओ व्यथित अतीत.
काल की सुनो 'सलिल' लय-ताल, काल की गहो हमेषा छांह-
काल है नहीं किसी के साथ, काल की यों करते परवाह...
*
 
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

सामयिक मुक्तिका: क्यों???... संजीव 'सलिल'

सामयिक मुक्तिका:
क्यों???...
संजीव 'सलिल'
*
छुरा पीठ में भोंक रहा जो उसको गले लगाते क्यों?
कर खातिर अफज़ल-कसाब की, संतों को लठियाते क्यों??

पगडंडी-झोपड़ियाँ तोड़ीं, राजमार्ग बनवाते हो.
जंगल, पर्वत, नदी, सरोवर, निष्ठुर रोज मिटाते क्यों??

राम-नाम की राजनीति कर, रामालय को भूल गये.
नीति त्याग मजबूरी को गाँधी का नाम बताते क्यों??

लूट देश को, जमा कर रहे- हो विदेश में जाकर धन.
सच्चे हैं तो लोकपाल बिल, से नेता घबराते क्यों??

बाँध आँख पर पट्टी, तौला न्याय बहुत अन्याय किया.
असंतोष की भट्टी को, अनजाने ही सुलगाते क्यों??

घोटालों के कीर्तिमान अद्भुत, सारा जग है विस्मित.
शर्माना तो दूर रहा, तुम गर्वित हो इतराते क्यों??

लगा जान की बाजी, खून बहाया वीर शहीदों ने.
मण्डी बना देश को तुम, निष्ठा का दाम लगाते क्यों??

दीपों का त्यौहार मनाते रहे, जलाकर दीप अनेक.
हर दीपक के नीचे तम को, जान-बूझ बिसराते क्यों??

समय किसी का सगा न होता, नीर-क्षीर कर देता है.
'सलिल' समय को असमय ही तुम, नाहक आँख दिखाते क्यों??
*********

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

दोहा सलिला: अधर हुए रस लीन --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:                                                                                                 
अधर हुए रस लीन
संजीव 'सलिल'
*
अधर अधर पर जब धरे, अधर रह गये मूक.
चूक हुई कब?, क्यों?, कहाँ?, उठी न उर में हूक..
*
अधर अबोले बोलते, जब भी जी की बात.
अधर सुधारस घोलते, प्रमुदित होता गात..
*
अधर लरजते देखकर, अधर फड़ककर मौन.
किसने-किससे क्या कहा?, 'सलिल' बताये कौन??
*
अधर रीझकर अधर पर, सुना रहा नवगीत.
अधर खीझकर अधर से, कहे- मौन हो मीत..
*
तोता-मैना अधर के, किस्से हैं विख्यात.
कहने-सुनने में 'सलिल', बीत न जाये रात..
*
रसनिधि पाकर अधर में, अधर हुए रसलीन.
विस्मित-प्रमुदित हैं अधर, देख अधर को दीन..
*
अधर मिले जब अधर से, पल में बिसरा द्वैत.
माया-मायाधीश ने, पल में वरा अद्वैत..
*
अधरों का स्पर्श पा, वेणु-शंख संप्राण.
दस दिश में गुंजित हुए, संजीवित निष्प्राण..
*
तन-मन में लेने लगीं, अनगिन लहर लिहोर.
कहा अधर ने अधर से, 'अब न छुओ' कर जोर..
*
यह कान्हा वह राधिका, दोनों खासमखास.
श्वास वेणु बज-बज उठे, अधर करें जब रास..
*
ओष्ठ, लिप्स, लब, होंठ दें, जो जी चाहे नाम.
निरासक्त योगी अधर, रखें काम से काम..
*
अधर लगाते आग औ', अधर बुझाते आग.
अधर गरल हैं अमिय भी, अधर राग औ' फाग..
*
अधर अधर को चूमकर, जब करते रसपान.
'सलिल' समर्पण ग्रन्थ पढ़, बन जाते रस-खान..
*
अधराराधन के पढ़े, अधर न जब तक पाठ.
तब तक नीरस जानिए, उनको जैसे काठ..
*
अधर यशोदा कान्ह को, चूम हो गये धन्य.
यह नटखट झटपट कहे, 'मैया तुम्हीं अनन्य'..
*
दरस-परस कर मत तरस, निभा सरस संबंध.
बिना किसी प्रतिबन्ध के, अधर करे अनुबंध..
*
दिया अधर ने अधर को, पल भर में पैगाम.
सारा जीवन कर दिया, 'सलिल'-नाम बेदाम..
*

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

मंगलवार, 28 जून 2011

-: हिंदी सलिला :- विमर्श १ भाषा, वर्ण या अक्षर, शब्द, ध्वनि, व्याकरण, स्वर, व्यंजन -संजीव वर्मा 'सलिल'-र्मा 'सलिल'

  -: हिंदी सलिला :- 
विमर्श १ 
भाषा, वर्ण या अक्षर, शब्द, ध्वनि, व्याकरण, स्वर, व्यंजन 
- संजीव वर्मा 'सलिल' -


औचित्य :

                   भारत-भाषा हिन्दी भविष्य में विश्व-वाणी बनने के पथ पर अग्रसर है. हिन्दी की शब्द सामर्थ्य पर प्रायः अकारण तथा जानकारी के अभाव में प्रश्न चिन्ह लगाये जाते हैं. भाषा सदानीरा सलिला की तरह सतत प्रवाहिनी होती है. उसमें से कुछ शब्द काल-बाह्य होकर बाहर हो जाते हैं तो अनेक शब्द उसमें प्रविष्ट भी होते हैं.

                   'हिन्दी सलिला' वर्त्तमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर हिन्दी का व्यावहारिक शुद्ध रूप (व्याकरण व पिंगल) जानने की दिशा में एक कदम है. यहाँ न कोई सिखानेवाला है, न कोई सीखनेवाला. हम सब जितना जानते हैं उसका आदान-प्रदान कर पहले से कुछ अधिक जान सकें, मात्र यह उद्देश्य है. व्यवस्थित विधि से आगे बढ़ने की दृष्टि से संचालक कुछ सामग्री प्रस्तुत करेंगे. उसमें कुछ कमी या त्रुटि हो तो आप टिप्पणी कर न केवल अवगत कराएँ अपितु शेष और सही सामग्री उपलब्ध हो तो भेजें. मतान्तर होने पर संचालक का प्रयास होगा कि मानकों पर खरी, शुद्ध भाषा की जानकारी पाकर सामंजस्य, समन्वय तथा सहमति बन सके.

                   हिंदी के अनेक रूप देश में आंचलिक/स्थानीय भाषाओँ और बोलिओं के रूप में प्रचलित हैं. इस कारण भाषिक नियमों, क्रिया-कारक के रूपों, कहीं-कहीं शब्दों के अर्थों में अंतर स्वाभाविक है किन्तु हिन्दी को विश्व भाषा बनने के लिये इस अंतर को पाटकर क्रमशः मानक रूप लेना ही होगा. अनेक क्षेत्रों में हिन्दी की मानक शब्दावली है. जहाँ नहीं है वहाँ क्रमशः आकार ले रही है. हम भाषिक तत्वों के साथ साहित्यिक विधाओं तथा शब्द क्षमता विस्तार की दृष्टि से भी सामग्री चयन करेंगे. आपकी रूचि होगी तो प्रश्न या गृहकार्य के माध्यम से भी आपकी सहभागिता हो सकती है.

                   जन सामान्य भाषा के जिस देशज रूप का प्रयोग करता है वह कही गयी बात का आशय संप्रेषित करता है किन्तु वह पूरी तरह शुद्ध नहीं होता. ज्ञान-विज्ञान में भाषा का उपयोग तभी संभव है जब शब्द से एक सुनिश्चित अर्थ की प्रतीति हो. इस दिशा में हिंदी का प्रयोग न होने को दो कारण इच्छाशक्ति की कमी तथा भाषिक एवं शाब्दिक नियमों और उनके अर्थ की स्पष्टता न होना है.

                  इस विमर्श का श्री गणेश करते हुए हमारा प्रयास है कि हम एक साथ मिलकर सबसे पहले कुछ मूल बातों को जानें. भाषा, वर्ण या अक्षर, शब्द, ध्वनि, लिपि, व्याकरण, स्वर, व्यंजन जैसी मूल अवधारणाओं को समझने का प्रयास करें.

भाषा/लैंग्वेज :

                  अनुभूतियों से उत्पन्न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए भंगिमाओं या ध्वनियों की आवश्यकता होती है. भंगिमाओं से नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाओं का विकास हुआ. ध्वनि से भाषा, वादन एवं गायन कलाओं का जन्म हुआ. आदि मानव को प्राकृतिक घटनाओं (वर्षा, तूफ़ान, जल या वायु का प्रवाह), पशु-पक्षियों की बोली आदि को सुनकर हर्ष, भय, शांति आदि की अनुभूति हुई. इन ध्वनियों की नकलकर उसने बोलना, एक-दूसरे को पुकारना, भगाना, स्नेह-क्रोध आदि की अभिव्यक्ति करना सदियों में सीखा.

लिपि:


                    कहे हुए को अंकित कर स्मरण रखने अथवा अनुपस्थित साथी को बताने के लिए हर ध्वनि के लिए अलग-अलग संकेत निश्चित कर अंकित करना सीखकर मनुष्य शेष सभी जीवों से अधिक उन्नत हो सका. इन संकेतों की संख्या बढ़ने तथा व्यवस्थित रूप ग्रहण करने ने लिपि को जन्म दिया. एक ही अनुभूति के लिए अलग-अलग मानव समूहों में अलग-अलग ध्वनि तथा संकेत बनने तथा आपस में संपर्क न होने से विविध भाषाओँ और लिपियों का जन्म हुआ.

चित्र गुप्त ज्यों चित्त का, बसा आप में आप.
भाषा-सलिला निरंतर, करे अनाहद जाप.

                  भाषा वह साधन है जिससे हम अपने भाव एवं विचार अन्य लोगों तक पहुँचा पाते हैं अथवा अन्यों के भाव और विचार ग्रहण कर पाते हैं. यह आदान-प्रदान वाणी के माध्यम से (मौखिक), तूलिका के माध्यम से अंकित, लेखनी के द्वारा लिखित तथा आजकल टंकण यंत्र या संगणक द्वारा टंकित होता है.

निर्विकार अक्षर रहे मौन, शांत निः शब्द
भाषा वाहक भाव की, माध्यम हैं लिपि-शब्द.

व्याकरण ( ग्रामर ) -

                  व्याकरण ( वि + आ + करण ) का अर्थ भली-भाँति समझना है. व्याकरण भाषा के शुद्ध एवं परिष्कृत रूप सम्बन्धी नियमोपनियमों का संग्रह है. भाषा के समुचित ज्ञान हेतु वर्ण विचार (ओर्थोग्राफी) अर्थात वर्णों (अक्षरों) के आकार, उच्चारण, भेद, संधि आदि , शब्द विचार (एटीमोलोजी) याने शब्दों के भेद, उनकी व्युत्पत्ति एवं रूप परिवर्तन आदि तथा वाक्य विचार (सिंटेक्स) अर्थात वाक्यों के भेद, रचना और वाक्य विश्लेषण को जानना आवश्यक है.

वर्ण शब्द संग वाक्य का, कविगण करें विचार.
तभी पा सकें वे 'सलिल', भाषा पर अधिकार.

वर्ण / अक्षर :

हिंदी में वर्ण के दो प्रकार स्वर (वोवेल्स) तथा व्यंजन (कोंसोनेंट्स) हैं.

अजर अमर अक्षर अजित, ध्वनि कहलाती वर्ण.
स्वर-व्यंजन दो रूप बिन, हो अभिव्यक्ति विवर्ण.

स्वर ( वोवेल्स ) :

                   स्वर वह मूल ध्वनि है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता. वह अक्षर है जिसका अधिक क्षरण, विभाजन या ह्रास नहीं हो सकता. स्वर के उच्चारण में अन्य वर्णों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती. यथा - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:, ऋ, .

स्वर के दो प्रकार:

१. हृस्व : लघु या छोटा ( अ, इ, उ, ऋ, ऌ ) तथा
२. दीर्घ : गुरु या बड़ा ( आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: ) हैं.

अ, इ, उ, ऋ हृस्व स्वर, शेष दीर्घ पहचान
मिलें हृस्व से हृस्व स्वर, उन्हें दीर्घ ले मान.

व्यंजन (कांसोनेंट्स) :

व्यंजन वे वर्ण हैं जो स्वर की सहायता के बिना नहीं बोले जा सकते. व्यंजनों के चार प्रकार हैं.

१. स्पर्श व्यंजन (क वर्ग - क, ख, ग, घ, ङ्), (च वर्ग - च, छ, ज, झ, ञ्.), (ट वर्ग - ट, ठ, ड, ढ, ण्), (त वर्ग त, थ, द, ढ, न), (प वर्ग - प,फ, ब, भ, म).
२. अन्तस्थ व्यंजन (य वर्ग - य, र, ल, व्, श).
३. ऊष्म व्यंजन ( श, ष, स ह) तथा
४. संयुक्त व्यंजन ( क्ष, त्र, ज्ञ) हैं.
अनुस्वार (अं) तथा विसर्ग (अ:) भी व्यंजन हैं.

भाषा में रस घोलते, व्यंजन भरते भाव.
कर अपूर्ण को पूर्ण वे मेटें सकल अभाव.

शब्द :

अक्षर मिलकर शब्द बन, हमें बताते अर्थ.
मिलकर रहें न जो 'सलिल', उनका जीवन व्यर्थ.

                   अक्षरों का ऐसा समूह जिससे किसी अर्थ की प्रतीति हो शब्द कहलाता है. शब्द भाषा का मूल तत्व है. जिस भाषा में जितने अधिक शब्द हों वह उतनी ही अधिक समृद्ध कहलाती है तथा वह मानवीय अनुभूतियों और ज्ञान-विज्ञानं के तथ्यों का वर्णन इस तरह करने में समर्थ होती है कि कहने-लिखनेवाले की बात का बिलकुल वही अर्थ सुनने-पढ़नेवाला ग्रहण करे. ऐसा न हो तो अर्थ का अनर्थ होने की पूरी-पूरी संभावना है. किसी भाषा में शब्दों का भण्डारण कई तरीकों से होता है.

१. मूल शब्द:
                   भाषा के लगातार प्रयोग में आने से समय के विकसित होते गए ऐसे शब्दों का निर्माण जन जीवन, लोक संस्कृति, परिस्थितियों, परिवेश और प्रकृति के अनुसार होता है. विश्व के विविध अंचलों में उपलब्ध भौगोलिक परिस्थितियों, जीवन शैलियों, खान-पान की विविधताओं, लोकाचारों,धर्मों तथा विज्ञानं के विकास के साथ अपने आप होता जाता है.

२. विकसित शब्द:
                     आवश्यकता आविष्कार की जननी है. लगातार बदलती परिस्थितियों, परिवेश, सामाजिक वातावरण, वैज्ञानिक प्रगति आदि के कारण जन सामान्य अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के लिये नये-नये शब्दों का प्रयोग करता है. इस तरह विकसित शब्द भाषा को संपन्न बनाते हैं. व्यापार-व्यवसाय में उपभोक्ता के साथ धोखा होने पर उन्हें विधि सम्मत संरक्षण देने के लिये कानून बना तो अनेक नये शब्द सामने आये.संगणक के अविष्कार के बाद संबंधित तकनालाजी को अभिव्यक्त करने के नये शब्द बनाये गये.

३. आयातित शब्द:
                  किन्हीं भौगोलिक, राजनैतिक या सामाजिक कारणों से जब किसी एक भाषा बोलनेवाले समुदाय को अन्य भाषा बोलने वाले समुदाय से घुलना-मिलना पड़ता है तो एक भाषा में दूसरी भाषा के शब्द भी मिलते जाते हैं. ऐसी स्थिति में कुछ शब्द आपने मूल रूप में प्रचलित रहे आते हैं तथा मूल भाषा में अन्य भाषा के शब्द यथावत (जैसे के तैसे) अपना लिये जाते हैं. हिन्दी ने पूर्व प्रचलित भाषाओँ संस्कृत, अपभ्रंश, पाली, प्राकृत तथा नया भाषाओं-बोलिओं से बहुत से शब्द ग्रहण किये हैं. भारत पर यवनों के हमलों के समय फारस तथा अरब से आये सिपाहियों तथा भारतीय जन समुदायों के बीच शब्दों के आदान-प्रदान से उर्दू का जन्म हुआ. आज हम इन शब्दों को हिन्दी का ही मानते हैं, वे किस भाषा से आये नहीं जानते.

हिन्दी में आयातित शब्दों का उपयोग ४ तरह से हुआ है.

१.यथावत:
                मूल भाषा में प्रयुक्त शब्द के उच्चारण को जैसे का तैसा उसी अर्थ में देवनागरी लिपि में लिखा जाए ताकि पढ़ते/बोले जाते समय हिन्दी भाषी तथा अन्य भाषा भाषी उस शब्द को समान अर्थ में समझ सकें. जैसे अंग्रेजी का शब्द स्टेशन, यहाँ अंगरेजी में स्टेशन (station) लिखते समय उपयोग हुए अंगरेजी अक्षरों को पूरी तरह भुला दिया गया है.

२.परिवर्तित:
                 मूल शब्द के उच्चारण में प्रयुक्त ध्वनि हिन्दी में न हो अथवा अत्यंत क्लिष्ट या सुविधाजनक हो तो उसे हिन्दी की प्रकृति के अनुसार परिवर्तित कर लिया जाए. जैसे अंगरेजी के शब्द हॉस्पिटल को सुविधानुसार बदलकर अस्पताल कर लिया गया है. .

३. पर्यायवाची:
                    जिन शब्दों के अर्थ को व्यक्त करने के लिये हिंदी में हिन्दी में समुचित पर्यायवाची शब्द हैं या बनाये जा सकते हैं वहाँ ऐसे नये शब्द ही लिये जाएँ. जैसे: बस स्टैंड के स्थान पर बस अड्डा, रोड के स्थान पर सड़क या मार्ग. यह भी कि जिन शब्दों को गलत अर्थों में प्रयोग किया जा रहा है उनके सही अर्थ स्पष्ट कर सम्मिलित किये जाएँ ताकि भ्रम का निवारण हो. जैसे: प्लान्टेशन के लिये वृक्षारोपण के स्थान पर पौधारोपण, ट्रेन के लिये रेलगाड़ी, रेल के लिये पटरी.

४. नये शब्द:
                   ज्ञान-विज्ञान की प्रगति, अन्य भाषा-भाषियों से मेल-जोल, परिस्थितियों में बदलाव आदि के कारण हिन्दी में कुछ सर्वथा नये शब्दों का प्रयोग होना अनिवार्य है. इन्हें बिना हिचक अपनाया जाना चाहिए. जैसे सैटेलाईट, मिसाइल, सीमेंट आदि.

                    हिंदीभाषी क्षेत्रों में पूर्व में विविध भाषाएँ / बोलियाँ प्रचलित रहने के कारण उच्चारण, क्रिया रूपों, कारकों, लिंग, वाचन आदि में भिन्नता है. अब इन सभी क्षेत्रों में एक सी भाषा के विकास के लिये बोलनेवालों को अपनी आदत में कुछ परिवर्तन करना होगा ताकि अहिन्दीभाषियों को पूरे हिन्दीभाषी क्षेत्र में एक सी भाषा समझने में सरलता हो. अगले विमर्श में में हम शब्द-भेदों की चर्चा करेंगे. 

                                            ***************************************

पर्यावरण गीत : हुआ क्यों मानव बहरा? -- संजीव 'सलिल'

पर्यावरण गीत :
हुआ क्यों मानव बहरा?
संजीव 'सलिल'
*
हुआ क्यों मानव बहरा?...

कूड़ा करकट फेंक, दोष औरों पर थोपें,
काट रहे नित पेड़,  न लेकिन कोई रोपें..
रोता नीला नभ देखे, जब-जब निज चेहरा.
सुने न करुण पुकार, हुआ क्यों मानव बहरा?...

कलकल नाद हुआ गुम, लहरें नृत्य न करतीं.
कछुए रहे न शेष, मीन बिन मारें मरतीं..
कौन करे स्नान?, न श्रद्धा- घृणा उपजती.
नदियों को उजाड़कर मानव बस्ती बसती..
लगता है भयभीत, नीर है ठहरा-ठहरा.....

लाज, हया, ना शर्म, मरा आँखों का पानी.
तरसेगा पानी को, भर आँखों में पानी..
सुधर मनुज वर्ना तरसेगी भावी पीढ़ी.
कब्र बनेगी धरा, न पाए देहरी-सीढ़ी..
कहीं न मिलता कुआँ, मधुर जल गहरा-गहरा....

शेष न होगी तेरी कोई यहाँ कहानी.
पानी-पानी हो, तज दे अब तो नादानी..
जलसंरक्षण कर, बारिश में व्यर्थ बहा मत.
अंजुरी भर-भर पान किये जा जल है अमृत.
हर सर, नदी, ताल पर दे अब पहरा-पहरा.....
*******************************

एक कुण्डली: पानी बिन यमुना दुखी -- संजीव 'सलिल'

एक कुण्डली:                                                                                             
पानी बिन यमुना दुखी
संजीव 'सलिल'
*
पानी बिन यमुना दुखी, लज्जित देखे ताज.
सत को तजकर झूठ को, पूजे सकल समाज..
पूजे सकल समाज, गंदगी मन में ज्यादा.
समय-शाह को, शह देता है मानव प्यादा..
कहे 'सलिल' कविराय, न मानव कर नादानी.
सारा जीवन व्यर्थ, न हो यदि बाकी पानी..
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नवगीत: समय-समय का फेर है... -- संजीव 'सलिल'

नवगीत:  
समय-समय का फेर है...
संजीव 'सलिल'
*
समय-समय का फेर है,समय-समय की बात.
जो है लल्ला आज वह- कल हो जाता तात.....
*
जमुना जल कलकल बहा, रची किनारे रास.
कुसुम कदम्बी कहाँ हैं? पूछे ब्रज पा त्रास..
रूप अरूप कुरूप क्यों? कूड़ा करकट घास.                                                          
पानी-पानी हो गयी प्रकृति मौन उदास..                                                           
पानी बचा न आँख में- दुर्मन मानव गात.
समय-समय का फेर है, समय-समय की बात.....
*
जो था तेजो महालय, शिव मंदिर विख्यात.
सत्ता के षड्यंत्र में-बना कब्र कुख्यात ..
पाषाणों में पड़ गए,थे तब जैसे प्राण.
मंदिर से मकबरा बन अब रोते निष्प्राण..
सत-शिव-सुंदर तज 'सलिल'-पूनम 'मावस रात.
समय-समय का फेर है,समय-समय की बात.....
*
घटा जरूरत करो, कुछ कचरे का उपयोग.
वर्ना लीलेगा तुम्हें बनकर घातक रोग..
सलिला को गहरा करो, 'सलिल' बहे निर्बाध.                                              
कब्र पुन:मंदिर बने, श्रृद्धा रहे अगाध.
नहीं झूठ के हाथ हो, कभी सत्य की मात.
समय-समय का फेर है, समय-समय की बात.....
************************************

मुक्तिका: नर्मदा नेह की... --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
नर्मदा नेह की...
संजीव 'सलिल'
*
नर्मदा नेह की, जी भर के नहायी जाए.
दीप-बाती की तरह, आस जलायी जाए..
*
भाषा-भूषा ने बिना वज़ह, लड़ाया हमको.
आरती भारती की, एक हो गायी जाए..
*
दूरियाँ दूर करें, दिल से मिलें दिल अपने.
बढ़ें नज़दीकियाँ, हर दूरी भुलायी जाए..
*
मंत्र मस्जिद में, शिवालय में अजानें गूँजें.
ये रवायत नयी, हर सिम्त चलायी जाए..
*
खून के रंग में, कोई फर्क कहाँ होता है?
प्रेम के रंग में, हरेक रूह रँगायी जाए..
*
हो न अलगू से अलग, अब कभी जुम्मन भाई.
खाला इसकी हो या उसकी, न हरायी जाए..
*
मेरी बगिया में खिले, तेरी कली घर माफिक.
बहू-बेटी न कही, अब से परायी जाए..
*
राजपथ पर रही, दम तोड़ सियासत अपनी.
धूल जनपथ की 'सलिल' इसको फंकायी जाए..
*
मेल का खेल न खेला है 'सलिल' युग बीते.
आओ हिल-मिल के कोई बात बनायी जाए.
****************
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

रविवार, 26 जून 2011

एक मुसद्दस: जगोगे कब लोगों??... --संजीव 'सलिल'

एक मुसद्दस:
जगोगे कब लोगों??...
संजीव 'सलिल'
*

उर्दू अदब के अपेक्षाकृत अल्प प्रचलित काव्य रूपों में मुसम्मत अर्थात मुसल्लस, मुरब्ब, मुखम्मस, मुसद्दस, मुसव्वअ,  मुकम्मन, मुत्तसअ तथा मुअश्शर आदि भी हैं.
मुसम्मत अर्थात मोती पिरोना. इसमें शे'र बन्दों की सूरत में लिखे जाते हैं. तीन या अधिक मिसरों का एक-एक बंद होता है. इसमें कम सेकम ३ और अधिक से अधिक मिसरे एक ही छंद और तुक के लिखे जाते हैं. शेष बन्दों में इसी छंद के शे'र इस प्रकार लिखे जाते हैं कि अंतिम मिसरे की तुक हर बंद में एक ही और शेष मिसरों में सामान होती है. मुसम्मत के ८ प्रकार मुसल्लस, मुरब्ब, मुखम्मस, मुसद्दस, मुसव्वअ,  मुकम्मन, मुत्तसअ तथा मुअश्शर हैं. फिलहाल पेशे-खिदमत हैं एक मुसद्दस. मुलाहिजा फरमायें, बाकी काव्य रूप यथा समय प्रस्तुत किये जाते रहेंगे. 

अब तो नेताओं को सच्चाई दिखायी जाए.
अफसरी शान घटे, ज़मीं पर लायी जाए..
अदालतें न हों, चौपाल लगायी जाए.
आओ मिल-जुल के कोई बात बनायी जाए..

बहुत सहा है अब तक, न सहो अब लोगों.
अगर अभी न जगे, तो जगोगे कब लोगों??
*

मुक्तिका: बात बनायी जाए... --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
बात बनायी जाए...
संजीव 'सलिल'
*
कबसे रूठी हुई किस्मत है मनायी जाए.
आस-फूलों से 'सलिल' सांस सजायी जाए..

तल्ख़ तस्वीर हकीकत की दिखायी जाए.
आओ मिल-जुल के कोई बात बनायी जाए..

सिया को भेज सियासत ने दिया जब जंगल.
तभी उजड़ी थी अवध बस्ती बसायी जाए..

गिरें जनमत को जिबह करती हुई सरकारें.
बेहिचक जनता की आवाज़ उठायी जाए..

पाँव पनघट को न भूलें, न चरण चौपालें.
खुशनुमा रिश्तों की फिर फसल उगायी जाए..  

दान कन्या का किया, क्यों तुम्हें वरदान मिले?
रस्म वर-दान की क्यों, अब न चलायी जाए??

ज़िंदगी जीना है जिनको, वही साथी चुन लें.
माँग दे मांग न बेटी की भरायी जाए..

नहीं पकवान की ख्वाहिश, न दावतों की ही.
दाल-रोटी ही 'सलिल' चैन से खायी जाए..

ईश अम्बर का न बागी हो, प्रभाकर चेते.
झोपड़ी पर न 'सलिल' बिजली गिरायी जाए..

*************

शनिवार, 25 जून 2011

व्यंग्य मुक्तिका: मौका मिलते ही..... ---संजीव 'सलिल'

व्यंग्य मुक्तिका:
मौका मिलते ही.....
संजीव 'सलिल'
*
मौका मिलते ही मँहगाई बढ़ाई जाए.
बैठ सत्ता में 'सलिल' मौज मनाई जाए..

आओ मिलजुल के कोई बात बनाई जाए.
रिश्वतों की है रकम, मिलके पचाई जाए..

देश के धन को विदेशों में छिपाना है कला.
ये कलाकारी भी अब सीखी-सिखाई जाए..

फाका करती है अगर जनता करे फ़िक्र नहीं.
नेता घोटाला करे, खाई मलाई जाए..

आई. ए. एस. के अफसर हैं बुराई की जड़.
लोग जागें तो कबर इनकी खुदाई जाए..

शाद रहना है अगर शादियाँ करो-तोड़ो.
लूट ससुराल को, बीबी भी जलाई जाए..

कोशिशें कितनी करें?, काम न कोई होता.
काम होगा अगर कीमत भी चुकाई जाए..

चोर-आतंकियों का, कीजिये सत्कार 'सलिल'.
लाठियाँ पुलिस की, संतों पे चलाई जाए..

मीरा, राधा या भगतसिंह हो पड़ोसी के यहाँ.
अपने घर में 'सलिल', लछमी ही बसाई जाए..

*****

दोहागीत : मनुआ बेपरवाह..... -- संजीव 'सलिल'

दोहागीत :
मनुआ बेपरवाह.....
-- संजीव 'सलिल'
*
मन हुलसित पुलकित बदन, छूले नभ है चाह.
झूले पर पेंगें भरे, मनुआ बेपरवाह.....
*
ठेंगे पर दुनिया सकल,
जो कहना है- बोल.
अपने मन की गाँठ हर,
पंछी बनकर खोल..
गगन नाप ले पवन संग
सपनों में पर तोल.
कमसिन है लेकिन नहीं
संकल्पों में झोल.
आह भरे जग देखकर, या करता हो वाह.
झूले पर पेंगें भरे, मनुआ बेपरवाह.....
*
मौन करे कोशिश सदा,
कभी न पीटे ढोल.
जैसा है वैसा दिखे,
चाहे कोई न खोल..
बात कर रहा है खरी,
ज्ञात शब्द का मोल.
'सलिल'-धर में मीन बन,
चंचल करे किलोल.
कोमल मत समझो इसे, हँस सह ले हर दाह.
झूले पर पेंगें भरे, मनुआ बेपरवाह.....
*
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

रचना / प्रतिरचना : गीत- --रेखा राजवंशी, सिडनी/मुक्तिका: सीख लिया... संजीव 'सलिल'

रचना / प्रतिरचना : 
कोई रचना मन को रुचने पर उसके प्रभाव से आप भी कभी-कभी कुछ कह जाते हैं. ऐसी ही रचना / प्रतिरचना इस स्तम्भ के अंतर्गत आमंत्रित है.
रचना:
गीत-  --रेखा राजवंशी, सिडनी
> रातों की तन्हाई में अब दिल बहलाना सीख लिया
> अश्कों की बारिश में भी हंसना मुस्काना सीख लिया

> सावन की रिमझिम हो या फिर पतझड़ के वीराने हों
> टूटे ख़्वाब पुराने हों या फिर मदमस्त तराने हों
> जो भी मिले प्यार से सबको गले लगाना सीख लिया
> रातों की तन्हाई में अब दिल बहलाना सीख लिया

> अपने गम को क्या देखें जब दुनिया ही दीवानी है
> कितने मासूमों के घर में उलझी हुई कहानी है
> उजड़े हुए दयारों में इक दिया जलाना सीख लिया
> रातों की तन्हाई में अब दिल बहलाना सीख लिया

> तुम गिनते थे हीरे-मोती, या संपर्क अमीरों के
> बहुत बुरे लगते थे तुमको आंसू, दर्द फकीरों के
> उनके चिथड़ों पर मैंने पैबंद लगाना सीख लिया
> रातों की तन्हाई में अब दिल बहलाना सीख लिया
 ********
 > http://hindilovers-oz.blogspot.com/
प्रति रचना:
मुक्तिका -- संजीव 'सलिल'
*
मुक्तिका:
सीख लिया...
संजीव 'सलिल'
*
शोर-शराबे में दुनिया के, मौन घटाना सीख लिया.
खुदसे दूर रहे हम इतने, खुद को पाना सीख लिया...

जब तक औरों पर निर्भर थे, बोझा लगते थे सबको.
हुए आत्मनिर्भर तो, औरों ने अपनाना सीख लिया..

जब-जब दिल पर चोट लगी, तब-तब जीभरकर मुस्काये.
वीणा के तारों से हमने, गीत सुनाना सीख लिया..

संबंधों के अनुबंधों के, प्रतिबंधों ने सतत छला.
जब-जब नाते गये निभाए, किस्त चुकाना सीख लिया..

साथ तिमिर ने तनिक न छोड़ा, होली हो या दीवाली.
हमने तम की तन्हाई से, भोर उगाना सीख लिया..

जिसको चाहा वह वातायन से झाँके, दुनिया देखे.
हमने उसके दर्शन, हर कंकर में पाना सीख लिया..

डर-डर कर जीना छोड़ा तो, दर-दर ने बढ़ अपनाया.
भूल गया ठोकरें लगाना, गले लगाना सीख लिया..

नेह-नर्मदा में अवगाहन, कर जीवन का मंत्र मिला.
लहर-लहर से पल में मिटना, फिर बन जाना सीख लिया.. 

रेखा, वर्तुल, वृत्तों ने उलझाया, 'सलिल' बिंदु पाया.
हर उठाव में, हर झुकाव में, राह बनाना सीख लिया..

**********
http://divyanarmada.blogspot.com

फेस बुक पर सामूहिक दूरवार्ता group chat on Facebook :

फेस बुक पर सामूहिक दूरवार्ता  group chat on Facebook :

 
आपको 'छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं, कहीं तो मिलोगे, कभी तो मिलोगे हम पूछेंगे हाल' याद होगा. तब का तो नहीं पता, पर अब अंतरजाल ने इसे सच कर दिया है. आप दुनिया के किसी भी कोने में बैठे अपने साथियों से जब जी चाहे जीभरकर बतिया सकते हैं, वह भी बिना कोई अतिरिक्त खर्च किये.
- नहीं भाई, यह गप्प नहीं है.
- कैसे?
-आइये बतायें-
  • सबसे पहले तो आप अपना फेसबुक लेखा खोलें / फेसबुक अकाउंट पे लॉगिन करें.
  • फेसबुक के मुख्या पृष्ठ के बांयी ओर निम्न सूची दिखेगी.  
  • अब समूह बनायें / Create Group पर चटखा लगायें / क्लिक करें.
  • आपको निम्न पॉपअप विंडो दिखेगा. इसमें अपने समूह का नाम, समूह के सदस्यों के नाम लिखें. अब  समूह की गोपनीयता या निजता / ग्रुप प्राइवेसी पर चटखा लगाकर / क्लिक कर समूह का प्रकार तय कर सकते हैं. 

  • समूह की गोपनीयता / ग्रुप प्राइवेसी के तीन विकल्प हैं - 
  1. मुक्त / Open - इस श्रेणी के समूह में कोई भी व्यक्ति बिना आपकी अनुमति के जुड़ सकता है.
  2. बंद / Closed - इस श्रेणी के समूह में कोई भी व्यक्ति बिना आपकी अनुमति के नहीं जुड़ सकता है.
  3. गुप्त / Secret - आप अपने समूह को गुप्त रखना चाहते हैं तो इस पर चटखारा लगायें / क्लिक करें. 
  • अब आप Create  बटन पर  क्लिक कर अपना समूह बना लें और समूह के सदस्यों से जब-जितनी चाहें समूह चर्चा करें.चर्चा के लिए समूह के पृष्ठ पर बायीं तरफ दी गयी सूची / लिस्ट में चटखा लगायें. चैट बॉक्स में आपको आपके ग्रुप का एक अलग से चैट बॉक्स मिलेगा. उस पर चटखा लगा कर समूह वार्ता प्रारंभ कर दें.

  • यद् रखें जब आप खुद अपने फेसबुक के चैट बॉक्स में ऑफलाइन होंगे तो ग्रुप चैट बॉक्स में भी कोई भी सदस्य नहीं दिखेगा, चाहे वो ऑनलाइन हो या न हो. इसीलिए आप ऑनलाइन होने का समय तय कर सब सदस्यों को सूचित कर दें ताकि सब एक समय में अंतरजाल पर हों और दूरवर्त का आनंद ले सकें.
ध्यान रखें यदि आप आप किसी ऐसे व्यक्ति को अपने समूह में रखते हैं जिससे आप बात नहीं करना चाहते और जब आप किसी दोस्त से कोई निजी बात कर रहे होते हैं तब अगर वह व्यक्ति ऑनलाइन होगा तो वो आपकी सारी बातें पढ़ सकता है. इसके लिए बेहतर यही होगा कि अपने ख़ास ग्रुप को गुप्त या Secret ही रखा जाए...


आभार - महेश बारमाटे "माही"

राष्ट्रपति महोदया की ये हरकत शर्मनाक है - विवेक रस्तोगी



क्या भारत की राष्ट्रपति इतना गन्दा झूठ बोल सकती है ??
जी जरूर बोल सकती है क्योंकि वो कांग्रेस पार्टी से है ..

जी हा शायद आपको मेरी बात पर यकीन ना हो .. जिस पद पर राजेंद्र बाबु जैसे सीधे और सच्चे इन्सान थे आज उसी पद पर एक झूठी महिला बैठी है ..

दरअसल राष्ट्रपति के झूठ का खुलासा एक RTI से हुआ है ..
कुछ दिन पहले राष्ट्रपति महोदया गोवा की यात्रा पर थी ...राष्‍ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का गोवा बीच पर कुछ पत्रकारों ने फोटो खीच ली ..

राष्‍ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का गोवा बीच पर फोटा खींचना तीन पत्रकारों को मुश्किल में डाल गया. .. तुरंत राष्ट्रपति के परिजनों ने पुलिस में शिकायत कर दी .. चूँकि मामला राष्ट्रपति से जुड़ा था इसलिए आनन फानन में तीनो पत्रकारों को कई गंभीर धाराओ के तहत गिरफ्तार कर लिया गया ..
दूसरी तरफ इससे नाराज फोटो पत्रकार संघ गोवा ने इसे मीडिया की स्‍वतंत्रता पर हमला बताया है.

राष्‍ट्रपति सोमवार से चार दिनों की निजी यात्रा पर गोवा में हैं. फोटो पत्रकारों ने उनकी तस्‍वीर उस समय ली, जब वह बीच बैठकर धूप सेंक रही थीं. फोटो में उनके पास से तैराकी पोशाक में गुजर रहे एक विदेशी जोड़ा का फोटो भी आ गया. यह फोटो कई स्‍थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई. यह तस्‍वीर देखकर उनके परिजनों को काफी परेशानी हुई. इसके बाद मडगांव पुलिस ने तीन फोटो पत्रकारों गनदीप शेलदेकर, सोइरू कुमार पंत और अरविंद तेंगसे को तलब किया.

पुलिस ने बताया कि राष्‍ट्रपति के सुरक्षा अधिकारी ने हमसे पहले ही कहा था कि यह उनकी निजी यात्रा है और किसी को भी उनकी तस्‍वीर लेने की अनुमति नहीं होगी. इसके अनुसार हमने सभी को राष्‍ट्रपति और उनके घेरे से दूर रहने को कहा था.

फिर बाद में फोटो पत्रकार संघ गोवा के अध्‍यक्ष राजतिलक नायक ने एक RTI के तहत गोवा राजभवन और राष्ट्रपति भवन से निम्न सवाल पूछा :-

१- राष्ट्रपति के यात्रा का खर्च किसने वहन किया ?
२- यदि सरकार ने तो यात्रा पर कितना खर्च आया ?

जबाब बहुत ही शर्मनाक आया ...

राष्ट्रपति के यात्रा का पूरा खर्च गोवा राजभवन ने सरकारी पैसे से उठाया .. और उनकी यात्रा पर 38 लाख रूपये खर्च हुए ..
फिर कोर्ट भी अचंभित हो गयी .. कोर्ट ने कहा की यदि कोई व्यक्ति किसी भी सम्भिधानिक पद पर है और उसकी यात्रा का खर्च सरकारी पैसे से हो रही है तो उसकी यात्रा निजी नहीं मानी जा सकती .. चुकी प्रतिभा पाटिल भारत की राष्ट्रपति है और सरकारी खर्च से गोवा बीच पर थी तो उनका फोटो कोई भी खीच सकता है ..

अब राष्ट्रपति भवन ने इस मामले पर चुप्पी साध ली है ..

फोटो पत्रकार संघ गोवा के अध्‍यक्ष राजतिलक नायक ने इसे मीडिया की स्‍वतंत्रता पर हमला बताते हुए कहा कि फोटो पत्रकार केवल अपना काम कर रहे हैं. समुद्र तट सार्वजनिक जगह है और हमें तस्‍वीरें लेने का अधिकार है. राष्‍ट्रपति लोक सेवक हैं उन्‍हें तस्‍वीर लेने पर दिक्‍कत नहीं होनी चाहिए.

मेरी नज़र में यह एक शर्मनाक घटना है ...
                                                                                                       आभार: बुज्ज़  

नवगीत/दोहा गीत: पलाश... --संजीव वर्मा 'सलिल'



sanjiv verma 'salil'

नवगीत/दोहा गीत: 

पलाश... 

संजीव वर्मा 'सलिल'

*
बाधा-संकट हँसकर झेलो
मत हो कभी हताश.
वीराने में खिल मुस्काकर
कहता यही पलाश...
*
समझौते करिए नहीं,
तजें नहीं सिद्धांत.
सब उसके सेवक सखे!
जो है सबका कांत..
परिवर्तन ही ज़िंदगी,
मत हो जड़-उद्भ्रांत.
आपद संकट में रहो-
सदा संतुलित-शांत..

शिवा चेतना रहित बने शिव
केवल जड़-शव लाश.
वीराने में खिल मुस्काकर
कहता यही पलाश...
*
किंशुक कुसुम तप्त अंगारा,
सहता उर की आग.
टेसू संत तपस्यारत हो
गाता होरी-फाग..
राग-विराग समान इसे हैं-
कहता जग से जाग.
पद-बल सम्मुख शीश झुका मत
रण को छोड़ न भाग..
जोड़-घटाना छोड़,
काम कर ऊँची रखना पाग..
वीराने में खिल मुस्काकर
कहता यही पलाश...
****

शुक्रवार, 24 जून 2011

दोहा सलिला : मन भरकर करिए बहस संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला :
मन भरकर करिए बहस
संजीव 'सलिल'
*
मन भरकर करिए बहस, 'सलिल' बात-बेबात.
जीत न मानें जीतकर, हार न मानें मात..

मधुर-तिक्त, सच-झूठ या, भला-बुरा दिन रात.
कुछ न कुछ तो बोलिए, मौन न रहिये तात..

हर एक क्रिया-कलाप पर, कर लेती सरकार.
सिर्फ बोलना ही रहा, कर-विमुक्त व्यापार..

नेता, अफसर, बीबियाँ, शासन करते बोल.
व्यापारी नित लूटते, वाणी में रस घोल..

परनिंदा सुख बिन लगे, सारा जीवन व्यर्थ.
निंदा रस बिन काव्य में, मिलता कोई न अर्थ..

द्रुपदसुता, मंथरा की, वाणी जग-विख्यात.
शांति भंग पल में करे, लगे दिवस भी रात..

सरहद पर तैनात हो, महिलाओं की फ़ौज.
सुन चख-चख दुश्मन भगे, आप कीजिये मौज..

सुने ना सुने छात्र पर, शिक्षक बोलें रोज.
क्या कुछ गया दिमाग में, हो इस पर कुछ खोज..

पंडित, मुल्ला, पादरी, बोल-बोल लें लूट.
चढ़ा भेंट लुटता भगत, सुनकर बातें झूठ..

वाणी से होती नहीं, अधिक शस्त्र में धार.
शस्त्र काटता तन- फटे, वाणी से मन यार..

बोल-बोल थकती नहीं, किंचित एक जुबान.
सुन-सुन थक जाते 'सलिल', गुमसुम दोनों कान..

*************

काव्य का रचना शास्त्र : १ ध्वनि कविता की जान है... - आचार्य संजीव 'सलिल'

काव्य का रचना शास्त्र : १

ध्वनि कविता की जान है...

- आचार्य संजीव 'सलिल'



ध्वनि कविता की जान है, भाव श्वास-प्रश्वास.
अक्षर तन, अभिव्यक्ति मन, छंद वेश-विन्यास..

                 अपने उद्भव के साथ ही मनुष्य को प्रकृति और पशुओं से निरंतर संघर्ष करना पड़ा. सुन्दर, मोहक, रमणीय प्राकृतिक दृश्य उसे रोमांचित, मुग्ध और उल्लसित करते थे. प्रकृति की रहस्यमय-भयानक घटनाएँ उसे डराती थीं. बलवान हिंस्र पशुओं से भयभीत होकर वह व्याकुल हो उठता था. विडम्बना यह कि उसका शारीरिक बल और शक्तियाँ बहुत कम थीं. अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उसके पास देखे-सुने को समझने और समझाने की बेहतर बुद्धि थी. बाह्य तथा आतंरिक संघर्षों में अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने और अन्यों की अभिव्यक्ति को ग्रहण करने की शक्ति का उत्तरोत्तर विकास कर मनुष्य सर्वजयी बन सका. 

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है। आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है। आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप म.प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं।
                अनुभूतियों को अभिव्यक्त और संप्रेषित करने के लिए मनुष्य ने सहारा लिया ध्वनि का. वह आँधियों, तूफानों, मूसलाधार बरसात, भूकंप, समुद्र की लहरों, शेर की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ आदि से सहमकर छिपता फिरता. प्रकृति का रौद्र रूप उसे डराता. मंद समीरण, शीतल फुहार, कोयल की कूक, गगन और सागर का विस्तार उसमें दिगंत तक जाने की अभिलाषा पैदा करते. उल्लसित-उत्साहित मनुष्य कलकल निनाद की तरह किलकते हुए अन्य मनुष्यों को उत्साहित करता. अनुभूति को अभिव्यक्त कर अपने मन के भावों को विचार का रूप देने में ध्वनि की तीक्ष्णता, मधुरता, लय, गति की तीव्रता-मंदता, आवृत्ति, लालित्य-रुक्षता आदि उसकी सहायक हुईं. अपनी अभिव्यक्ति को शुद्ध, समर्थ तथा सबको समझ आने योग्य बनाना उसकी प्राथमिक आवश्यकता थी.

          सकल सृष्टि का हित करे, कालजयी आदित्य.
            जो सबके हित हेतु हो, अमर वही साहित्य.

               भावनाओं के आवेग को अभिव्यक्त करने का यह प्रयास ही कला के रूप में विकसित होता हुआ 'साहित्य' के रूप में प्रस्फुटित हुआ. सबके हित की यह मूल भावना 'हितेन सहितं' ही साहित्य और असाहित्य के बीच की सीमा रेखा है जिसके निकष पर किसी रचना को परखा जाना चाहिए. सनातन भारतीय चिंतन में 'सत्य-शिव-सुन्दर' की कसौटी पर खरी कला को ही मान्यता देने के पीछे भी यही भावना है. 'शिव' अर्थात 'सर्व कल्याणकारी, 'कला कला के लिए' का पाश्चात्य सिद्धांत पूर्व को स्वीकार नहीं हुआ. साहित्य नर्मदा का कालजयी प्रवाह 'नर्मं ददाति इति नर्मदा' अर्थात 'जो सबको आनंद दे, वही नर्मदा' को ही आदर्श मानकर सतत सृजन पथ पर बढ़ता रहा.

                 मानवीय अभिव्यक्ति के शास्त्र 'साहित्य' को पश्चिम में 'पुस्तकों का समुच्चय', 'संचित ज्ञान का भंडार', 'जीवन की व्याख्या', आदि कहा गया है. भारत में स्थूल इन्द्रियजन्य अनुभव के स्थान पर अन्तरंग आत्मिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को अधिक महत्व दिया गया. यह अंतर साहित्य को मस्तिष्क और ह्रदय से उद्भूत मानने का है. आप स्वयं भी अनुभव करेंगे के बौद्धिक-तार्किक कथ्य की तुलना में सरस-मर्मस्पर्शी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है. विशेषकर काव्य (गीति या पद्य) में तो भावनाओं का ही साम्राज्य होता है. 

होता नहीं दिमाग से, जो संचालित मीत. 

दिल की सुन दिल से जुड़े, पा दिलवर की प्रीत..


साध्य आत्म-आनंद है :

                   काव्य का उद्देश्य सर्व कल्याण के साथ ही निजानंद भी मान्य है. भावानुभूति या रसानुभूति काव्य की आत्मा है किन्तु मनोरंजन मात्र ही साहित्य या काव्य का लक्ष्य या ध्येय नहीं है. आजकल दूरदर्शन पर आ रहे कार्यक्रम सिर्फ मनोरंजन पर केन्द्रित होने के कारण समाज को कुछ दे नहीं पा रहे जबकि साहित्य का सृजन ही समाज को कुछ देने के लिये किया जाता है. 

जन-जन का आनंद जब, बने आत्म-आनंद.

कल-कल सलिल-निनाद सम, तभी गूँजते छंद..

काव्य के तत्व :

बुद्धि भाव कल्पना कला, शब्द काव्य के तत्व.

तत्व न हों तो काव्य का, खो जाता है स्वत्व..

                   बुद्धि या ज्ञान तत्व काव्य को ग्रहणीय बनाता है. सत-असत, ग्राह्य-अग्राह्य, शिव-अशिव, सुन्दर-असुंदर, उपयोगी-अनुपयोगी में भेद तथा उपयुक्त का चयन बुद्धि तत्व के बिना संभव नहीं. कृति को विकृति न होने देकर सुकृति बनाने में यही तत्व प्रभावी होता है. 

                भाव तत्व को राग तत्व या रस तत्व भी कहा जाता है. भाव की तीव्रता ही काव्य को हृद्स्पर्शी बनाती है. संवेदनशीलता तथा सहृदयता ही रचनाकार के ह्रदय से पाठक तक रस-गंगा बहाती है. 

                    कल्पना लौकिक को अलौकिक और अलौकिक को लौकिक बनाती है. रचनाकार के ह्रदय-पटल पर बाह्य जगत तथा अंतर्जगत में हुए अनुभव अपनी छाप छोड़ते हैं. साहित्य सृजन के समय अवचेतन में संग्रहित पूर्वानुभूत संस्कारों का चित्रण कल्पना शक्ति से ही संभव होता है. रचनाकार अपने अनुभूत तथ्य को यथावत कथ्य नहीं बनता. वह जाने-अनजाने सच=झूट का ऐसा मिश्रण करता है जो सत्यता का आभास कराता है. 

                कला तत्त्व को शैली भी कह सकते हैं. किसी एक अनुभव को अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से व्यक्त करते हैं. हर रचनाकार का किसी बात को कहने का खास तरीके को उसकी शैली कहा जाता है. कला तत्व ही 'शिवता' का वाहक होता है. कला असुंदर को भी सुन्दर बना देती है.

                 शब्द को कला तत्व में समाविष्ट किया जा सकता है किन्तु यह अपने आपमें एक अलग तत्व है. भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम शब्द ही होता है. रचनाकार समुचित शब्द का चयन कर पाठक को कथ्य से तादात्म्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है.

साहित्य के रूप :

दिल-दिमाग की कशमकश, भावों का व्यापार.

बनता है साहित्य की, रचना का आधार.. 

                  बुद्धि तत्त्व की प्रधानतावाला बोधात्मक साहित्य ज्ञान-वृद्धि में सहायक होता है. हृदय तत्त्व को प्रमुखता देनेवाला रागात्मक साहित्य पशुत्व से देवत्व की ओर जाना की प्रेरणा देता है. अमर साहित्यकार डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ऐसे साहित्य को 'रचनात्मक साहित्य' कहा है. 

साहित्य शिल्पीसादर समर्पित

            यह लेख श्रंखला मुझमें भाषा और साहित्य की रूचि जगानेवाली पूजनीय माता जी व प्रख्यात- आशु कवयित्री स्व. श्रीमति शांति देवी वर्मा की पुण्य-स्मृति को समर्पित  है। 
                                                -संजीव 

 लक्ष्य और लक्षण ग्रन्थ 

                    रचनात्मक या रागात्मक साहित्य के दो भेद लक्ष्य ग्रन्थ और लक्षण ग्रन्थ हैं साहित्यकार का उद्देश्य अलौकिक आनंद की सृष्टि करना होता है जिसमें रसमग्न होकर पाठक रचना के कथ्य, घटनाक्रम, पात्रों और सन्देश के साथ अभिन्न हो सके. 

             लक्ष्य ग्रन्थ में रचनाकार नूतन भावः लोक की सृष्टि करता है जिसके गुण-दोष विवेचन के लिये व्यापक अध्ययन-मनन पश्चात् कुछ लक्षण और नियम निर्धारित किये गये हैं लक्ष्य ग्रंथों के आकलन अथवा मूल्यांकन (गुण-दोष विवेचन) संबन्धी साहित्य लक्षण ग्रन्थ होंगे. लक्ष्य ग्रन्थ साहित्य का भावः पक्ष हैं तो लक्षण ग्रन्थ विचार पक्ष. काव्य के लक्षणों, नियमों, रस, भाव, अलंकार, गुण-दोष आदि का विवेचन 'साहित्य शास्त्र' के अंतर्गत आता है 'काव्य का रचना शास्त्र' विषय भी 'साहित्य शास्त्र' का अंग है. 

साहित्य के रूप -- 
१. लक्ष्य ग्रन्थ : (क) दृश्य काव्य, (ख) श्रव्य काव्य. 
२. लक्षण ग्रन्थ : (क) समीक्षा, (ख) साहित्य शास्त्र.
                                                                                                                                                    क्रमश: .....
                                                                                                                                       (आभार : साहित्य शिल्पी, मंगलवार, १० मार्च २००९) 

**************

मुक्तिका: आँख नभ पर जमी --- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

आँख नभ पर जमी

संजीव 'सलिल'
*
आँख नभ पर जमी तो जमी रह गई.
साँस भू की थमी तो थमी रह गई.
*
सुब्ह सूरज उगा, दोपहर में तपा.
साँझ ढलकर, निशा में नमी रह गई..
*
खेत, खलिहान, पनघट न चौपाल है.
गाँव में शेष अब, मातमी रह गई..
*
व्यस्त हैं वे बहुत, दम न ले पा रहे.
ध्यान का केंद्र केवल रमी रह गयी..
*
रंग पश्चिम का पूरब पे ऐसा चढ़ा.
असलियत छिप गई है, डमी रह गई..
*
जो कमाया गुमा, जो गँवाया मिला.
कुछ न कुछ ज़िन्दगी में, कमी रह गई..
*
माँ न मैया न माता, कहीं दिख रही.
बदनसीबी ही शिशु की, ममी रह गयी..
*
आँख में आँख डाले खुशी ना मिली.
हाथ में हाथ लेकर गमी रह गयी..
*
प्रीति भय से हुई, याद यम रह गये.
संग यादों के भी, ना यमी रह गयी..
*
दस विकारों सहित, दशहरा जब मना.
मूक ही देखती तब शमी रह गयी..
*
तर्क से आस्था ने, ये पूछा 'सलिल'.
आज छलने को क्या बस हमी रह गयी??
 *************


Acharya Sanjiv Salil

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एक कविता: क्रांति कैसे आयेगी? संजीव 'सलिल'

एक कविता:
क्रांति कैसे आयेगी?
संजीव 'सलिल'
*
भ्रान्ति है यह पूछना कि
क्रांति कैसे आयेगी?
क्रांति खुद आती नहीं है.
क्रांति लाते
सिर कटाकर वे
जिन्हें तुम
सिरफिरा कहते हुए
थकते नहीं हो.
क्रांति लाते
जां हथेली पर लिये वे
देख जिनको
भागते हो तुम
कभी रुकते नहीं हो.
क्रांति लाते
आँख में सपना लिये वे
सामने जिनके अदब से
तुम कभी झुकते नहीं हो.
*
शब्द-वीरों ने हमेशा
क्रांति की बातें करीं
भाषण दिये पर
क्रांति से रह दूर
अपना स्वार्थ साधा.
सच कहूँ तो
क्रांति के पथ में हमेशा
निज हितों का ध्यान रखता
यही तबका बना बाधा.
*
कौन हो तुम?
चाहते क्या?
आकलन खुद का करो
निष्पक्ष रहकर.
निज हितों का
कर न सकते
त्याग यदि तो
क्रांति की बातें न कर
तुम होंठ सी लो.
अन्यथा बातें तुम्हारी
मानकर सच
जां गँवा बैठेंगे
बदलाव के चाहक
जवां बच्चे अकारण.
*
Acharya Sanjiv Salil

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गुरुवार, 23 जून 2011

विशेष लेख: चित्रपटीय गीतों में अनुप्रास अलंकार की छटा: -- नवीन चतुर्वेदी

विशेष लेख:
चित्रपटीय गीतों में अनुप्रास अलंकार की छटा:
 
नवीन चतुर्वेदी 
 *
'अनु' तथा 'प्रास' इन दो शब्दों के मेल से बनाता है शब्द अनुप्रास | 'अनु' का अर्थ है बार-बार और 'प्रास' का अर्थ है वर्ण / अक्षर | इस प्रकार अनुप्रास का शाब्दिक अर्थ हुआ कि जब एक अक्षर बार बार आए तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है | बहुचर्चित पंक्ति ही काफी है अनुप्रास अलंकार को समझने के लिए:-

चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चाँदनी चौक में चाँदी की चम्मच से चाँदनी रात में चटनी चटाई 

इस पंक्ति में 'च' अक्षर के बार बार आने से यहाँ अनुप्रास अलंकार हुआ |

अनुप्रास अलंकार के भी कई भेद हैं, यथा:-

[१] छेकानुप्रास 
[२] वृत्यानुप्रास
[३] लाटानुप्रास
[४] अंत्यानुप्रास 
[५] श्रुत्यानुप्रास 

अब इन को समझते हैं एक एक कर |

छेकानुप्रास

किसी पंक्ति में एक से अधिक अक्षरों का बार बार आना 

उदाहरण :-
नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए
बाकी जो बचा वो काले चोर ले गए 

हिन्दी फिल्म के इस गीत में 'न' - 'र' - 'म' तथा 'क' अक्षरों की बारंबारता के लिए छेकानुप्रास अलंकार का आभास होता है|


वृत्यानुप्रास

किसी पंक्ति में एक अक्षर का बार बार आना 

उदाहरण :-
चन्दन सा बदन, चंचल चितवन 

हिन्दी फिल्म के इस गीत में 'च' अक्षर  की बारंबारता के लिए वृत्यानुप्रास अलंकार का आभास होता है|

लाटानुप्रास

किसी पंक्ति में एक शब्द का बार बार आना 

उदाहरण :-

आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ 

हिन्दी फिल्म के इस गीत में 'आदमी' शब्द की बारंबारता के लिए लाटानुप्रास अलंकार का आभास होता है|


अंत्यानुप्रास

सीधे सादे शब्दों में कहा जाये तो पंक्ति के अंत में अक्षर / अक्षरों की समानता को अंत्यानुप्रास कहते हैं| दूसरे शब्दों में कहें तो छन्द बद्ध सभी कविताओं में तुक / काफिये के साथ अंत्यानुप्रास पाया जाता है| इस का महत्व संस्कृत के छंदों में अधिक प्रासंगिक है| यथा :-

श्रीमदभवतगीता का सब से पहला श्लोक 

धर्मक्षेत्रे, कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:|
मामका: पाण्डवाश्चैव, किमकुर्वत संजय||

आप देखें छन्द बद्ध होने के बावजूद इस में अंत में तुक / काफिया नहीं है| अब संस्कृत के एक और श्लोक को देखते हैं:

नमामि शमीशान निर्वाण रूपं 
विभुं व्यापकं ब्रम्ह्वेद स्वरूपं 
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं 
चिदाकाश माकाश वासं भजेहं 

तो अब आप को स्पष्ट हो गया होगा कि अंत्यानुप्रास का महत्व कब और क्यों प्रासंगिक है| आज कल तो छन्द बद्ध रचनाएँ तुकांत होने के कारण अंत्यानुप्रास युक्त होती ही हैं| गज़लें तो सारी की सारी अंत्यानुप्रास के साथ ही हुईं [गैर मुरद्दफ वाली गज़लें छोड़ कर]| 

कबीरा खड़ा बजार में मांगे सबकी खैर|
ना काहू से दोसती, ना काहू से बैर||
ऊपर के दोहे की दोनों पंक्तियों के अंत में 'र' अक्षर आने के कारण अंत्यानुप्रास अलंकार हुआ| अंत्यानुप्रास के कुछ और उदाहरण :- 

आए हो मेरी ज़िंदगी में तुम बहार बन के|
मेरे दिल में यूं ही रहना, तुम प्यार प्यार बन के||

चौदहवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो|
जो भी हो तुम ख़ुदा की क़सम लाज़वाब हो|

संस्कृत श्लोकों के अलावा आधुनिक कविता में अंत्यानुप्रास की प्रासंगिकता उल्लेखनीय हो जाती है, यथा :-

ऑस की बूंदें
हासिल हैं सभी को 
बिना किसी भेद भाव के 
बराबर 
निरंतर 
यहाँ पर 
वहाँ पर 

श्रुत्यानुप्रास

इसे समझने से पहले समझते हैं कि एक वर्ग के अक्षर कौन से होते हैं| जैसे क-ख-ग-ग एक वर्ग के अक्षर हुए| च-छ-ज-झ एक वर्ग के अक्षर हुए| ट-ठ-ड-ढ एक वर्ग के अक्षर हुए| 

जब किसी एक वर्ग के अक्षर बार बार आयें तो वहाँ श्रुत्यानुप्रास अलंकार होता है|

उदाहरण :-
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे
खिलता गुलाब, जैसे शायर का ख़्वाब 
हिन्दी फिल्म के इस गीत में एक ही वर्ग के कई अक्षर जैसे कि 'क' 'ख' 'ग' अक्षरों के आने से श्रुत्यानुप्रास अलंकार का आभास होता है| एक और उदाहरण:-

दीदी तेरा देवर दीवाना - 'द' - 'त' व 'न' एक ही वर्ग से हैं इसीलिए यहाँ श्रुत्यानुप्रास अलंकार हुआ|


आशा करते हैं कि हिन्दी फिल्मों के गानों के माध्यम से अनुप्रास अलंकार के विभिन्न रूपों की ये व्याख्या आप को पसंद

नवगीत: करो बुवाई... ----संजीव 'सलिल'

नवगीत:
करो बुवाई...
संजीव 'सलिल'
*
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.
मँहगाई जी-जाल बड़ी है.
सच मुश्किल की आई घड़ी है.
नहीं पीर की कोई जडी है.
अब कोशिश की
हो पहुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
उगा खरपतवार कंटीला.
महका महुआ मदिर नशीला.
हुआ भोथरा कोशिश-कीला.
श्रम से कर धरती को गीला.
मिलकर गले
हँसो सब भाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
मत अपनी धरती को भूलो.
जड़ें जमीन हों तो नभ छूलो.
स्नेह-'सलिल' ले-देकर फूलो.
पेंगें भर-भर झूला झूलो.
घर-घर चैती
पड़े सुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...

बुधवार, 22 जून 2011

हास्य कविता: मेरी नरक यात्रा --धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन

हास्य कविता:
मेरी नरक यात्रा 
धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन
*
एक रात मैं बिस्तर पर करवटें बदल रहा होता हूँ
तभी दो यमदूत आकर मुझे बतलाते हैं
‘चल उठ जा बेटे, तुझे यमराज बुलाते हैं’।
मैं तुरंत बोल पड़ता हूँ,
‘यारों मुझसे ऐसी क्या गलती हो गई है?
अभी तो मेरी उमर केवल तीस साल ही हुई है,
लोग कहते हैं मेरी किस्मत में दो शादियाँ लिखी गई हैं
और अभी तो पहली भी नई नई हुई है।
देखो अगर दस-बीस हजार में काम बनता हो तो बना लो,
और किसी को ले जाना इतना ही जरूरी हो,
तो शर्मा जी को उठा लो।’
वो बोले, ‘हमें पुलिस समझ रक्खा है क्या,
कि हम बेकसूरों को उठा ले जायेंगें,
और यमराज को,
अपने देश का अन्धा कानून मत समझ,
कि वो निर्दोष को भी फाँसी पे लटकायेंगें।”
मेरे बहुत गिड़गिड़ाने के बाद भी,
वो मुझे अपने साथ ले जाते हैं;
और थोड़ी देर बाद,
यमराज मुझे अपने सामने नजर आते हैं।
मुझे देखकर,
यमराज थोड़ा सा कसमसाते हैं और कहते हैं,
‘कोई एक पूण्य तो बता दे जो तूने किया है,
तेरे पापों की गणना करने में,
मेरे सुपर कम्यूटर को भी दस मिनट लगा है।’
मैं बोला, ‘क्या बात कर रहे हैं सर,
बिजली बनाना भी तो एक पूण्य का काम है
यमलोक के तैंतीस प्रतिशत बल्बों पर हमारा ही नाम है।’
यह सुनकर यमराज बोले, ‘हुम्म,
चल अच्छा तू ही बता दे
तू स्वर्ग जाएगा या नर्क जाएगा
मैं बोला प्रभो पहले ये बताइए कि ऐश, कैटरीना, बिपासा एटसेट्रा कहाँ जाएँगी
यमराज बोले, “बेटा, स्वर्ग में नारियों के लिए ५०% का आरक्षण है
उसका लाभ उठाते हुए वो स्वर्ग में जगह पाएँगीं।
अबे सुन,
सुना है तू कविताएँ भी लिखता है,
चल आज तो थोड़ा पूण्य कमा ले,
किसी ने आज तक मेरी स्तुति नहीं लिखी,
तू तो मेरी स्तुति रचकर मुझे सुना ले।”
फिर मैं शुरू करता हूँ यमराज को मक्खन लगाना,
और उनकी स्तुति में ये कविता सुनाना,
“इन्द्र जिमि जंभ पर, बाणव सुअंभ पर,
रावण सदंभ पर रघुकुलराज हैं,
तेज तम अंश पर, कान्ह जिमि कंश पर,
त्यों भैंसे की पीठ पर, देखो यमराज हैं।”
स्तुति सुनकर यमराज थोड़ा सा शर्माते हैं,
और मेरे पास आकर मुझे बतलाते हैं,
“यार ये तो मजाक चल रहा था,
अभी तेरी आयु पूरी नहीं हुई है,
तुझे हम यहाँ इसलिये लाए हैं, क्योंकि,
हमें एक यंग एण्ड डायनेमिक,
सिविल इंजीनियर की जरूरत आ पड़ी है।”
मैं बोला, “प्रभो मेरे डिपार्टमेन्ट में एक से एक,
यंग, डायनेमिक, इंटेलिजेंट, स्मार्ट, इक्सपीरिएंस्ड
सिविल इंजीनियर्स खड़े हैं।
आप हाथ मुँह धोकर मेरे ही पीछे क्यों पड़े हैं।”
वो बोले, “वत्स,
तेरा रेकमेण्डेसन लेटर बहुत ऊपर से आया है,
तुझे भगवान राम की स्पेशल रिक्वेस्ट पर बुलवाया है।”
मैं बोला, “अगर मैं हाइली रेकमेन्डेड हूँ,
तो मेरा और टाइम वेस्ट मत कीजिए,
औ मुझे यहाँ किसलिए बुलाया है फटाफट बता दीजिए।”
यह सुनकर यमराज बोले,
“क्या बताएँ वत्स,
कलियुग में पाप बहुत बढ़ते जा रहे हैं,
पिछले चालीस-पचास सालों से,
लोग नर्क में भीड़ बढ़ा रहे हैं,
दरअसल हम नर्क को,
थोड़ा एक्सपैंड करके उसकी कैपेसिटी बढ़ाना चाहते हैं,
इसलिए स्वर्ग का एक पार्ट,
डिमालिश करके वहाँ नर्क बनाना चाहते हैं।”
मैं बोला प्रभो
“इसमें सिविल इंजीनियर की क्या जरूरत है,
विश्व हिन्दू परिषद के कारसेवकों को बुला लीजिए,
या फिर लालू प्रसाद यादव को,
स्वर्ग का मुख्यमंत्री बना दीजिए,
मैं सिविल इंजीनियर हूँ,
मैं स्वर्ग को नर्क कैसे बना सकता हूँ,
हाँ अगर नर्क को स्वर्ग बनाना हो,
तो मैं अपनी सारी जिंदगी लगा सकता हूँ।”
मैं आगे बोला,
“प्रभो नर्क में सारे धर्मों के लोग आते होंगे,
क्या वो नर्क में,
पाकिस्तान बनाने की मांग नहीं उठाते होंगे।”
तो यमराज बोले, “वत्स पहले तो ऐसा नहीं था,
पर जब से आपके कुछ नेता नर्क में आए हैं,
अलग अलग धर्म बहुल क्षेत्रों को मिलाकर,
पाकनर्किस्तान बनाने की मांग लगातार उठाये हैं,
पर उनको ये पता नहीं है,
कि हम पाकनर्किस्तान कभी नहीं बनायेंगे,
नर्क तो पहले से ही इतना गन्दा है,
हम उसका स्टैण्डर्ड और नहीं गिराएँगे,
और ऐसा नर्क बनाने की जरूरत भी क्या है,
ऐसा नर्क तो हिन्दुस्तान की बगल में,
पहले से ही बना हुआ है।”
वो ये बता ही रहे थे कि तभी,
प्रभो श्री राम दौड़ते हुए आते हैं,
और आकर मेरे सामने खड़े हो जाते हैं,
मैं बोला, “प्रभो जब आपको ही आना था
तो धरती पर ही आ जाते,
मुझे यमलोक तो न बुलाते
और जब आ ही रहे थे, तो अकेले क्यों आये,
माता सीता को साथ क्यों नहीं लाए,
लव-कुश भी नहीं आये मैं गले किसे लगाऊँगा,
और लक्ष्मण जी व हनुमान जी को,
क्या मैं बुलाने जाऊँगा।”
यह सुनकर श्री राम बोले,
“मजाक अच्छा कर लेते हैं कविवर,
पर मेरी समस्या होती जा रही है बद से बदतर,
विश्व हिन्दू परिषद वाले मेरे पीछे पड़े हुए हैं,
मन्दिर वहीं बनायेंगे के सड़े हुए नारे पे अड़े हुए हैं,
पर वो ये नहीं समझते,
कि यदि हम मन्दिर वहाँ बनवायेंगे,
तो उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा,
मगर विश्व भर में लाखों बेकसूर मारे जाएँगे,
यार तुम तो कवि हो लगे हाथों कोई कल्पना कर ड़ालो,
और मेरी इस पर्वताकार समस्या को प्लीज हल कर डालो।”
मैं बोला, “प्रभो बस इतनी सी बात,
वहाँ एक सर्वधर्म पूजास्थल बनवा दीजिए,
और उसकी प्लानिंग मुझसे करा लीजिए,
एक बहुत बड़ी सफेद संगमरमर की,
मल्टीस्टोरी बिल्डिंग वहाँ बनवाइये,
और दुनिया में जितने भी धर्म हैं,
उतने कमरे उसमें लगवाइये,
और कमरों में क्या क्या हो ध्यान से सुन लीजिए,
किसी कमरे में बुद्ध मुस्कुराते हुए खड़े हों,
तो किसी कमरे में ईशा सूली पे चढ़े हों,
किसी में महावीर ध्यान लगा रहे हों,
तो किसी में खड़े नानक मुस्कुरा रहे हों,
किसी में पैगम्बर खड़े मन में कुछ गुन रहे हों,
तो किसी में कबीर कपड़े बुन रहे हों,
और जहाँ आप जन्मे थे वहाँ एक बड़ा सा हाल हो,
बहुत ही शान्त, स्वच्छ और सुरम्य वहाँ का माहौल हो,
बीच में एक झूले पर,
आपके बचपन की मनमोहिनी मूरत हो,
जो भी देखे देखता ही रह जाये,
कुछ ऐसी आपकी सूरत हो,
सारे धर्मों के हेड आफ डिपार्मेन्टस,
डीनस और डायरेक्टरस की मूर्तियाँ वहाँ पर लगी हों,
और जितनी मूर्तियाँ हों,
उतनी ही डोरियाँ आपके झूले से निकली हों,
सब के सब मिलकर आपको झूला झुला रहे हों,
और लोरी गा-गाकर सुला रहे हों,
उस मन्दिर में लोग कुछ लेकर नहीं,
बल्कि खाली हाथ जाएँ,
उसे देखें, सोचें, समझें, हँसे, रोयें
और शान्ति से वापस चले आएँ,
पर प्रभो मेरे देश के नेता अगर आपको ऐसा करने देंगें,
तो अगले लोकसभा चुनावों का मुद्दा वो कहाँ खोजेंगे।”
इतना सुनकर भगवन बोले,
“वत्स आपका आइडिया तो अच्छा है,
अतः अपने इस आइडिये के लिये,
कोई वरदान माँग लीजिए।”
मैं बोला, “प्रभो,
मेरी मात्र पाँच सौ पचपन पृष्ठों की एक कविता सुन लीजिए।”
फिर भगवन के ‘तथास्तु’ कहने पर,
मैंने सुनाना शुरु किया,
“कुर्सियाँ आकाश में उड़ने लगी हैं,
गायें चारागाह से मुड़ने लगी हैं,
लड़कियाँ बेबात के रोने लगी हैं,
भैंसें चारा खाके अब सोने लगी हैं,
कल मैंने था खा लिया इक मीठा पान,
देख लो हैं पक गये खेतों में धान।”
और तभी भगवान हो जाते हैं अन्तर्धान,
और होती है आकाशवाणी, “ये आकाशवाणी का विष्णुलोक केन्द्र है,
आपको सूचित किया जाता है, कि आपको दिया गया वरदान वापस ले लिया गया है,
और आपसे ये अनुरोध किया जाता है कि जितनी जल्दी हो सके यमलोक से निकल जाइये,
और दुबारा अपनी सूरत यहाँ मत दिखलाइये।”
यह सुनकर मैं यमराज से बोला, “मुझे वापस पृथ्वीलोक पहुँचा दीजिए।”
यमराज बोले, “कविवर, अपनी आँखें बन्द करके दो सेकेंड बाद खोल लीजिए।”
मैं आँखें खोलता हूँ तो देखता हूँ कि सूरज निकल आया है,
मेरे कमरे में कहीं धूप कहीं छाया है,
धड़ी सुबह के साढ़े आठ बजा रही है,
और जीएम साहब प्रोजेक्ट में ही हैं ये याद दिला रही हैं,
मैं सर झटककर पूरी तरह जागता हूँ,
और तौलिया लेकर बाथरूम की तरफ भागता हूँ,
रास्ते में मेरी समझ में आता है कि मैं सपना देख रहा था
और इतने बड़े-बड़े लोगों के सामने इतनी लम्बी-लम्बी फेंक रहा था।

********

मंगलवार, 21 जून 2011

सामयिक रचना:
बहुत कुछ बाकी अभी है...
संजीव 'सलिल'
*
बहुत कुछ बाकी अभी है 
मत हों आप निराश.
उगता है सूरज तभी
जब हो उषा हताश.
किरण आशा की कई हैं
जो हैं जलती दीप.
जैसे मोती पालती 
निज गर्भ में चुप सीप.
*
आइये देखें झलक 
है जबलपुर की बात
शहर बावन ताल का
इतिहास में विख्यात..
पुर गए कुछ आज लेकिन
जुटे हैं फिर लोग.
अब अधिक पुरने न देंगे
मिटाना है रोग.
रोज आते लोग 
खुद ही उठाते कचरा.
नीर में या तीर पर
जब जो मिला बिखरा.
भास्कर ने एक
दूजा पत्रिका ने गोद
लिया है तालाब
जनगण को मिला आमोद.
*   
झलक देखें दूसरी
यह नर्मदा का तीर.
गन्दगी है यहाँ भी
भक्तों को है यह पीर.
नहाते हैं भक्त ही,
धो रहे कपड़े भी.
चढ़ाते हैं फूल-दीपक
करें झगड़े भी.
बैठकें की, बात की,
समझाइशें भी दीं.
चित्र-कविता पाठकर
नुमाइशें भी की.
अंतत: कुछ असर
हमको दिख रहा है आज.
जो चढ़ाते फूल थे वे
लाज करते आज.
संत, नेता, स्त्रियाँ भी
करें कचरा दूर.
ज्यों बढ़ाकर हाथ आगे
बढ़ रहा हो सूर.
*
इसलिए कहता:
बहुत कुछ अभी भी है शेष
आप लें संकल्प,
बदलेगा तभी परिवेश.
*

रविवार, 19 जून 2011

झांसी की रानी वीरांगना लक्ष्मी बाई का असली चित्र:

झांसी की रानी वीरांगना लक्ष्मी बाई का असली चित्र:

१७ जून को झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की पुण्य तिथि है।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह एकमात्र फोटो है, जिसे कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन द्वारा 1850 में ही खींचा गया था। यह फोटो अहमदाबाद निवासी चित्रकार अमित अंबालाल के संग्रह में मौजूद है।

प्राचीन भारतीय विज्ञानं 

अगस्त्य संहिता का विद्युत्‌ शास्त्र

 -- सुरेश सोनी


राव साहब कृष्णाजी वझे ने १८९१ में पूना से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की। भारत में विज्ञान संबंधी ग्रंथों की खोज के दौरान उन्हें उज्जैन में दामोदर त्र्यम्बक जोशी के पास अगस्त्य संहिता के कुछ पन्ने मिले। यह शक संवत्‌ १५५० के करीब के थे। आगे चलकर इस संहिता के पन्नों में उल्लिखित वर्णन को पढ़कर नागपुर में संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डा। एम.सी. सहस्रबुद्धे को आभास हुआ कि यह वर्णन डेनियल सेल से मिलता-जुलता है। अत: उन्होंने नागपुर में इंजीनियरिंग के प्राध्यापक श्री पी.पी. होले को वह दिया और उसे जांचने को कहा। अगस्त्य का सूत्र निम्न प्रकार था-
संस्थाप्य मृण्मये पात्रेताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेनचार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥
अगस्त संहिताइसका तात्पर्य था, एक मिट्टी का पात्र (कठ्ठद्धद्यण्ड्ढद द्रदृद्य) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (क्दृद्रद्रड्ढद्ध च्ण्ड्ढड्ढद्य) डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (ध्र्ड्ढद्य द्मठ्ठध्र्‌ क़्द्वद्मद्य) लगायें, ऊपर पारा (थ्र्ड्ढद्धड़द्वद्धन्र्‌) तथा दस्त लोष्ट (न्न्त्दड़) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो, उससे मित्रावरुणशक्ति का उदय होगा।
उपर्युक्त वर्णन के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने तैयारी चालू की तो शेष सामग्री तो ध्यान में आ गई, परन्तु शिखिग्रीवा समझ में नहीं आया। संस्कृत कोष में देखने पर ध्यान में आया कि शिखिग्रीवा याने मोर की गर्दन। अत: वे और उनके मित्र बाग गए तथा वहां के प्रमुख से पूछा, क्या आप बता सकते हैं, आपके झ्दृदृ में मोर कब मरेगा, तो उसने नाराज होकर कहा क्यों? तब उन्होंने कहा, एक प्रयोग के लिए उसकी गरदन की आवश्यकता है। यह सुनकर उसने कहा ठीक है। आप एक एप्लीकेशन दे जाइये। इसके कुछ दिन बाद एक आयुर्वेदाचार्य से बात हो रही थी। उनको यह सारा घटनाक्रम सुनाया तो वे हंसने लगे और उन्होंने कहा, यहां शिखिग्रीवा का अर्थ मोर की गरदन नहीं अपितु उसकी गरदन के रंग जैसा पदार्थ कॉपरसल्फेट है। यह जानकारी मिलते ही समस्या हल हो गई और फिर इस आधार पर एक सेल बनाया और डिजीटल मल्टीमीटर द्वारा उसको नापा।
उसका ग्र्द्रड्ढद क्त्द्धड़द्वत्द्य ध्दृथ्द्यठ्ठढ़ड्ढ था १।३८ ज्दृथ्द्यद्म और च्ण्दृद्धद्य क्त्द्धड़द्वत्द्य क्द्वद्धद्धड्ढदद्य था २३ ग्त्थ्थ्त्‌ ठ्ठथ्र्द्रड्ढद्धड्ढद्म।प्रयोग सफल होने की सूचना डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को दी गई। इस सेल का प्रदर्शन ७ अगस्त, १९९० को स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था (नागपुर) के चौथे वार्षिक सर्वसाधारण सभा में अन्य विद्वानों के सामने हुआ। तब विचार आया कि यह वर्णन इलेक्ट्रिक सेल का है। पर इसका आगे का संदर्भ क्या है इसकी खोज हुई और आगे ध्यान में आया ऋषि अगस्त ने इसके आगे की भी बातें लिखी हैं-
अनने जलभंगोस्ति प्राणोदानेषु वायुषु।
एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥
अगस्त संहिताअगस्त्य कहते हैं सौ कुंभों की शक्ति का पानी पर प्रयोग करेंगे, तो पानी अपने रूप को बदल कर प्राण वायु ( ग्र्न्न्र्ढ़ड्ढद) तथा उदान वायु (क्तन्र्ड्डद्धदृढ़ड्ढद) में परिवर्तित हो जाएगा। उदान वायु को वायु प्रतिबन्धक वस्त्र में रोका जाए तो यह विमान विद्या में काम आता है।वायुबन्धकवस्त्रेणनिबद्धो यानमस्तकेउदान : स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌। (अगस्त्य संहिता शिल्प शास्त्र सार)राव साहब वझे, जिन्होंने भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथ और प्रयोगों को ढूंढ़ने में अपना जीवन लगाया, उन्होंने अगस्त्य संहिता एवं अन्य ग्रंथों के आधार पर विद्युत भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस आधार उसके भिन्न-भिन्न नाम रखे-(१) तड़ित्‌-रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न।(२) सौदामिनी-रत्नों के घर्षण से उत्पन्न।(३) विद्युत-बादलों के द्वारा उत्पन्न।(४) शतकुंभी-सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न।(५) हृदनि- हृद या स्टोर की हुई बिजली।(६) अशनि-चुम्बकीय दण्ड से उत्पन।अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌ का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पालिश चढ़ाने की विधि निकाली। अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (एठ्ठद्यद्यड्ढद्धन्र्‌ एदृदड्ढ) कहते हैं।
कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते।
-शुक्र नीतियवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रंस्वर्णेन रजतेन वा।
सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रंशातकुंभमिति स्मृतम्‌॥
५ (अगस्त्य संहिता)अर्थात्‌-कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात तेजाब का घोल इसका सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है।
                                                                                                            आभार :  हिंदी, हिन्दू, हिंदुस्तान 

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